क्या आपके पास सफलता का सही फ़ॉर्मूला है?

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क्या है सफलता का फ़ॉर्मूला ?

हो सकता है कि हम सब वर्जिन ग्रुप के संस्थापक रिचर्ड ब्रैंसन की तरह से कामयाब ना हों.

लेकिन माना जाता है कि बुद्धिमता, महत्वाकांक्षा, नज़रिए और गुड लुक्स के मिश्रण से कामयाबी हासिल हो सकती है.

आज के कारोबारी दौर में जहां सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी प्राथमिकताएँ बदल रही हैं. लेकिन आपके इस फ़ॉर्मूले में जो सबसे ज़रूरी पहलू होना चाहिए, वो तो है ही नहीं.

वो पहलू है बदलाव की ज़रूरत समझ पाने, उसका ख़ुले दिमाग से स्वागत कर पाने और उसे अंजाम दे पाने की इच्छा और क्षमता. इसी पर निर्भर है आपके फ़ॉर्मूले की सफलता.

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फिर ये ज़िद हो, या जोखिम लेने के प्रति हिचक, या अंधदृष्टि, या फिर बोर्ड का दबाव, या कर्मचारियों का विरोध....कारोबारी अंतत: पाते हैं कि बदलाव टाल पाना संभव ही नहीं हैं.

बदलाव ही है रास्ता

अनेक उदाहरण हैं जहां बदलाव को स्वीकार कर लोगों ने ख़ासा मुनाफ़ा कमाया.

अमीरा नेचर फूड्स लिमिटेड पहली फ़ैमिली-रन कंपनी थी जो न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हुई.

इसके सीईओ करण चानना कहते हैं, "आज की बदलती दुनिया में नई चीज़ों को अपनाना सबसे अहम बात है."

इस समूह की वार्षिक आमदनी 54.73 करोड़ डॉलर है.

करण के मुताबिक, "कामकाज में नवीनता और नई चीज़ों को अपनाने की क्षमता ठीक वैसी है जैसे इंसानों के लिए ऑक्सीजन. ये उसी तरह है जैसे हर सांस से जीवन मिलता और आगे बढ़ता है."

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1915 में एक सामान्य परिवार द्वारा स्थापित कारोबारी समूह अमीरा ने 1993 में भारत की पहली पूरी तरह से ऑटोमेटिड (स्वाचालित) चावल मिल लगाई.

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करण चानना ने गुड़गांव में अपना प्रोसेसिंग यूनिट खोला. इसके बाद उन्होंने चावल के अलावा आर्गेनिक दाल, सेम और मसाले के कारोबार पर ध्यान दिया.

करण चानना के मुताबिक कारोबारी लोगों के सामने एक वक्त ऐसा आता है जब उन्हें बदलाव की चुनौती को स्वीकार करना होता है.

उनके अनुसार कारोबार हर दिन नई चुनौती लेकर आता है. वे कहते हैं, "जो लोग मानते हैं कि कारोबार और जीवन की गाड़ी हमेशा सहज रूप से चलती है वे मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं."

जीवन और मौत का अंतर

मुंबई स्थित भारत की प्रमुख आउटसोर्सिंग कंपनी डब्ल्यूएनएस के सीईओ केशव मुरुगेश को उद्योग जगत 'टर्नअराउंड गाई' कहता है.

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वे कहते हैं, "किसी कारोबार के लिए सीधी सोच और आउट ऑफ बॉक्स सोच के बीच, मौत और जीवन जैसा अंतर होता है."

वे अपनी कंपनी की काया पलटने वाले शख्स के तौर पर देखे जाते हैं. चार साल पहले वे डब्ल्यूएनएस में आए और कंपनी के कारोबार को दोगुना यानी 1.1 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया.

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मुरुगेश के मुताबिक तब कंपनी की ग्रोथ स्थिर थी क्योंकि तब कंपनी के लोग चुनौती को स्वीकार करना नहीं चाहते थे.

उन्होंने कहा, "उन्हें तब नाकाम होने का डर था, नई तकनीक की ज़रूरत थी और इसके लिए निवेश की ज़रूरत थी. बदलाव अहम ज़रूरत थी."

हालांकि मुरुगेश एक और पहलू की ओर ध्यान दिलाते हैं, "नाकामी जैसा कुछ नहीं होता. आप जहां हैं और जहां पहुंचना आपका लक्ष्य है, उसके बीच में कुछ ही कदमों का अंतर होता है. यह योजना बनाने, लोगों को मोटिवेट करने और उनका नेतृत्व करने पर निर्भर करता है. इसके अलावा प्रत्येक सीईओ को थोड़े लक की भी ज़रूरत होती है."

बदलाव को वक़्त चाहिए

दुबई स्थित ब्राश ब्रैंड्स कंसल्टेंसी के सीईओ जॉन ब्राश कहते हैं, "जब बदलाव की बात आती है, तो कंपनी का कारोबार कितना बड़ा है, यह अहम होता है." इनकी कंपनी के उपभोक्ताओं में बुर्ज ख़लीफ़ा भी शामिल है.

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ब्राश कहते हैं, "बड़ी संस्थाओं में बदलाव को लागू करने में वक्त लगता है. स्वीकृति की प्रक्रिया लंबी होती है. लोगों के आपस में संवाद करने की प्रक्रिया भी लंबी होती है."

ब्राश दुबई के डनाटा का उदाहरण देते हैं, जो संयुक्त रुप से दुनिया की चौथी सबसे बड़ी एयर सर्विस है. इसके 37 देशों के 73 एयरपोर्ट्स पर फुटप्रिंट्स हैं.

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इसके कर्मचारियों की संख्या 20,000 से ज्यादा है. डनाटा ने अपने ब्रैंड को नया रूप देने की कोशिश 2011 में शुरू की, जिसके छह साल में पूरा होने की उम्मीद है.

ब्राश कहते हैं, "नए ब्रांड की रणनीति, विज़न, उद्देश्य और मूल्यों के बारे में 20 हजार लोगों को बताने की ज़रूरत है."

नई तकनीक का ज़माना

ब्राश ये भी मानते हैं कि कुछ कारोबारी लीडरों को बदलाव मुश्किल प्रक्रिया लगती है. वे कहते हैं, "कुछ कारोबारी समूह के मालिक बदलाव चाहते हैं, बदलाव का आइडिया उन्हें शानदार लगता है. हालांकि अच्छा कर रहे लोग बदलाव से थोड़ा हिचकते भी है. बाजार की दृष्टि यही है."

हालांकि ब्राश के मुताबिक कारोबार को आधुनिक तौर तरीकों की ज़रूरत है. मसलन सोशल मीडिया, क्लाउड कंप्यूटिंग, 3-डी प्रिंटिंग के अलावा नई तकनीकों - मसलन उबर जैसी मोबाइल ऐप के इस्तेमाल की भी ज़रूरत है.

ब्राश के मुताबिक आने वाले दिनों में, कारोबार की दुनिया में चीफ़ मार्केटिंग ऑफिसर की भूमिका अहम होने वाली है. वे कंपनी के अंदर सीईओ जैसी भूमिका में होंगे.

ब्राश कहते हैं, "मैं ये समझना चाहता हूं कि जेनरेशन वाय (Gen-Y) क्या सोचती है, क्या करती है, क्योंकि वे भविष्य के उपभोक्ता हैं."

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डब्ल्यूएनएस ने अपने कारोबार में नए बदलावों के लिए विनक्यूबेट नामक आइडियाज़ डिवीज़न बनाई है. इस विभाग के तहत कर्मचारियों को नई सोच के लिए प्रेरित किया जाता है.

बदलाव से तालमेल

इसके तहत सबसे आकर्षक विचार देने वाली टीम को अपने विचार पर काम करने के लिए ढाई लाख डॉलर दिए जाते हैं.

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इस विचार पर काम करने के लिए टीम को 18 महीने का वक्त दिया जाता है.

और जब उसमें कोई कारोबारी संभावना उभरने लगती है तो उस आइडिया के आधार पर नई कंपनी बनाई जाती है और आइडिया देने वाले सदस्यों को उस कंपनी में 26 फ़ीसदी की हिस्सेदारी मिलती है.

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ब्राश कहते हैं, "लगातार सोचने के बिना, कोई भी कारोबार समय के साथ धीमा होने लगता है. युवा और कहीं ज्यादा चाहत वाला तबका बाजार में आकर नई पहल के जरिए हिस्सा हड़पने लगता है."

उनके मुताबिक, "कई कंपनियां अपने प्रतिस्पर्धियों को देखती रह जाती हैं, जबकि उन्हें अपने उपभोक्ताओं, ख़ासकर जेनरेशन वाई के साथ तालमेल बिठाना चाहिए."

वैसे मशहूर वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने कहा, "बुद्धिमता बदलाव के लिए ख़ुद को तैयार करने की क्षमता है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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