मंदी की आशंका, नौकरियों के लाले?

ब्रिक देशों के नेता. इमेज कॉपीरइट Getty

वित्तीय संस्था मॉर्गन स्टैनली ने 2016 में अर्थव्यवस्था की हालत और खस्ता होने की आशंका जताई है. वर्ल्ड बैंक और दूसरी संस्थाओं ने भी कई देशों में स्थिति बद से बदतर होने की आशंका ज़ाहिर की है.

दुनिया भर की कंपनियों के लिए उत्पाद तैयार करने वाले चीन की हालत अब भी सुधरती नहीं दिख रही है.

साल 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने ब्रिक यानि ब्राज़ील, रूस, इंडिया और चीन की अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ मिलाकर देखने का सुझाव दिया था. उन्होंने उम्मीद जताई थी कि ये चारों देश दुनिया भर में बढ़ती मांग की वजह बनेंगे.

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लेकिन अब ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खस्ता है. इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 115 सालों में उसकी अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी गिरावट की आशंका है.

सौ अर्थशास्त्रियों को भेजे गए सवालों के जवाब के अनुसार, 2016 में ब्राज़ील की अर्थव्यवस्था में 2.95 फ़ीसदी की गिरावट आ सकती है.

पिछले साल के आंकड़े अभी घोषित नहीं हुए हैं पर इन अर्थशास्त्रियों के जवाब के मुताबिक़ इसमें 3.71 फ़ीसदी की कमी आ सकती है.

ब्राज़ील में अंतिम बार लगातार दो साल अर्थव्यवस्था में गिरावट 1930 और 1931 में आई थी.

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ब्राज़ील में मुद्रास्फीति पिछले 12 साल में सबसे ऊंचे स्तर पर है जिसके कारण लोग पैसे खर्च नहीं कर रहे. अगर लोग पैसे नहीं खर्च करेंगे तो मांग में कमी के कारण अर्थव्यवस्था में गिरावट आ सकती है.

यूरोपियन बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (ईबीआरडी) ने कहा है कि रूस की अर्थव्यवस्था में 2016 में वृद्धि नहीं दिखेगी.

वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ लगातार दूसरे साल रूस की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होगी. ईबीआरडी के अनुसार रूस में पिछले साल की तरह वृद्धि में 1.8 फ़ीसदी की कमी आएगी.

सरकारी आंकड़ों पर अगर नज़र डालें तो ये बिलकुल अलग तस्वीर पेश करते हैं. रूस की सरकार ने 2015 के लिए 1.5 फ़ीसदी वृद्धि की उम्मीद की थी और 2016 के लिए 2.5 फ़ीसदी की वृद्धि की उम्मीद जताई है.

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वर्ल्ड बैंक को भी लगता है कि रूस की हालत ठीक नहीं है. इस रिपोर्ट के अनुसार 2015 में रूस की अर्थव्यवस्था में 3.5 फ़ीसदी की कमी आई और 2016 में स्थिति थोड़ी सुधरने की उम्मीद की जा सकती है, फिर भी अर्थव्यवस्था 0.6 फ़ीसदी घटेगी.

ओपेक देशों के अलावा, रूस कच्चे तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा असर रूस की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, चूंकि उसकी विदेश मुद्रा की 60 फ़ीसदी आय कच्चे तेल की बिक्री से होती है.

सरकार को होने वाले टैक्स की कमाई भी क़ीमतें गिरने से कम हो जाती है.

भारत की अर्थव्यवस्था की हालत भी डावांडोल है क्योंकि 11 महीने से निर्यात महीने दर महीने घट रहा है. नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं और कंपनियां पैसा खर्च करके नई फैक्ट्री लगाने को तैयार नहीं हैं.

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उनका मानना है कि बैंकों से कर्ज लेना बहुत महंगा है.

बैंक भी क़र्ज़ देने से घबरा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कहीं ये डूब न जाए. मोदी सरकार का 'मेक इन इंडिया' का नारा सिर्फ नारा ही लग रहा है.

मोदी सरकार से आर्थिक उदारीकरण के कार्यक्रम को तेज़ी से आगे ले जाने की उम्मीद की गई थी लेकिन सरकार ने वह मौक़ा गंवा दिया.

अब 18 महीने के कार्यकाल के बाद और दिल्ली और बिहार चुनाव हारने के बाद, सरकार को कड़े कदम उठाने से पहले दस बार सोचना होगा.

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में भी स्थिति बहुत बढ़िया नहीं है.

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सरकारी आकड़ों के अनुसार 2015 की पहली तीन तिमाही में उसकी अर्थव्यवस्था में सात फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है.

लेकिन मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, बिजली के उत्पादन और गाड़ियों की बिक्री और उसके जैसे दूसरे आंकड़ों को देखें तो ये बढ़त पांच फ़ीसदी के आसपास होने की उम्मीद की जा सकती है.

मॉर्गन स्टैनली के रुचिर शर्मा के अनुसार, अगली आर्थिक मंदी पर 'मेड इन चाइना' की मुहर लगी हो सकती है.

अगर चीन की अर्थव्यवस्था में और सुस्ती दिखाई देगी तो दुनिया भर पर उसका असर दिखाई देगा. दुनिया भर में 40 विकासशील देश हैं जिनके लिए चीन सबसे बड़ा निर्यात का बाज़ार है.

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ये देश चीन को वह कच्चा माल बेचते हैं जिससे वह प्रोडक्ट बना कर दुनिया भर की कंपनियों के लिए काम करता है.

पिछले साल की तरह ही 2016 में विश्व अर्थव्यवस्था में 2.5 फ़ीसदी वृद्धि आने की उम्मीद है.

अर्थशास्त्रियों के अनुसार अगर ये आंकड़ा दो फ़ीसदी के नीचे चला जाएगा तो दुनिया की अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी में चली जाएगी.

रुचिर शर्मा का कहना है कि अगर चीन जैसी अर्थव्यवस्था को एक भी झटका लगा तो दुनिया की अर्थव्यवस्था मंदी में जा सकती है.

अब 15 साल के इतिहास को देखकर ऐसा लग रहा है कि इन देशों के पांव के नीचे से ज़मीन खिसक रही है.

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2015 के ख़त्म होने के बाद अब दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों को ये डर सता रहा है कि अगर ब्रिक जैसे देशों में ये हालात हैं, तो छोटे देशों का क्या होगा.

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