ब्लॉग: 'अभी तो पार्टी शुरू हुई है..'

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कोई 11 साल पहले अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में घूमते-घूमते एक गांधीवादी से मुलाकात हुई.

हम दोनों उसी बरामदे में आलथी-पालथी मारकर बैठ गए जहां गांधी जी चरखा चलाते थे.

मैंने बातों-बातों में कहा कि अहमदाबाद की हवा में बड़ी घुटन है.

वो कहने लगे कि हां, है तो. मगर गांधी जी कहते थे कि घुटन ऐसे ही होती है जैसे दूध के ऊपर जमी मलाई.

फूंक मारते रहने से मलाई एक तरफ़ हो जाती है और नीचे दूध ही दूध होता है.

समाज भी इसी दूध की तरह है जिसपर कभी-कभी घुटन की तह जम जाती है. इससे घबराना नहीं चाहिए.

मलाई जितनी भी मोटी हो जीवन के मज़ेदार दूध से गहरी नहीं हो सकती.

घुटन

आज जाने क्यों मुझे ग्याहर साल पहले कि यह बात बहुत याद आ रही है.

मुझे याद है जब जनरल ज़िया-उल-हक़ तख़्तापलट कर ख़ुद सत्ता में आए और उन्होंने जीवन की हर करवट को घुटन की रस्सियों से जकड़ना शुरू किया तो ऐसा लगता था कि हम सब की सांस रूक जाएगी.

ऐसा सन्नाटा जैसे क़ब्रिस्तान....हर आदमी बात करते-करते रूक जाता, इधर-उधर देखना शुरू कर देता मगर फिर जब मुट्ठी में बंद जब्र की रेत आहिस्ता-आहिस्ता गिरनी शुरू हुई तो गर्म हवा बदलने लगी.

अब भी बू आती है

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हां, आज भी पाकिस्तान की हवा में उस ज़माने की बू बसी है लेकिन कहने वालों के लिए भी आज बहुत गुंजाइश है.

देखिए ना, मछली का ट्रक किसी सड़क से गुजर जाए तो आसपास से अगले दिन तक बास नहीं जाती.

घुटन भी यही है. काफ़ी तेज़ है लेकिन जाते-जाते ही जाती है.

क्या 1975 में लगी इमरजेंसी के असर आज तक महसूस नहीं होते?

जिन समाजों को घुटन का तर्जुबा नहीं होता उनका बहुत सा वक़्त यही समझने में लग जाता है कि हमारे साथ हुआ क्या?

लेकिन पहले एक को समझ में आता है फिर एक से दो को, दो से चार को, फिर आवाज़ें शोर बनती चली जाती हैं और ख़ामोशी दुम दबाकर सरकना शुरू कर देती है.

कहानी

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एंडरसन की वो कहानी तो हम लोगों में से बहुतों ने पढ़ी-सुनी होगी कि राजा रथ पर सवार महल से निकला था और उसने अपने ख़्याल में दुनिया का सबसे महंगा लिबास पहन रखा था.

हर तरफ़ वाह-वाह का शोर था. मगर भीड़ में खड़ा एक बच्चा चिल्ला उठा आप लोग किस बात पर वाह-वाह कर रहे हैं.

राजा तो नंगा है उसने तो कुछ भी नहीं पहना हुआ है.

और फिर ये बात एक कान से दूसरे कान तक फैलती चली गई.

हर तरफ़ हल्ला मच गया कि राजा नंगा है.

चुप्पी

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हम पाकिस्तानियों ने कोई तीर मारा हो या नहीं पर 68 साल में ये जरूर सीख लिया कि जब हर तरफ़ चुप्पी लग जाए तो उसे तोड़ना कैसे है.

आम जनता का क्या है, उसके बारे में तो अहमद फराज़ कह चुके हैं, "ये क्या सितम है कि अहदे सितम के जाते ही तमाम ख़ल्क़ मेरी हमनवां निकलती है."

आप इस पगदंडी पर अभी नए-नए चढ़े हैं. आहिस्ता-आहिस्ता धुंए के दरमयान से निकलना भी सीख लिजिए.

अभी तो पार्टी शुरू हुई है. बस ये बात गिरह से बांध लीजिए कि तिनके-तिनके से बनाया एकता का घोंसला तिनके-तिनके हो भी जाए तो उसके बाद फिर तिनका-तिनका जोड़ कर बना लेंगे.

जाने क्या कहने बैठा था और क्या कहता चला गया. होता है कभी-कभी ऐसा भी होता है.

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