अंतरिक्ष में दिखे 13 अरब साल पुराने तारे

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संभव है कि पृथ्वी से ये साफ़ दिखाई न दें और केवल दूर आसामान में कहीं झिलमिलाते हुए ही नज़र आएँ, पर इसी झिलमिलाती रोशनी में ब्रह्मांड के सबसे पुराने तारे हैं.

पृथ्वी जिस आकाश गंगा (मिल्की वे) का ग्रह है, उसके ठीक बीच में स्थित ये तारे आंखों से नज़र आने वाले सबसे पुराना तारे हैं.

इन तारों का अस्तित्व 13 अरब सालों से है, यानी ये हमारी आकाश गंगा से भी पुराने हैं.

इन तारों की खोज ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने की है. इन पुराने तारों ने अपनी वर्तमान शक्ल तब अख़्तियार की जब ब्रह्मांड की आयु 30 करोड़ साल थी.

नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन की लेखक लुइस होज़ कहती हैं, "ये अंतरिक्ष में मौजूद सबसे पुराने तारों में शामिल हैं और निश्चित तौर हमारे अब तक के देखे गए तारों में से सबसे पुराने हैं."

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होज़ के मुताबिक ये तारे हमारी आकाशगंगा मिल्की वे से भी पुरानी है. आकाश गंगा बाद में इन्हीं तारों के आसपास बनी.

होज़ बताती हैं, "हमारी समझ के मुताबिक ये आकाश गंगा के सबसे पुराने तारे हैं और बहुत संभव है कि अंतरिक्ष की अब तक की खोज में ये सबसे पुराने पिंड हों."

होज़ और उनके सहयोगी इस निष्कर्ष पर इनकी स्थिति और संरचना के आधार पर पहुँचे हैं.

इनके मुताबिक इन तारों में बहुत कम मेटल मौजूद है- अंतरिक्ष यात्री 'मेटल' का इस्तेमाल हाइड्रोजन और हीलियम को छोड़कर बाक़ी सभी चीज़ों की मौजूदगी बताने के लिए करते हैं.

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ये मेटल अंतरिक्ष में तब प्रवाहित होता है जब तारों में विस्फोट होता है. इसके बाद ये मेटल ही मिलकर नए तारे की रचना करता है.

अगर किसी तारे में मेटल की मात्रा कम है तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह हो सकती है कि वो अंतरिक्ष के इतिहास में काफ़ी पहले अस्तित्व में आया होगा. माना जाता है कि तब ना तो तारों में ज़्यादा विस्फोट हुए होंगे और ना ही अंतरिक्ष में उतना ज़्यादा मेटल फैला होगा.

हालांकि इससे इतर एक वैकल्पिक राय भी है. इसके मुताबिक आज भी ये संभव है कि अंतरिक्ष में कम मेटल वाले इलाके हैं और उनसे भी तारों का निर्माण हो सकता है.

शोधकर्ता इस बात की संभावना देख रहे हैं कि क्या ये तारे हमेशा से वहीं हैं, जहां ये अब मौजूद हैं.

मिल्की वे का केंद्र घना, ज़्यादा मेटल की मात्रा वाला है.

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अगर इन तारों का निर्माण यहीं हुआ है तो इनमें मेटल की कम मात्रा की एक ही वजह है और वो ये कि वे मिल्की वे से भी पहले अस्तित्व में आए होंगे.

होज़ कहती हैं, "इन तारों में कार्बन, लौह और दूसरे भारी तत्वों की मात्रा बेहद कम है, जिससे ये भी संकेत मिलता है कि पहले के तारों में उस तरह से विस्फोट नहीं होता होगा, जैसा आजकल होता है."

इन तर्कों और खोजों के जरिए पहले के अंतरिक्ष के वातावरण के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है. होज़ कहती हैं, "तारों की उम्र के बारे में पता करना आसान काम नहीं है."

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की स्काईमैपर टेलिस्कोप के जरिए होज़ की टीम करीब 50 लाख तारों पर नज़र रखती हैं. इन पांच लाख तारों में 14 हज़ार तारों पर ख़ास नज़र रखी जाती है.

इन 14 हज़ार तारों में 23 सबसे दिलचस्प तारों के आधार पर होज़ की टीम ने रिपोर्ट तैयार की है.

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होज़ कहती हैं, "मिल्की वे आकाश गंगा बहुत विस्तृत है और हम उसके छोटे से हिस्से भर हैं. मुझे उम्मीद है कि हम भविष्य में ये पता लगा पाएंगे कि मिल्की वे किस तरह से बना है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.

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