अमरीकी ब्याज दरों में वृद्धि का असर किस पर

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अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत से 0.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है.

गुरुवार को अमरीका में बढ़ाई गई ब्याज दरें एक नए युग की शुरुआत हो सकती है. इसका एक असर उधार लेना मंहगा हो जाएगा - संभवतः सालों तक.

तो क्या लोगों को क्रिसमस मनाने का विचार त्याग देना चाहिए और फ़्रिज में भरने के लिए पैक फ़ूड ख़रीदना चाहिए या कंधे झाड़कर ऑनलाइन शॉपिंग में जुट जाना चाहिए?

देखते हैं कि क्या और कौन इससे प्रभावित होगा.

अमरीकी अर्थव्यवस्था पर असर

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अमरीका में बेरोज़गारी दर पांच प्रतिशत तक गिर गई है, जो पिछले कुछ सालों में सबसे कम है और वार्षिक वृद्धि दर मज़बूती के साथ 2.1 प्रतिशत पर है.

इसके बावजूद ब्याज दरें आपातकालीन स्थिति में हैं. सितंबर 2007 से दिसंबर 2008 के बीच मंदी टालने के लिए बेंचमार्क फ़ेडरल फंड्स रेट्स 5.25 प्रतिशत से गिरकर शून्य और 0.25 प्रतिशत पर आ गईं.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब ब्याज दरें बढ़ाने का समय आ गया है ताकि अतिरिक्त उपभोक्ता ऋण को रोका जा सके और हाउसिंग बाज़ार जैसे बुलबुले फूटने से बचा जा सके.

हालांकि उन कंपनियों को लेकर कुछ चिंता है जिन्होंने बहुत ज़्यादा कर्ज़ ले रखा है. बढ़ती ब्याज दरों की वजह से उनका कर्ज़ चुकाना मुश्किल या असंभव हो सकता है.

हालांकि अमरीकी उपभोक्ताओं पर इस वृद्धि का ख़ास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि 0.25 प्रतिशत की वृद्धि बहुत कम है और इससे अल्पकालिक ऋण पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा.

दूसरा, वित्तीय संकट से पहले के मुक़ाबले अब अमरीकी घरों पर कम दबाव है. न्यूयॉर्क फ़ेडरल रिज़र्व के अनुसार कुल जमा घरेलू ऋण 2008 के अधिकतम पांच प्रतिशत से कम है.

इसके अलावा अमरीकी घरों के मालिक ब्याज दरों को लेकर कम संवेदनशील हैं क्योंकि सामान्यतः ऋण दरें 30 साल के लिए स्थिर होती हैं.

उभरते बाज़ारों पर असर

वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई सूत्र वॉशिंगटन की फ़ेडरल रिज़र्व की इमारत में होने वाली घटनाओं को चीन और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों से जोड़ते हैं.

अमरीकी ब्याज दरें बढ़ने के दौर में डॉलर मज़बूत होने की उम्मीद है. इससे उन देशों और कंपनियों की तकलीफ़ बढ़ सकती है जिन्होंने डॉलर में ऋण बढ़ा लिया है. अगर उनकी आमदनी स्थानीय मुद्रा में अधिक है, तो डॉलर के महंगे होने से उनके लिए ऋण चुकाना भी महंगा हो जाएगा.

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अमरीकी ब्याज दरें बढ़ने से निवेशकों के जोखिम को देखने के तरीक़े पर भी असर पड़ता है. अगर वे अमरीका में निवेश से आकर्षक कमाई कर सकते हैं, तो हो सकता है कि वे दूरदराज़ के जोखिम भरे देशों में अपना निवेश बंद कर सकते हैं.

इसलिए विकासशील देशों में कंपनियां और सरकारों के लिए निवेश आकर्षित करना या मौजूदा ऋण के लिए फिर से वित्त जुटाना मुश्किल हो सकता है.

अंततः बहुत सी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ब्याज दरें ग़लत समय पर बढ़ी हैं, विशेषकर उनके लिए जो सामान के निर्यात पर निर्भर हैं. तेल, धातुओं और कृषि उत्पादों की क़ीमतें नाटकीय रूप से गिरी हैं.

इसलिए कंपनियों और सरकारों को ऐसे समय में ऋण की क़ीमत ज़्यादा चुकानी पड़ सकती है जब खनन और कृषि से आय गिर रही है.

मुद्रा बाज़ार पर असर

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मुद्रा बाज़ार ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव को लेकर बेहद संवेदनशील होता है. अमरीकी डॉलर पहले ही उच्च ब्याज दरों की उम्मीद से बढ़ रहा है.

अन्य मुद्राओं के मुक़ाबले डॉलर अक्टूबर से क़रीब चार प्रतिशत ऊपर है और ऐसा तब से है जब अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व प्रमुख जेनेल येलेन ने संकेत दिए थे कि दिसंबर में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं.

अर्थशास्त्री इसे लेकर आश्वस्त नहीं कि डॉलर अभी और कितना मज़बूत होगा और यह फ़ेडरल रिज़र्व के आगामी महीनों की कार्रवाइयों पर निर्भर करता है.

मज़बूत डॉलर का असर अभी से अमरीकी कंपनियों की आमदनी की रिपोर्टों में देखा जा सकता है. कई ने डॉलर की मज़बूती को घटते लाभ के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है, जिससे विदेशों में की जानी वाली बिक्री का मूल्य कम हो जाता है. इससे उनका निर्यात अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में कमज़ोर भी हो जाता है.

ब्रिटेन पर असर

बैंक ऑफ़ इंग्लैंड इससे इनकार करता है कि उसके फ़ैसलों पर अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व का असर पड़ता है.

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हालांकि अर्थशास्त्री कहते हैं कि चूंकि अब फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दर बढ़ाई है तो इससे बैंक ऑफ़ इंग्लैंड और उनके प्रमुख मार्क कार्ने के लिए दरें बढ़ाना आसान हो जाएगा.

ब्रितानी अर्थव्यवस्था तार्किक रूप से अमरीका के मुक़ाबले बेहतर स्थिति में है इसलिए बहुत से अर्थशास्त्री कहते हैं कि ब्याज दरों में वृद्धि बहुत दिनों से लंबित है.

अगर बैंक ऑफ़ इंग्लैंड फ़ेडरल रिज़र्व के रास्ते पर चलता है तो पाउंड भी बढ़ेगा. ख़ासतौर पर यूरो के मुक़ाबले. इससे बहुत से ब्रितानी निर्यातकों को तकलीफ़ होगी क्योंकि यूरोपियन यूनियन ब्रितानी वस्तुओं का सबसे बड़ा बाज़ार है.

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