2015 में 1.6 करोड़ बच्चे युद्धक्षेत्र में पैदा हुए

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संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ (संयुक्त राष्ट्र चिल्ड्रेन्स फ़ंड) के एक अध्ययन में पता चला है कि 2015 में एक करोड़ साठ लाख से अधिक बच्चे युद्ध क्षेत्रों में पैदा हुए हैं.

यह संख्या अपने आप में बच्चों की दयनीय स्थिति का बयान कर देती है.

बच्चों के लिए काम करने वाली इस संस्था के कार्यकारी निदेशक एंथनी लेक के मुताबिक़, “दुनियाभर में पैदा होने वाले हर आठ बच्चों में से एक बच्चा ऐसे क्षेत्रों में पैदा हो रहा है जहां हालात सामान्य नहीं हैं.”

इसमें अधिकतर बच्चे तो बिना किसी चिकित्सा सुविधा के बेहद कठिन परिस्थितियों में पैदा होते हैं.

यूनिसेफ़ के अनुसार इस बात की आशंका है कि इनमें अधिकांश बच्चे पांच वर्ष तक ज़िंदा भी न रह पाएं.

जो जीवित रह भी जाएंगे वे तनाव और अवसाद जैसी बीमारियों का शिकार बन जाएंगे. इससे उनकी सोचने समझने की क्षमता प्रभावित होगी.

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लेक के अनुसार, ''ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम आने वाले वर्ष में अपने वादों को हर हाल में ज़मीन पर उतारें, ख़ासकर जबकि हम कुछ ऐतिहासिक समझौतों को व्यवहार में लाने की बात कर रहे हों. हमें ध्यान रखना होगा कि हमारे बहुत सारे बच्चे अपना जीवन बेहद कठोर हालात में शुरु कर रहे हैं. युद्ध से लेकर प्राकृतिक आपदाओं, ग़रीबी और कुपोषण का शिकार बन रहे इन बच्चों का जीवन ख़तरे में है. इससे ज़्यादा किसी के जीवन की और क्या ख़राब शुरुआत हो सकती है.''

युद्धरत देशों इराक़, दक्षिणी सूडान, सीरिया और यमन आदि में नवजातों और इनकी माताओं को युद्ध से बचने के लिए जोखिम भरी यात्राएं करनी पड़ती हैं.

गर्भवतियों को बिना किसी मेडिकल हेल्प के प्रसव पीड़ा से गुज़रना पड़ता है.

लेक के मुताबिक़, ''हम चाहें तो 2016 को इन बच्चों के लिए निराशा की बजाए उम्मीदों भरा वर्ष बना सकते हैं, अगर हम संघर्ष के मसलों का ज़मीनी हल निकाल लें.''

2015 के पहले नौ महीनों में दो लाख से अधिक बच्चों ने यूरोपीय यूनियन के देशों में शरण मांगी है.

2014 में लगभग तीन करोड़ बच्चों को युद्ध, हिंसा और उत्पीड़न के चलते जबरन अपना घर छोड़ना पड़ा था.

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