क्या लोकतंत्र से डरते हैं मुस्लिम शासक?

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क्रिसमस पर पोप ने वेटिकन में चिंता जताई कि मध्य पूर्व के जिस इलाक़े में यीशु मसीह का जन्म हुआ और जहां से ईसाई धर्म पूरी दुनिया में फैला, वहां वह ख़ात्मे की दहलीज़ पर खड़ा है.

अभी कुछ दशक पहले तक इस क्षेत्र में केवल ईसाई ही नहीं यहूदी, पारसी और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यक बड़ी संख्या में मौजूद थे.

वर्ष 2015 के क्रिसमस के मौक़े पर जंग से जूझ रहे दमिश्क का एक मंज़र टीवी पर पूरी दुनिया में प्रसारित हुआ.

अंधेरे में डूबे इस ख़ूबसूरत ऐतिहासिक शहर में कुछ सहमे हुए बच्चे और उनके माता-पिता आपने पारंपरिक लिबास पहने क्रिसमस मना रहे थे.

जब से अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों ने सीरिया के गृहयुद्ध में हाथ डाला, तब से वहां धार्मिक अल्पसंख्यकों को बेहद अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है.

इस्लामिक स्टेट (आईएस) के रूप में सीरिया और इराक़ के एक बड़े हिस्से पर ऐसे सुन्नी धार्मिक कट्टरपंथियों का क़ब्ज़ा है, जिन्होंने अपने विरोधियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ उत्पीड़न, अत्याचार, हिंसा और रक्तपात का ऐसा इतिहास रचा है जिसका अतीत में बहुत कम उदाहरण मिलता है.

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Image caption हसानाल बोलकिया 1967 से ब्रुनेई के सुल्तान हैं.

क्रिसमस से कुछ दिन पहले ब्रुनेई के मुस्लिम शासक ने नया क़ानून लागू किया जिसके तहत उनकी सल्तनत में यदि कोई व्यक्ति क्रिसमस मनाता मिला या किसी के पास ऐसी कोई वस्तु मिली जो क्रिसमस में उपयोग होती है, तो उसे पांच साल की क़ैद हो सकती है.

क्रिसमस पर किसी को बधाई संदेश देने पर भी सज़ा का प्रावधान है.

एक समय था जब सऊदी अरब, सीरिया, इराक़, ईरान, मिस्र, मोरक्को, जॉर्डन, यमन अैर फलस्तीनी क्षेत्रों में मुसलमानों के साथ-साथ बड़ी संख्या में ईसाई, यहूदी, पारसी, यज़ीदी, दरवज़ और कई अन्य धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहा करते थे.

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Image caption सीरिया में राष्ट्रपति असद को सत्ता से हटाने के लिए साढ़े चार साल से गृहयुद्ध चल रहा है.

लेकिन धार्मिक उत्पीड़न, भेदभाव और घृणा के कारण धीरे-धीरे ये अल्पसंख्यक उन देशों से कहीं और चले गए या फिर ख़त्म हो गए.

धार्मिक अल्पसंख्यक ही नहीं मुसलमानों के विभिन्न अल्पसंख्यक समुदाय भी बहुसंख्यकों के अत्याचार और दमन का निशाना बनते रहे हैं.

दो देशों को छोड़कर दुनिया में मुसलमानों की बहुलता वाले किसी भी देश में अल्पसंख्यकों को धार्मिक स्वतंत्रता हासिल नहीं है.

सऊदी अरब ने तो मक्का और मदीना शहर में ही ग़ैर मुसलमानों के प्रवेश पर पाबंदी लगा रखी है.

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मुस्लिमबहुल अधिकांश देश सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन और संयुक्त अरब अमीरात की तरह किसी सुल्तान की सल्तनत हैं.

ईरान जैसे कई देश कट्टरपंथियों की गिरफ़्त में हैं. मिस्र और सीरिया जैसे देश अलग तरह के तानाशाहों के तहत आते हैं.

तुर्की, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश लोकतंत्र, तानाशाही और धार्मिकता के बीच उहापोह से गुज़र रहे हैं.

मध्य पूर्व की तरह ही भारत के उत्तरी इलाक़े में भी दुनिया के कई प्रमुख धर्मों की मौजूदगी रही है.

यहीं हिंदूवाद, बौद्ध धर्म, जैन और सिख धर्मों ने जन्म लिया. उनमें से ज़्यादातर एक दूसरे को चुनौती देते हुए अस्तित्व में आए.

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लेकिन हिंदूबहुल भारतीय लोकतंत्र में सभी धर्म फल-फूल रहे हैं. यहां हर धर्म को बराबर का दर्जा ही हासिल नहीं बल्कि उन्हें अपने धर्म के प्रचार और धर्म परिवर्तन का मौलिक अधिकार भी हासिल है. उनमें से कोई धर्म ख़त्म नहीं हुआ.

यही नहीं, सदियों से हर धर्म के लोग रहते हैं जो अपने देशों में सताए गए.

तो क्या मुस्लिम शासक स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की अवधारणा से भयभीत हैं?

क्या इन शासकों ने राजनीतिक और व्यक्तिगत लाभ के लिए धर्म को बंधक बना रखा है?

इसका जवाब इस हक़ीकत में छिपा है कि इन देशों की सत्ता में मौजूद लोग हर तरह की स्वतंत्रता और धार्मिक समानता का विरोध कर रहे हैं.

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