'मैंने ख़ुदकुशी के बारे में सोचा, लेकिन..'

रज़िया
Image caption रज़िया का कहना है कि उनकी गर्भावस्था उनके लिए दुस्वप्न बन गई थी

मध्य पाकिस्तान के एक दूरदराज़ के गांव में एक युवती असहनीय प्रसव पीड़ा में है है. उसकी मदद के लिए मीलों दूर तक कोई प्रशिक्षित दाई या डॉक्टर नहीं.

ये हाल दक्षिणी पंजाब के रहीमयार ख़ान ज़िले तक ही सीमित नहीं है. कई और इलाक़ों में भी कुछ ऐसे ही हालात हैं.

जो मदद उन्हें मिल सकती है, वह है पड़ोस की दाई या बरसों से बच्चे पैदा करवाने का काम करती आ रही महिला. इन्हें किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं मिलता.

फिर भी, वो सब कुछ करती हैं जितना वो जानती हैं. मसलन हाथों से धक्का देना और ज़ोर लगाना. दर्द और बढ़ता है और रज़िया चिल्लाते हुए बेहोश हो जाती है.

उसकी ये अग्निपरीक्षा तक़रीबन चार दिन चलती है. आख़िर में दाई किसी तरह से वो निकाल पाती है जो ज़िंदा रहने पर एक बच्ची होती.

अपने पहले बच्चे को खोने का ग़म ही कुछ कम था कि रज़िया गंभीर बीमारियों की चपेट में भी आ जाती है. लेकिन दाई उसे दिलासा देती है, ''चिंता मत करो. कुछ समय में ठीक हो जाएगा.''

लेकिन रज़िया की हालत और बिगड़ती है और उसकी योनि से पेशाब और मल निकलना शुरू हो जाता है.

रज़िया नहीं जानती कि उसे फिस्टुला हो गया है- हालांकि यह पूरी तरह ठीक हो सकने वाला रोग है, लेकिन तब नहीं जब आप वहां रह रहे हों, जहां रज़िया रहती है.

रज़िया कहती हैं, ''कमर से नीचे मेरे कपड़े हमेशा गीले और महकते रहते. मैं हर समय इस दुर्गंध को महसूस कर सकती थी. मैं असहाय महसूस कर रही थी.''

वह कहती हैं, ''कुछ पड़ोसी और रिश्तेदारों ने मेरा तिरस्कार किया. कुछ मेरा मज़ाक उड़ाते और कहते कि ज़रूर मैंने कुछ किया होगा, जिसका मुझे ये फल मिला है.”

लेकिन रज़िया का दोष सिर्फ़ इतना था कि वह ग़रीब परिवार में पैदा हुई और वंशानुगत बीमारी उनके साथ थी.

Image caption अपने पति और बच्चों के साथ रज़िया

एक देश जहाँ लड़कों को सिर आंखों पर बिठाया जाता है, वहाँ अंधेपन की शिकार एक लड़की की क्या स्थिति होगी, अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं. उसे कभी स्कूल नहीं भेजा गया, जबकि उसने बचपन में ही क़ुरान की कई आयतें कंठस्थ कर ली थीं.

जब वह जवान हुई तो उसकी शादी ऐसे शख्स से कर दी गई जिसे वे जानती तक नहीं थीं. पति सड़क दुर्घटना में मारे गए और वह जल्द ही विधवा भी हो गईं. पति की मौत के समय वह छह महीने की गर्भवती थीं.

बुज़ुर्ग ससुर के साथ रह रही रज़िया के लिए प्रसव पीड़ा दु:स्वप्न ही साबित हुआ. रज़िया खुद बताती हैं कि यह ''अंधा होने से और बुरा था.''

यूरोप और अमरीका में फिस्टुला के बारे में अब शायद ही कोई जानता हो, क्योंकि वहां प्रसूति के बारे में आधुनिक देखभाल और इलाज उपलब्ध हैं.

मगर दुनियाभर में अब भी क़रीब 20 लाख महिलाएं इससे पीड़ित हैं. इनमें ज़्यादातर अफ्रीका और दक्षिण एशिया में हैं.

पाकिस्तान उन देशों में है जहां मातृत्व मृत्यु दर सबसे अधिक है. यहां की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार का बोलबाला है और ये नाकाम साबित हो रही हैं.

अमीर और ग़रीब की बीच बड़ी खाई है. यानी शहरी क्षेत्रों में कुछ लोग महंगी निजी स्वास्थ्य सुविधाएं ले सकते हैं तो ग्रामीण इलाक़ों, ख़ासकर सिंध और बलूचिस्तान में अधिकांश लोगों को मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाएं भी सुलभ नहीं हैं.

दुनियाभर से फिस्टुला खत्म करने के अभियान में पाकिस्तान के प्रोजेक्ट मैनेजर डॉक्टर सज्जाद सिद्दीक़ी कहते हैं, ''फिस्टुला से वो ग़रीब महिलाएं सर्वाधिक प्रभावित हैं जिन्हें मूलभूत स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधा भी उपलब्ध नहीं है.''

उनका कहना है कि क्योंकि इन मरीज़ों की हैसियत आमतौर पर आवाज़ उठाने की नहीं है, इसलिए कोई उनकी परवाह नहीं करता.

रज़िया कहती हैं, ''मैंने ख़ुदकुशी के बारे में सोचा, लेकिन हमेशा किसी न किसी चीज़ ने मुझे रोक दिया. मुझे लगता है मैंने पूरी तरह से उम्मीद नहीं छोड़ी थी.''

एक दिन रज़िया ने गाँव छोड़ दिया और अकेले ट्रेन में बैठकर कराची आ गई. यहां किसी तरह वह नेशनल फिस्टुला सेंटर में भर्ती होने में कामयाब रहीं.

डॉक्टर शेरशाह सैयद कहते हैं, ''रज़िया जिन हालात से गुज़री थीं, वह बहुत मुश्किल था. लेकिन मैं उसके साहस और संघर्ष करने की क्षमता से स्तब्ध था और मैंने उसे एक चुनौती के रूप में लिया.''

अगले कुछ महीने रज़िया का अस्पताल में मुफ़्त इलाज हुआ और कई ऑपरेशनों के बाद उन्हें उनकी असल ज़िंदगी वापस मिल पाई.

उन्होंने फिर से विवाह किया और जब डॉक्टरों ने नवदंपत्ति को साफ़ बताया कि रज़िया कभी मां नहीं बन पाएंगी तो उन्होंने रिश्तेदारी में एक लड़की को गोद ले लिया.

लेकिन, इस साल की शुरुआत में उन्होंने एक बार फिर डॉक्टरों को हैरान कर दिया, जब वे गर्भवती हो गईं.

डॉक्टर सैयद कहते हैं, ''हमें यक़ीन नहीं हुआ. किसी महिला के लिए इतनी जटिलता के बाद गर्भधारण करना विरले ही होता है और उन्होंने ऐसा कर दिया था.''

रज़िया कहती हैं, ''मैं अब बहुत ख़ुश हूं. इस छोटे से उत्साह ने मेरी सारी पीड़ा भुला दी है.''

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