'मेरा पैर लैंडमाइन पर पड़ा, मैं हवा में था'

पेशावर में एक साल पहले स्कूल में तालिबान के क़त्लेआम ने पाकिस्तान को चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभूतपूर्व फ़ौजी कार्रवाई करने को मजबूर किया.

मगर इसके लिए सेना के कई जवानों को बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है.

Image caption मुहम्मद यासिर

पाकिस्तानी फ़ौज के जवान मोहम्मद यासिर अपने नए पांव के साथ जीने की कोशिश कर रहे हैं.

12 हफ़्ते पहले वे चरमपंथियों के ख़िलाफ़ एक फ़ौजी मिशन पर थे. तब एक ग़लत क़दम की वजह से उनकी जान जाते-जाते बची. उनकी टुकड़ी के दो जवान हादसे में मारे गए थे.

वह बताते हैं, "चरमपंथी पहाड़ में बने बंकरों में छिपे थे. हम जैसे ही आगे बढ़े वो हम पर फ़ायरिंग करने लगे. तभी मेरा पैर एक लैंडमाइन पर पड़ गया. मैं कुछ देर के लिए हवा में उछला और जब नीचे गिरा तो मेरे पैर से खून निकल रहा था और बेहद दर्द हो रहा था."

Image caption कैप्टन जमशेद अनवर

मोहम्मद यासिर कुछ महीनों से उस अस्पताल में हैं, जहां हज़ार ज़ख़्मी जवानों का अब तक इलाज हो चुका है.

चरमपंथियों के ख़िलाफ़ फ़ौजी कार्रवाई की वजह से हादसों की तादाद काफ़ी बढ़ी है.

लोगों को उनसे हमदर्दी है पर कई को ताज्जुब है कि कैसे इतने दिनों तक देश के भीतर चरमपंथ का प्रसार होता रहा.

कैप्टन जमशेद अनवर फ़ौज के बड़े अफ़सर हैं. पांच साल पहले एक तालिबानी हमले का शिकार होने के बाद उनका करियर ख़त्म हो गया.

उन्होंने कहा, "जब मैं लड़ रहा था तो मेरे दिमाग़ में एक ही बात थी कि मुझे देश की रक्षा करनी है. मुझे अपनी मंगेतर को लेकर चिंता थी. मैंने सोचा कि अगर मैं दोबारा नहीं चल सका तो उसे छोड़ देना चाहिए. तब मुझे अपने चारों तरफ़ ज़़ख़्मी जवानों को देखकर आगे बढ़ने का हौसला बंधा."

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