'हिंदू देश न छोड़ें, ये हम तय करेंगे'

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Image caption शेख हसीना और उनकी पार्टी को बांग्लादेश में हिंदुओं का समर्थक माना जाता है.

बांग्लादेश अब तक अपने चार इस्लामी नेताओं को फांसी पर लटका चुका है, इसमें तीन जमात-ए-इस्लामी के नेता हैं जबकि एक बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी के.

1971 के मुक्ति संघर्ष के दौरान इन्हें मानवता के ख़िलाफ़ अपराध के लिए यह सज़ा मिली.

दोनों पार्टियों के अलावा कई दूसरे लोगों को भी ऐसे ही मामलों में मौत की सज़ा या उम्रक़ैद की सजा मिली और ये अपील की सुनवाई का इंतज़ार कर रहे हैं. वहीं कुछ का मुक़दमा चल रहा है.

ये सब युद्ध अपराधी हैं. मीडिया इन्हें इसी नाम से बुलाता है. इन पर नरसंहार के लिए भीड़ को उकसाने, हत्या, बलात्कार या आगज़नी और लूटपाट के आरोप थे. सबसे अहम बात ये कि इन पर जबरन धर्मांतरण कराने और हिंदुओं की हत्या के आरोप भी थे.

संभवत: बांग्लादेश दुनिया का इकलौता ऐसा मुस्लिमबहुल देश है, जहां हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों के जबरन धर्मांतरण के मामले मुस्लिम लोगों पर चल रहे हैं.

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Image caption अली हसन मोहम्मद मुजाहिद की ये तस्वीर 2013 की है.

अवामी लीग में नीतिगत फ़ैसले लेने वाले सभापतिमंडल के सदस्य और पूर्व मंत्री सुरनजीत सेनगुप्ता कहते हैं, "सैन्य शासकों के लगातार शासन के दौरान हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान को समझौते ज़रूर करने पड़े, पर हम अभी भी धर्मनिरपेक्ष देश हैं और जब तक हमारी पार्टी सत्ता में है, तब तक बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता का मूल्य कमतर नहीं होगा."

सेनगुप्ता एक पेशेवर वकील रहे हैं जो बाद में राजनीति में आए. वे 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोरिल्ला कमांडर के तौर पर हिस्सा ले चुके हैं.

1972 के बांग्लादेशी संविधान में अल्लाह शब्द का इस्तेमाल नहीं था- इसकी जगह बांग्ला शब्द सृष्टिकोर्ता (रचियता) का इस्तेमाल किया गया.

इसे ज़िया उर रहमान और एचएम इरशाद के 15 सालों के शासन के दौरान दो संशोधनों में बदला गया.

यह 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान की तख़्तापलट में हुई मौत के बाद हुआ था.

Image caption बांग्लादेशी नेता सलाहउद्दीन क़ादिर चौधरी को भी फांसी दी जा चुकी है.

मुजीब की बेटी शेख हसीना के जनवरी 2009 में सत्ता में आने के बाद शुरू हुए युद्ध अपराध के मामलों की सुनवाई के दौरान बांग्लादेश ने अपनी खोई हुई धर्मनिरपेक्षता को फिर से हासिल करने की कोशिश की.

अटॉर्नी जनरल महबूब आलम कहते हैं कि 1971 के मुक्ति आंदोलन के सभी युद्ध अपराधियों पर हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराने के आरोप हैं.

जमात-ए-इस्लामी महासचिव अली हसन महमूद मुजाहिद और बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी की प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पूर्व संसदीय सलाहकार सलाहुद्दीन क़ादिर चौधरी को फ़ांसी देने के बाद आलम ने पत्रकारों से कहा था, "जबरन धर्मांतरण हमारे संविधान के मुताबिक़ अपराध है. हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं और हमें हमारी भाषा और संस्कृति के चलते स्वतंत्रता मिली थी. धर्म एक निजी मसला है और किसी को किसी के धर्मांतरण का अधिकार नहीं हो सकता."

वास्तव में चौधरी पर आरोप था कि उन्होंने कुंदेश्वरी औषधालय के मालिक और समाजसेवी नूतन चंद्र सिंह की हत्या की और सुल्तानपुर और उसत्तारा पारा के इलाके में हिंदुओं के नरसंहार को अंजाम दिया था.

नूतन चंद्र सिंह के बेटे प्रफुल्ल ने कहा, "मेरे पिता की आत्मा को अब शांति मिली होगी. सलाहुद्दीन हिंदुओं के लिए आतंक से कम नहीं था."

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Image caption प्रधानमंत्री शेख हसीना बांग्लादेशी कैबिनेट की बैठक में.

सलाहुद्दीन क़ादिर चिटगांव से सात बार सांसद बने थे. इलाक़े के हिंदू उनकी फांसी के बाद भी जश्न मनाने नहीं निकले. उन्हें सलाहुद्दीन समर्थकों के हमले का डर था.

प्रफुल्ल सिंह कहते हैं, "लेकिन आपको ऐसा एक भी हिंदू नहीं मिलेगा जिसने निजी तौर पर सलाहुद्दीन की फांसी का जश्न न मनाया हो."

अटॉर्नी जनरल मेहबूब आलम ने कहा, "युद्ध अपराध के मामलों में जिन्हें फांसी दी गई है या मौत की सज़ा मिली, वो सब हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण कराने के आरोपी थे और इन्होंने उस समुदाय पर काफ़ी अत्याचार किया था."

अब्दुल कादिर मुल्ला और मोहम्मद कमरूज़्ज़मां को भी इन्हीं आरोपों के चलते फांसी दी गई.

जिन्हें फांसी की सजा मिली है, उनमें कई ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. इनमें जमात-ए-इस्लामी के पूर्व प्रमुख मोतिउररहमान निज़ामी भी हैं. उन पर 1971 में हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराने का आरोप है.

चिटगांव के स्थानीय पत्रकार सुमी ख़ान कहते हैं, "वे पाकिस्तानी आदर्श लागू करने की कोशिश में थे, जिनका हमारे धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान नहीं था. धर्मनिरपेक्षता के लिए हम फिर से अपना ख़ून बहाने को तैयार हैं."

युद्ध अपराधियों के लिए मौत की सज़ा मांगने वाली एकतोत्तर घटक और दलाल निर्मूल समिति के महासचिव काज़ी मुकुल कहते हैं, "हमारे बंगाली देश के हिंदू हिस्सा हैं. वे हमारी संस्कृति, पर्यावरण में शामिल हैं. वे हमारे अपने हैं. अच्छी बात यह है कि हिंदुओं को सताने वाले इन हत्यारों को अब फांसी की सज़ा दी गई है."

युद्ध अपराधियों की मौत की सज़ा मांगने वाले अभियान शाहबाग अपराइज़िंग का नेतृत्व करने वाले इमरान सरकार तो यहां तक कहते हैं कि बांग्लादेश को पाकिस्तान से कोई संबंध नहीं रखना चाहिए.

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आरोपियों को फांसी देने पर जश्न मनाते हुए सरकार कहते हैं, "उन्होंने हमारे लोगों की हत्या की है. वे युद्ध अपराधियों का साथ दे रहे हैं. मज़हबी राज्य बनाने के उनके विचार को हम ख़ारिज करते हैं. खून की नदियां बहने के बाद हमारा देश बना है, यह कभी नहीं बदलेगा."

हालांकि पश्चिमी मानवाधिकार समूह और सरकारें, बांग्लादेश के युद्ध अपराधियों के मामलों में खामियां होने की बात दोहराते रहे हैं.

लेकिन बांग्लादेश के हिंदुओं को देर से ही सही पर न्याय मिला है.

वैसे एक सच्चाई यह भी है कि अवामी लीग के नेता अब मोदी सरकार के उस फ़ैसले से चिंतित हैं जिसके तहत भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के लोगों को अपने यहां रहने की जगह देने को तैयार है.

बांग्लादेश के उद्योग मंत्री आमिर हुसेन अमू कहते हैं, "इससे हमारे देश छोड़कर जाने वाले हिंदु उत्साहित होंगे. हम ऐसा नहीं चाहते. इससे हमारी धर्मनिरपेक्षता की जड़ें कमज़ोर होंगी."

निजी बातचीत में अवामी लीग के कई नेता मानते हैं कि उनकी पार्टी नहीं चाहती कि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी कम हो.

चुनाव विश्लेषकों के मुताबिक़ 300 संसदीय सीटों में कम से कम 55 पर 10 फ़ीसदी हिंदू आबादी निर्णायक भूमिका में है. इनका मत ज़्यादतर मौक़ों पर अवामी लीग के पक्ष में जाता रहा है.

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बांग्लादेश के चुनाव (1972-2014) के लेखक शम्सुल अरेफ़िन ने कहा, "अवामी लीग हिंदुओं का वोट बैंक खोने का ख़तरा मोल नहीं ले सकती. इन वोटों के चलते हर छह में से एक सीट पर अवामी लीग बिना किसी प्रतिस्पर्धा के आसानी से जीत लेती है."

अवामी लीग परंपरागत तौर पर भी भारत की दोस्त रही है और पार्टी भारत की आलोचना से बचती रही है. मगर मोदी सरकार के फ़ैसले से बांग्लादेश के सत्तारूढ़ दल में बेचैनी बढ़ी है.

अवामी युवा लीग के सचिव जहांगीर कबीर नानक कहते हैं, "हिंदू बांग्लादेश छोड़कर भारत न जाएं, यह हम सुनिश्चित करेंगे."

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