जलवायु परिवर्तन और भारत की मंशा

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जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र की बैठक का उद्देश्य एक नए नज़रिए पर आम सहमति बनाना है, लेकिन भारत ने देश में बुनियादी संरचनाओं के निर्माण और करोड़ों नागरिकों को रोज़गार देने के लिए औद्योगिक निर्माण बढ़ाने की अपनी मंशा जता दी है.

भारत की ओर से कहा गया है कि प्रति यूनिट विकास दर के लिए कार्बन उत्सर्जन में वर्ष 2005 के स्तर से 35 प्रतिशत की कमी लाते हुए यह सब किया जाएगा.

इसके साथ यह भी कहा गया है, “वर्ष 2030 में जैसा भारत होना है, उसका आधे से अधिक अभी बनाया जाना है.”

लेकिन भारत जिस तरह का देश बनना चाहता है, जिसमें बड़ी खदानें, हवाई-अड्डे, बंदरगाह, बड़े शहर, औद्योगिक कॉरिडोर, कैमिकल और फ़ार्मा उद्योग, बड़े पैमाने पर पानी की ख़पत वाले कोयले और परमाणु बिजली घर हों, वहां टिकाऊ विकास और जलवायु परिवर्तन के झटकों से निपटने के लिए उस तरह के देश बनने की ज़रूरत नहीं है.

भारत ही नहीं, अन्य देश और यहां तक कि कई गैर सरकारी संस्थाएं भी उस चीज़ पर बात नहीं कर रही, जिसे ‘विकास’ कहा जाता है.

विकास को लेकर भारत का जुनून इस ग्रह की सेहत के लिए उतना ही घातक है जितना कार्बन की हमारी आदत. लेकिन कार्बन उत्सर्जन को कम करने की बात होती है तो हमारी अर्थव्यवस्था इन तथ्यों को छुपा देती हैं.

आधुनिक आर्थिक विकास, औद्योगिक क्रांति का ही शिशु है. तीन शताब्दियों तक बेलगाम आर्थिक विकास आज हमें उस मोड़ पर ले आया है जहां यह लगभग तय हो गया है कि जल्द ही हमारा सामना दो डिग्री सेल्सियस ज़्यादा गर्म दुनिया और इससे जुड़े ख़तरों से होगा.

अमरीकी विज्ञान संगठन क्लाइमेट सेंट्रल के मुताबिक़, पृथ्वी के तापमान में चार डिग्री सेल्सियस के इज़ाफ़े से समुद्र के जलस्तर में बढ़ोत्तरी का ख़तरा जुड़ा हुआ है और इससे भारत के समुद्र तटीय इलाक़ों में रह रहे 5.5 करोड़ लोगों को ख़तरा है.

समुद्र तट पर रहने वालों में चेन्नई में 30 लाख, कोलकाता में 1.2 करोड़ लोग और मुंबई में 1.1 करोड़ लोग शामिल हैं.

दुर्भाग्य से, कार्बन ही वो एकमात्र सीमा नहीं है जो ऊंची विकास दर के ग्राफ़ के साथ साथ खिंचती चली जाती है.

प्रदूषण और धरती से ज़रूरत से अधिक पानी खींचने के कारण भारत का भूगर्भ जल भी संकट के कगार पर खड़ा है.

वॉटरएड के मुताबिक देश में सतह का 80 प्रतिशत पानी प्रदूषित है.

देश के 18 से 29 राज्य सूखे से पीड़ित रहते हैं जबकि तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी भारत के राज्य बाढ़ से त्रस्त रहते हैं.

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चेन्नई में पिछले महीने और इस महीने के शुरू में हुई भारी बारिश, हो सकता है कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित न हो.

लेकिन ज़मीनों का बिना योजना का इस्तेमाल किया जाना, इस बाढ़ का ज़रूर एक कारण है. यहां सड़कें, रेलवे और इमारतें धरती के पानी के बहाव और उसके वितरण का बिना ध्यान रखे बनाई गई हैं.

अकेले तमिलनाडु के ही सात तटीय ज़िलों में 35,750 मेगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता वाले कोयले से संचालित बिजली संयत्र या तो निर्माणाधीन हैं या लाइसेंस पाने की प्रक्रिया में हैं.

इनमें सबसे बड़ा पॉवर प्लांट चेयुर में है, जिसकी क्षमता है 4,000 मेगा वॉट है. इस प्लांट के साथ कोयले के यार्ड, कोयला और समंदर का पानी लेने ले जाने वाले कॉरिडोर, राख की पाइपलाइन और राख के तालाब की सुविधाएं जुड़ी हुई हैं.

सुरक्षित बचे हुए प्राकृतिक तंत्र को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए और जो बुरी स्थिति में हैं उनकी मरम्मत होनी चाहिए ताकि वो भविष्य के ख़तरे से निपटने में हमारी मदद कर सकें.

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लेकिन इसका ठीक उलटा हो रहा है और यहां तक कि बड़े बड़े कार्पोरेशन भी बहुत गंभीर नहीं दिखते.

उदाहरण के लिए कार्पोरेट ग्रुप यूनीलीवर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पॉल पोलमैन ने कहा है कि सरकारों को कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए कार्बनडाई ऑक्साइड का एक स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए.

लेकिन दक्षिण भारत के एक ख़ूबसूरत पहाड़ी कस्बे कोडाईकनाल के निवासी कंपनी के एक दूसरे ही रूप से रूबरू हैं.

वहां हिंदुस्तान यूनीलीवर पर आरोप है कि कंपनी मर्करी (पारा) वाले थर्मामीटर बनाने की फैक्ट्री चलाती थी जिसकी वजह से इसमें काम करने वालों की सेहत पर असर पड़ा और आसपास के इलाक़ों में मर्करी का ज़हर फैला.

पारा एक भारी तत्व होता है जो मस्तिष्क और गुर्दे पर बुरा असर डालता है और सांस लेने की दिक्कत पैदा करता है.

बाद में यूनीलीवर ने अपनी फ़ैक्ट्री को बंद कर दिया और जांच के आदेश दे दिए.

प्रदूषण फैलने का पता चलने के 15 वर्ष बाद भी फैक्ट्री का इलाक़ा प्रदूषित है और यहां से जैव विविधता वाले भू क्षेत्र में पारा रिस रहा है.

अभी जून और अक्टूबर में हुए एक अध्ययन में पता चला कि फ़ैक्ट्री से पास पाम्बर नदी में ज़हरीला पारा रिस रहा है. यह नदी वैगाई में मिलती हैं, जहां से तमिलनाडु के पानी की किल्लत झेलने वाले तीन ज़िलों में पानी और मछली की आपूर्ति की जाती है.

हालांकि यूनीलीवर के मुताबिक, “अध्ययन से पता चला था कि फैक्ट्री परिसर के कुछ हिस्सों को छोड़कर कोडाईकनाल में जलवायु पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा है.”

कंपनी के बयान में कहा गया है, “हम फ़ैक्ट्री की जगह से मर्करी हटाने के काम को जारी रखने के पक्ष में हैं.”

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यहां यूनीलीवर के पास ये विकल्प है कि वो अपने कहे पर अमल भी करे. ऐसी टेक्नोलॉजी है जो मर्करी के स्तर को प्रकृति में पाए जाने वाले स्तर तक ला सकती है और ऐसा करके उन समुदायों में जल सुरक्षा को बहाल किया जा सकता है जो इससे प्रभावित हैं.

प्रकृति को बचाए रखने के लिए जो ज़रूरी है उस पर 'आर्थिक टिकाऊपन' को तरजीह देने से 'टिकाऊ विकास' जैसे मुहावरे पैदा होते हैं.

चीजों के निर्माण में बदलाव लाकर अधिक से अधिक उपभोग बढ़ाने का 'ग्रीन ग्रोथ' का प्रस्ताव आकर्षक तो है. लेकिन जब तक ये सवाल नहीं पूछा जाएगा कि कौन उत्पादन करता है, क्या पैदा होता है और ये किसके लिए और क्यों पैदा किया जाता है, तो पेरिस सम्मेलन जैसा प्रयास भी हमें आने वाले ख़तरे से नहीं बचा पाएगा.

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