'विकिपीडिया ने ज्ञान तक पहुंच आसान किया'

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Image caption विकिपीडिया साल 2001 में आज के दिन ही लांच किया गया था.

जब से सर फ़्रांसिस बेकन ने ‘Knowledge is power’ का सूत्र दुनिया को दिया तब से रह रह कर लोगों ने अनेक तरह से इसके आधार पर दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिश की है. विकिपीडिया, जिसे शुरू हुए शुक्रवार को 15 साल हो गए हैं, इसी सिलसिले की सबसे आधुनिक कड़ी है.

शायद विश्व में पहली बार एफ़्रैम चेम्बर्ज़ के द्वारा, 1728 में लोगों तक सीधी सरल भाषा में जानकारी पहुँचने का प्रयास किया गया.

चेम्बर्ज़ ने जानकारी वर्णानुक्रमक तरीक़े से सजाई और इस ग्रंथ को नाम दिया, ‘साइक्लोपीडिया, या आर्ट्स एंड साइंसेज का एक यूनिवर्सल शब्दकोश.”

लोगों में कलाओं और विज्ञान में तेज़ी से हो रही खोजों के बारे में इतनी लालसा थी की चेम्बर्ज़ की दो भागों वाली किताब बहुत प्रसिद्ध हो गई.

पर हर चीज़ के बारे में केवल एक आदमी कितनी जानकारी दे सकता था?

सो, कुछ साल बाद फ़्रांस में पहली बार ज्ञानार्जन की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए एक विशेष प्रयास किया गया. कोई सौ विशेषज्ञों को मिला कर Denis Diderot और Jean le Rond d'Alembert के नेतृत्व में क्रमिक तरीक़े से जानकारी एकत्रित करके, सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने की एक कोशिश की गयी.

सारी जानकारी वर्णानुक्रमक रखी गई, उस ही तरह जैसे कि शब्दकोश में शब्द वर्णानुक्रमक रखे जाते हैं.

इस प्रयास से निकलने वाले ग्रंथ का नाम रखा गया “विज्ञान, कला, शिल्प और तर्क शब्दकोश”.

नाम के अनुरूप, इसमें विज्ञान, कला, शिल्प और तर्क से सम्बंधित बहुत सारी बातों पर छोटी छोटी, जानकारी से परिपूर्ण कई हज़ार लेख थे.

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Image caption फ्रांस की क्रांति ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक नई दिशा दी.

डिडेरो का कहना था कि लोगों तक इस तरह से जानकारी पहुँचा कर वह उनके सोचने के तरीक़े बदलना चाहते थे.

इतिहासकार तो यहाँ तक कहते हैं कि इस नई सोच के कारण ही फ़्रान्स में 1789 में क्रांति आई, पुरानी राज्य व्यवस्था ख़त्म हो गयी और आधुनक विश्व की पहली आधुनिक सरकार बनी.

विकिपीडिया इस तरह का तो कोई राजनैतिक उद्देश्य नहीं रखती पर इसमें कोई शक नहीं कि ज्ञान विज्ञान की बातों को सीधे सरल तरीक़े से आम जनता तक पहुँचाने में विकिपीडीया का कोई सानी नहीं. सबसे बड़ी बात तो यह कि विकी ने ज्ञानियों से ज्ञान सृजन के एकाधिकार को छीन लिया है.

विकी द्वारा साधारण लोगों को ज्ञान निर्माण के कार्य में शामिल कर लेने से ज्ञानियों के ज्ञान बघारने की प्रवृत्ति को एक नई चुनौती आन पड़ी है. अब साधारण जन भी जानकारी को आसानी से दोबारा जाँच सकते थे. शक होने पर आपत्ति ज़ाहिर कर सकते थे. कभी कभी यह लगता है कि विकीपीडिया के आने से ज्ञान का पाखंड करने वालों की शामत आ गयई.

विकी की मौजूदगी के कारण ज्ञान सृजन करने वालों पर बड़ा दबाव बढ़ा. अब रिसर्चर जो बात कहता है, उसे विकिपीडिया में उपलब्ध जानकारी से कहीं ज़्यादा पुख़्ता होना ज़रूरी हो गया है. पहले कोई भी, थोड़े से शोध के बाद अपने शोध प्रबंध के अद्वितीय होने का दावा कर सकता था. अब ज्ञान का तक़ाज़ा यह हो गया कि विकिपीडिया से कहीं ज़्यादा जानकारी हो, कहीं ज़्यादा विशिष्ट हो, और कहीं ज़्यादा हुनर से पेश की गई हो.

अब हर कोई ज्ञान सृजन की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है, उपलब्ध जानकारी के बारे में अपने संदेह और समवेदनाएँ सबके सामने रख सकता है और अपेक्षा कर सकता कि ज्ञान-रचना की प्रक्रिया में इनका भी ध्यान रखा जाए.

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संक्षेप में कहें तो विकिपीडिया के कारण ज्ञान पर पेशेवर ज्ञानियों का एकाधिकार डोल गया है. ज्ञान का सामन्यीकरण हो गया.

विकिपीडिया पढ़कर अब हर कोई किसी भी तरह की जानकारी हासिल कर सकता था. अपने पास मौजूद विशिष्ट जानकारी को इसके ज़रिए दूसरों से साझा कर सकने की सम्भावनांए बढ़ गई हैं.

ऐसा नहीं कि ज्ञानियों ने विकिपीडिया को हमेशा स्वागत किया हो. इसका जम कर विरोध हुआ.

इसपर पर दो बड़े आक्षेप लगे. सबसे बड़ा आक्षेप तो यह कि इसकी जानकारी विश्वसनीय नहीं होती - क्योंकि इस जानकारी को ज्ञानियों ने नहीं गढ़ा. दूसरा, कि इसके कारण विद्यार्थियों ने पढ़ना लिखना छोड़ दिया है. सोचना विचारना छोड़ दिया है. बस विकिपीडिया का सहारा लिया और उसमें कही बातों को बग़ैर किसी पद्धतिबद्ध मूल्याँकन के, दोहरा दिया.

बात तो वैसे सही है. यदि विद्यार्थी विकिपीडिया का इस्तेमाल करके, काटो और चिपकाओ प्रणाली के ज़रिए अपना काम चलाने की कोशिश करेगा तो शिक्षा उद्देश्यविहीन हो जाएगी.विद्यार्थी को सोचना और मूल्याँकन करना नहीं सिखा पाएगी.

यह भी समस्या रही कि विद्यार्थियों ने किताबें पढ़नी बंद कर दीं. पर दूसरी तरफ़ देखें तो विकिपीडिया के कारण विद्यार्थियों को एक ही जगह, आसानी से कम से कम किसी भी विषय के बारे में प्राथमिक जानकारी मिलने की सम्भावनाएँ बढ़ गयीं हैं.

किसी भी विश्वकोश का इतना ही उद्देश्य होता है, कि लोगों तक प्राथमिक जानकारी पहुँच सके. इसके बाद तो लोगों को ज़्यादा विशेषज्ञता वाले स्त्रोतों का ही इस्तेमाल करना होगा.

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