कितनी ख़तरनाक होती है 'किलर बी'?

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आमतौर पर यही माना जाता है कि जानलेवा मक्खियां (किलर बी) बहुत बड़ी होती हैं और उनमें ज़हर होता है.

हालांकि ये सच नहीं है. किलर बी मक्खियां मधुमक्खियों की तुलना में छोटी होती हैं.

किलर मक्खियों का ज़हर भी उतना ख़तरनाक नहीं होता जितना माना जाता है. हालांकि ये आक्रामक होती हैं, लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर प्यूर्टो रिको प्रायद्वीप में ये मक्खियां उतनी आक्रामक भी नहीं होतीं.

दरअसल, किलर बी मक्खियों के बारे में जानकारी किसी साइंस फिक्शन से कम नहीं है.

1956 में ब्राज़ील के वैज्ञानिक वार्रिक केर अफ्रीकी मधुमक्खियों को लेकर दक्षिण अमरीका पहुंचे. उनका इरादा उनकी उत्पादकता को बढ़ाना था. हालांकि इनमें से कुछ वार्रिक के चुंगल से निकल गईं और यूरोपीय मधुमक्खियों के साथ मिलने से हाइब्रिड प्रजाति में तब्दील हो गईं.

इन अफ्रीकी मधुमक्खियों ने दक्षिण अमरीका में फ़ैलना शुरू किया. 1985 में ये मेक्सिको तक पहुंच गई थीं. 2014 में, शोधकर्ताओं ने इन हाइब्रिड मधुमक्खियों के कैलिफोर्निया और फिर सैन फ्रांसिस्को तक जाने का अध्ययन किया.

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अफ्रीकी मधुमक्खियों का नाम किलर मधुमक्खियों के तौर पर इसलिए मशहूर हुआ क्योंकि इनको लेकर फ़िल्मों के माध्यम से काफी ज़्यादा डर फ़ैला. लेकिन इन फ़िल्मों में जो बताया गया है वैसी बात किलर मक्खियों के बारे में सही नहीं है.

दरअसल अफ्रीकी मधुमक्खी यूरोपीय मधुमक्खी की तुलना में छोटी होती है और उसमें ज़हर भी कम होता है. इस ज़हर का असर भी कम होता है.

हालांकि जब ये मक्खियां अपने छत्ते का बचाव करती हैं, तब वो कहीं ज़्यादा आक्रामक हो जाती हैं.

1982 में शोधकर्ताओं ने पाया कि अफ्रीकी मक्खियां अपने घरों पर होने वाले किसी हमले का आक्रामकता से बचाव करती हैं, बड़ी तेजी से और बड़ी संख्या में हमला करने वाले पर धावा बोलती हैं.

यही बात शोध में ज़ाहिर हुई. तेज़ आक्रमण के कारण इन मक्खियों के चलते बीते 50 सालों में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है.

अगर किसी को एलर्जी नहीं हो तो किसी वयस्क की स्थिति तभी चिंताजनक हो सकती है, जब उसे हज़ार मक्खियों ने काट लिया हो.

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यूरोपीय मक्खियां इतनी आक्रामक नहीं होतीं, लेकिन अफ्रीकी मक्खियां होती हैं.

प्यूर्टो रिको स्थित इंटर अमरीकन यूनिवर्सिटी के कीट वैज्ञानिक बर्ट रिवेरा मर्चेंड के मुताबिक इन मक्खियों को किलर बी कहना सही नहीं है.

मर्चेंड कहते हैं, "इस नाम से ऐसा लगता है कि इन मक्खियों के काटने से मौत हो सकती है, लेकिन हकीकत तो ये है कि वे अपने घरों का बचाव कर रही होती हैं. उस वक्त ये भले बेहद आक्रामक हों, लेकिन वैसे ये किसी पर हमला नहीं करतीं."

रिवेरा मर्चेंड के मुताबिक प्यूर्टो रिको में अफ्रीकी मधुमक्खियां पहली बार 1994 में पाई गईं और वे अपनी रक्षा में उतनी आक्रामक नहीं रही हैं.

2012 में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक मर्चेंड और उनके साथियों ने पाया कि प्यूर्टो रिको में पाई जाने वाली मक्खियां धीमे से काटती हैं और कई बार तो काटती ही नहीं हैं. उनका व्यवहार काफी हद तक यूरोपीय मधुमक्खियों जैसा ही देखा गया है.

इतना ही नहीं इनका आकार भी काफ़ी छोटा होता है.

रिवेरा मर्चेंड कहते हैं, "प्यूर्टो रिको में मक्खियां पालने वाले स्थानीय अफ्रीकी मक्खियों को ही पालते हैं और उन्होंने कभी उनके रक्षात्मक और आक्रामक रवैये की शिकायत नहीं की है."

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.

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