बेल्जियम से ग़ज़ा तक एक राइफ़ल का सफ़र

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Image caption एफ़2000 राइफ़ल लिए अल कुद्स ब्रिगेड का फ़ाइटर.

तीन साल पहले एक हथियार विशेषज्ञ ने ग़ज़ा के चरमपंथियों के हाथ में बेल्जियम की बनी एक अत्याधुनिक राइफ़ल देखी थी.

सवाल ये कि यूरोपीय संघ और अमरीका से प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन के पास ऐसा हथियार पहुँचा कैसे?

हथियार विशेषज्ञ निक जेनज़ेन-जोन्स और बीबीसी के थॉमस मार्टिनसेन ने इस राइफ़ल के सफ़र की पड़ताल की.

फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद की हथियारबंद शाखा अल कुद्स ब्रिगेड ने इज़राइली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद के हाथों अपने नेता की हत्या की 17वीं सालगिरह पर दक्षिणी ग़ज़ा के रफ़ाह में एक परेड की.

दो अक्टूबर 2012 की इस वार्षिक परेड में चरमपंथी अक्सर अपने अत्याधुनिक हथियार और गोले बारूद का प्रदर्शन करते हैं. इसी परेड में दो नए हथियार दिखे. एक था बेल्जियन एफ़2000 और रशियन एके-103 राइफ़ल.

हालांकि इससे पहले ये दोनों हथियार चरमपंथी समूह में शायद ही कभी दिखे थे.

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इससे एक साल पहले लीबियाई गृहयुद्ध के दौरान गद्दाफ़ी समर्थक लड़ाकों और उसके बाद विद्रोही लड़ाकों के हाथ में बैरल के नीचे ग्रेनेड लॉन्चर लगी एफ़2000 राइफ़ल दिखी थीं. इसी लड़ाई में एके-103 की तीन राउंड बर्स्ट क्षमता वाली एक क़िस्म एके-103-2 राइफ़ल भी देखी गई.

लीबिया के एक विद्रोही लड़ाके, जिन्हें हम यहां अहमद कहेंगे, ने इस कहानी की कड़ियां जोड़ीं.

अगस्त 2011 में गद्दाफ़ी विद्रोही सेना जब त्रिपोली से हटी, तो अधिकांश विद्रोही ग्रुपों ने दक्षिणी शहरों सिरते और साभा का रुख़ किया.

साभा अहमद और दूसरे विद्रोहियों का अगला शहर था, लेकिन 20 सितंबर को गद्दाफ़ी की सेनाओं को शहर से खदेड़ने के दो दिन बाद ये विद्रोही पहुँचे.

शहर की आखिरी लड़ाई के एक दिन पहले अली नामक एक पूर्व छात्र की कहानी यहां काफ़ी चर्चित थी.

अली ने बताया, ''साभा के बाहर हमने एक चेकप्वाइंट बनाया था पर वहां कोई झंडा नहीं लगाया था. वहां गद्दाफ़ी की सेना की 32वीं ब्रिगेड की एक कार रुकी और आगे जाने की इजाज़त मांगी.''

कार में बैठे अफ़सर को पता नहीं चला कि ये चेक प्वाइंट विद्रोहियों का है.

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अली ने इस अफ़सर और उसके स्टाफ़ को गिरफ़्तार कर लिया और उनके पास एके सिरीज़ की दो राइफ़लों, सोने की कलई वाली पिस्तौल और दो अजीब सी दिखने वाली राइफ़लों, जिन्हें ग़लती से फ़्रेंच एफ़एन समझ लिया गया था, को अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

असल में 2008 में बेल्जियन राइफ़लें गद्दाफ़ी सरकार को बेचने का क़रार हुआ था.

छोटे हथियारों की यूरोप की सबसे बड़ी निर्यातक कंपनी एफ़एन हर्स्टल ने एफ़2000 राइफ़लें, एफ़एन303 लॉन्चर समेत दूसरे हथियारों का एक करोड़ 20लाख यूरो क़ीमत का सौदा किया था.

असल में संयुक्त राष्ट्र ने लीबिया को हथियार बेचने पर कई साल से पाबंदी लगा रखी थी. 2003 में सामूहिक नरसंहार के हथियार नष्ट करने पर सहमति के बाद यह पाबंदी हटा ली गई और इसके एक साल बाद यूरोपीय संघ ने भी प्रतिबंध हटा लिया.

तब लीबियाई सरकार ने सूडान के दार्फ़ुर इलाक़े तक सहायता पहुंचाने वाले काफ़िले को सुरक्षा देने के लिए इन हथियारों की ज़रूरत बताई थी.

पाबंदी हटाए जाने के पांच साल के अंदर यूरोपीय संघ ने लीबिया को 83.4 करोड़ यूरो के हथियार बेचने के लाइसेंस जारी कर दिए.

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Image caption अली के यूनिट में दो एफ़2000 राइफ़लें (सबसे बाएं और बीच में).

2009 तक ये हथियार लीबिया पहुंचे और 32वीं ब्रिगेड को इनसे लैस किया गया.

ह्यूमन राइट वॉच के मुताबिक़, इसी सैन्य टुकड़ी ने 23 अगस्त 2011 में त्रिपोली के सलाहद्दीन के पास 45 क़ैदियों समेत कई सामूहिक हत्याओं को अंजाम दिया था.

इस टुकड़ी का नाम गद्दाफ़ी के छोटे बेटे खामिस गद्दाफ़ी के नाम पर खामिस ब्रिगेड था. रूस भी लीबिया को हथियार दे रहा था.

पाबंदी हटने के बाद रूस और लीबिया में कई हथियार सौदे हुए. इन्हीं में से एक था एके-103-2 सेल्फ़ लोडिंग राइफ़ल.

ह्यूमन राइट्स वॉच, इंटेलिजेंस कंसल्टेंसी अर्मामेंट रिसर्च सर्विस (एआरईएस) और अन्य एनजीओ को मिले सुबूतों के मुताबिक़ अप्रैल 2004 में एके-103-2 राइफ़लों के कम से कम तीन ऑर्डर दिए गए.

इसी साल 60,000 राइफ़लों की डिलीवरी हो गई और 2011 में गृहयुद्ध छिड़ने के वक़्त तक देश में दो लाख एके-103-2 राइफ़लें पहुँच चुकी थीं.

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लड़ाई ख़त्म हुई तो अली ने अपने हथियार और एक एफ़2000 राइफ़ल अंतरिम सरकार को सौंप दी.

लेकिन दूसरी एफ़2000 राइफ़ल को मिसराता के ब्लैक मार्केट में एक हथियार सौदागर ख़ालिद को बेच दिया.

ख़ालिद ग़ज़ा में निःशुल्क हथियार पहुंचाने के लिए हथियारों इकट्ठे करता था.एआरईएस ने जब एक मध्यस्थ के मार्फ़त ख़ालिद से संपर्क किया तो उसने गज़ा के लिए हथियारों की शिपमेंट में एक एफ़2000 और एक एके-103-2 राइफ़ल भेजने की बात मानी.

उसने बताया, ''हमने इन्हें ग़ज़ा के लोगों की मदद के लिए भेजा.''

जिस तरह लीबियाई विद्रोहियों को एफ़2000 को फ़्रेंच एफ़एन समझने की ग़लती हुई उसी तरह एके-103-2 को भी इसराइली कलाश्निकोव समझने की भूल हुई.

ख़ालिद और उसके दोस्तों ने इसराइली हथियार समझकर इन्हें फ़लस्तीनी चरमपंथियों को सौंपा था.

अल-कुद्स ब्रिगेड ने अभी हाल ही में अपने पास एफ़2000 राइफ़ल होने की पुष्टि की थी.

हाल ही में मिस्र के सिनाई पेनिनसुला में चरमपंथियों के हाथों में भी ये राइफ़लें दिख चुकी हैं.

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ग़ज़ा और लीबिया जैसी ही ये राइफ़लें भी एलजी1 ग्रेनेड लॉन्चर से लैस थीं.

लीबिया में एके-103-2 राइफ़लें आम हैं और बीते अप्रैल में 30 इथोपियाई ईसाइयों को मारने में इस्लामिक स्टेट ने इन्हीं का इस्तेमाल किया था.

यहां से ये राइफ़लें मध्यपूर्व की सीमा पार कर उत्तरी अफ़्रीका तक पहुंच गई हैं.

फ़लस्तीन के हमास, पॉपुलर रेजिस्टेंस कमेटी और डेमोक्रेटिक फ़्रंट फ़ॉर द लिबरेशन ऑफ़ फ़लस्तीन जैसे संगठनों के लड़ाकों के हाथों में भी ये राइफ़लें दिख चुकी हैं.

लीबिया पर यूएन पैनल की रिपोर्ट में संकेत हैं कि एके-103 राइफ़लें माली, ट्यूनीशिया और नाइजीरिया में भी हैं.

मगर गृहयुद्ध के दौरान सिर्फ़ ये दोनों घातक हथियार ही लीबियाई हथियार गोदामों से नहीं लूटे गए थे.

लीबियाई सरकार ने खुद को अन्य अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया था और 2011 में इसके पतन के साथ ही पूरी दुनिया के चरमपंथियों के लिए यह एक पिटारा खुलने जैसा हो गया था.

(निक जेनज़ेन-जोन्स इंटेलिजेंस कंसल्टेंसी अर्मामेंट रिसर्च सर्विस के निदेशक हैं.)

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