पत्रकारों के लिए सबसे ख़तरनाक देश पाकिस्तान

पाकिस्तान में पत्रकारों पर हमलों का विरोध इमेज कॉपीरइट AP

पाकिस्तान में मीडिया ने देश में पत्रकारों के ख़िलाफ़ बढ़ रही हिंसा पर सरकार के नरम रवैये की जमकर आलोचना की है.

पाकिस्तानी मीडिया का आरोप है कि पत्रकारों पर हमला करने वाले अपराधियों के ख़िलाफ़ सरकार कड़े क़दम नहीं उठा रही.

हर दो नवंबर को संयुक्त राष्ट्र 'पत्रकारों पर हमला करने वालों पर नरम रवैये' को ख़त्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाता है.

2014 में अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संघ ने पाकिस्तान को 'पत्रकारों के लिए सबसे ख़तरनाक देश' की सूची में सबसे ख़तरनाक बताया था.

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पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी कमेटी ने उन देशों की सूची जारी की थी जहां पत्रकारों पर हमला करने वाले अपराधियों को आसानी से छोड़ दिया जाता है, पाकिस्तान को इसमें नौंवे स्थान पर रखा गया था.

कई अख़बार पाकिस्तान के ग़ैर-सरकारी संस्थान ''सेफ़्टी फ़ॉर मीडिया'' की एक रिपोर्ट को महत्वपूर्ण मानते हैं जिसके मुताबिक़ 2001 से अब तक मारे गए 71 पत्रकारों में से 47 पत्रकारों को उनके काम की वजह से मारा गया था. इनमें से सिर्फ़ दो मामलों में ही आरोपियों को सज़ा मिली है.

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दो नवंबर को अंग्रेज़ी अख़बार 'डॉन' के संपादकीय में लिखा गया है कि पाकिस्तान पत्रकारों के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं है. इसमें नॉन-स्टेट तत्वों और सरकार प्रायोजित तत्वों को पत्रकारों को धमकियों और हमलों के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए सरकार पर प्रतिबद्धता नहीं दिखाने का आरोप लगाया गया है.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने दो नवंबर के अपने संपादकीय में छापा है कि पाकिस्तानी पत्रकारों को केवल चरमपंथी निशाना नहीं बनाते बल्कि राजनीतिक, धार्मिक और नस्ली गुट भी निशाना बनाते हैं. इसमें ये भी कहा गया है कि क़ानूनी एजेंसियां भी पत्रकारों को निशाना बनाती हैं.

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संपादकीय के मुताबिक़, "सरकार संकेत दे रही है कि पत्रकारों की आवाज़ें बंद की जाएंगी और सरकार देखती रहेगी."

जबकि 'द नेशन' अख़बार के मुताबिक़ जले पर नमक छिड़कने की तरह सरकार नए नियम लागू करती रहती है.

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पाकिस्तान के टीवी चैनलों और उर्दू अख़बारों में पत्रकारों पर हमला करने वालों को माफ़ी देने की संस्कृति को ख़त्म करने की अपील की है.

सोमवार सुबह उर्दू समाचार चैनल 'जियो टीवी' ने एक रिपोर्ट प्रसारित की जिसमें पत्रकारों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों की जांच में किस तरह ढुल-मुल रवैया अपनाया जाता है.

उर्दू अख़बार 'डेली एक्सप्रेस' ने कहा है कि किसी देश में लोकतंत्र और क़ानून सही मायने में लागू हो पाता है जब उस देश के पत्रकार अपना काम स्वतंत्र रूप से कर सकें.

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'पाकिस्तानी टुडे' में 31 अक्तूबर को कहा गया कि पाकिस्तानी मीडिया को संकीर्णता, धार्मिक और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और अन्ध देशभक्ति का सामना करना पड़ता है. जिससे मीडिया अपने कर्मचारियों की सुरक्षा की दिशा में वह भूमिका नहीं निभा पाता जो उसे निभानी चाहिए.

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अंग्रेज़ी अख़बार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने लिखा है कि मीडिया को अपने कर्मचारियों की सुरक्षा का ज़िम्मा ख़ुद उठाना चाहिए. अख़बार ने लिखा है कि मीडिया को पत्रकारों को बुलेटप्रूफ़ जैकेट और मैडिकल किट जैसे संसाधन मुहैया कराने चाहिए और मारे गए पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देना चाहिए.

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