कारोबारी दुनिया में कितने अहम स्पिन डॉक्टर?

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हाल में संपन्न बिहार चुनाव में महागठबंधन की जीत में 'कम्यूनिकेशन स्ट्रेटजिस्ट' प्रशांत किशोर की भूमिका अहम मानी जा रही है.

ये वही प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को शानदार जीत दिलाने वाली रणनीति बनाई थी. इसी तरह बड़ी कंपनियों की सफ़लता में ग्राहक से संवाद और कंपनी व उत्पाद की छवि बनाने वालों की भूमिका अहम होती है.

ऐसे ही रणनीतिकारों को अमरीका में स्पिन डॉक्टर भी कहा जाता है. इन्हें पब्लिसिटी मैनेजर भी कह सकते हैं, कम्यूनिकेशन स्ट्रेटजिस्ट भी. कुल मिलाकर ऐसा शख़्स जो लोगों की राय बदल दे.

यह कई बार केवल प्रमोशन जैसा मसला नहीं होता है, बल्कि फ़ेस सेविंग का काम भी करता है.

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यह कोई भी शख़्स बन सकता है. अमरीका के न्यूयॉर्क में मेरीट बेयर की कंपनी का ही उदाहरण लीजिए. इसने दो साल पहले एक ऐसा ऐप बनाया जिसकी मदद से आप आख़िरी मिनटों में थिएटर की टिकट ख़रीद सकते हैं. यह एक सामान्य जनसंपर्क की रणनीति का हिस्सा था. 'टूडे टिक्स' ने थिएटर करने और देखने वाले समुदाय को टारगेट किया.

बेयर ने 'प्लेबिल मैगज़ीन' जैसी कारोबारी पत्रिकाओं में अपनी कंपनी के विज्ञापन दिए ताकि लोग उनके ऐप के बारे में जान पाएं. लेकिन चीज़ें उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पा रही थीं.

बेयर बताते हैं, "हमने महसूस किया कि थिएटर देखने वालों में कुछ ही लोग पत्रिकाएं पढ़ते हैं. हमें लगा कि हमें अपनी रणनीति में बदलाव करना चाहिए."

ऐसे में बेयर ने अपनी रणनीति में बदलाव किया. कपंनी ने बैनर और पोस्टर जारी किए और मुख्यधारा के मीडिया में विज्ञापन दिए. लंदन में इस ऐप की लांचिंग में कंपनी ने लंदन स्थित पीआर कंपनी को काम सौंपा.

बेयर के मुताबिक ये रणनीति काम कर गई क्योंकि कंपनी ने अपनी कम्यूनिकेशन टीम के साथ मिल बैठकर शुरुआत से ही इस पर नजर बनाए रखा.

अमूमन प्रबंधन से यहीं चूक होती है, वे अपनी रणनीतियों में कम्यूनिकेशन विभाग को ज़्यादा तरजीह नहीं देते.

ब्रिटेन की ब्लूस्काई पब्लिक रिलेशन फर्म के संस्थापक निदेशक ट्रेसी बारेट कहती हैं, "कई प्रबंधन पीआर को लगभग भूल ही जाते हैं या फिर स्पष्ट राय नहीं रखते. उसे सही से नहीं आंकते."

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लेकिन अब ये राय धीरे धीरे बदल रही है. बारेट के मुताबिक ऑनलाइन पैमाने पर अब यह जानना सहज है कि कोई अभियान कितने लोगों तक पहुंच सकता है.

बिजनेस स्कूलों के एमबीए पाठ्यक्रमों में पीआर के बारे में ज़्यादा नहीं पढ़ाया जाता, ऐसे में कुछ ही मैनेजर और कारोबारी, इसे इस्तेमाल करने का बेहतर तरीका सीख पाते हैं. ऐसे में वे ज्यादातर मौकों पर इस पहलू के लिए अंतिम फ़ैसला अपने मार्केटिंग विभाग पर छोड़ देते हैं.

अमरीका की डर्टमाउथ यूनिवर्सिटी के 'टक स्कूल ऑफ़ बिज़ेनस' में कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन के प्रोफेसर पॉल अर्जेंट कहते हैं, "अमूमन सीईओ कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन की मीटिंग में नहीं आते और उन्हें इनकी समझ भी नहीं होती है. ये बात दूसरी है कि वे ज़्यादातर मौकों पर संवाद ही कर रहे होते हैं."

लेकिन इन दिनों तस्वीर बदली है. मध्यम स्तर के मैनेजरों में भी कम्यूनिकेशन स्ट्रेटजी को लेकर ज़्यादा समझ देखी जा रही है. अर्जेंट कहते हैं, "कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन की रणनीति को जो आसानी से समझ सकता है वही वित्तीय प्रबंधन की रणनीति को भी आसानी से समझ सकता है."

ईमेल मार्केटिंग और सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में कोई भी मिड लेवल मैनेजर अपनी कंपनी या संस्था की राय बदलने की क्षमता रखता है.

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अर्जेंट के मुताबिक अब कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन केवल मीडिया से संवाद करने का जरिया भर नहीं है, बल्कि यह सोशल मीडिया प्लानिंग, मार्केटिंग और निवेशकों के हितों को संभालने का काम बन चुका है.

इसलिए मिड लेवल के मैनेजरों से भी ऐसे ट्वीट या बयान जारी करने चाहिए जो कंपनी की कॉरपोरेट छवि के मुताबिक हों.

अर्जेंट कहते हैं कि स्टारबक्स उन कंपनियों में है जो अच्छा कर रही है और कंपनी पारंपरिक मीडिया में यकीन नहीं रखती. इसके सीईओ होवार्ड स्कुल्टज़ ने अपने स्टोर्स को ही कंपनी का मुख्य कम्यूनिकेशन टूल के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

जिन कंपनियों की पीआर रणनीति अच्छी होती है, उनकी आसानी से पहचान हो जाती है. बारेट अपने साथ हुए एक वाकये का उदाहरण देते हुए बताती हैं कि एक बार ब्रिटिश एयरवेज़ की उनकी फ़्लाइट कैंसल हो गई. उन्होंने ट्विटर पर इसकी शिकायत दर्ज कराई. कंपनी की ओर से उन्हें तुरंत ही जवाब मिला कि उन्हें अगली फ्लाईट में डिस्काउंट दिया जाएगा.

बेयर ने टूडे टिक्स ऐप की रणनीति को बदला. उन्होंने यूएस ओपन टेनिस टूर्नामेंट के दौरान 12 मीटर के बैनरों पर विज्ञापन लगाए. बाहर से आने वाले वे टूरिस्ट जो मैच देखने आए थे, उन्होंने थिएटर के टिकट भी खरीदे.

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बेयर कहते हैं, "आप जो कहना चाहते हैं, उसे कहने की जरूरत है. लेकिन उससे पहले आपको ये तय करना चाहिए कि आप कौन हैं और आप ये कहानी क्यों कहना चाहते हैं."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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