सुलझ गया किपलिंग के लापता बेटे का रहस्य!

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Image caption रुडयार्ड और उनके बेटे के रिश्तों पर 1997 में एक नाटक 'माय ब्वाय जैक' तैयार हुआ था. बाद में टीवी के लिए इसी नाटक में डेविड हेग ने रुडयार्ड किपलिंग और हैरी पॉटर स्टार डेनियल रेडक्लिफ़ ने उनके बेटे जॉन किपलिंग की भूमिका निभाई थी.

जंगल बुक के लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किपलिंग की मौत के 80 साल बाद शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने किपलिंग के बेटे के लापता होने का रहस्य सुलझा लिया है.

किपलिंग के बेटे जॉन किपलिंग प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लापता हो गए थे.

किपलिंग अपने दौर में ब्रिटेन में सर्वाधिक मशहूर लेखकों में से थे और साहित्य के लिए नोबेल पाने वाले पहले ब्रितानी भी.

किपलिंग का जन्म 1865 में भारत में हुआ था, लेकिन कुछ साल ही बीते थे कि उन्हें पोर्ट्समथ भेज दिया गया.

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फिर प्रथम विश्व युद्ध का बिगुल बजा. किपलिंग के बेटे जॉन भी ब्रितानी फौज में शामिल होने के उत्सुक थे. वो कमज़ोर आंखों के कारण नौसेना में तो भर्ती नहीं हो सके और आइरिश गार्ड में शामिल होने के लिए भी उन्हें अपने पिता के नाम का सहारा लेना पड़ा.

जॉन 17 अगस्त 1915 को फ्रांस पहुँचे तब वो 18 बरस के थे. इसके छह हफ्तों बाद उन्हें लूस की लड़ाई के लिए भेज दिया गया.

सैन्य इतिहासकार एच सेसिल कहते हैं, “ये लड़ाई ब्रिटेन के लिए तबाही साबित हुई. पहली बार नए स्वयंसेवी सैनिकों को जंग में उतारना पड़ा. माना जा रहा था कि इससे जीत मिल सकती थी, लेकिन इस लड़ाई में जानमाल का भारी नुकसान हुआ.”

27 सितंबर 1915 को जॉन की बटालियन को खुले मैदान को पार कर चाक पिट वुड की तरफ़ बढ़ने का हुक्म दिया गया. लेकिन वे जर्मन सैनिकों से घिर चुके थे और उन पर भारी मशीनगनों से गोलियां बरसाई जा रही थी. अगले कुछ घंटों में जॉन लापता हो गए.

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जोना लेग बताती हैं, “यहीं से भ्रम फैलाने वाली कहानियां शुरू होती हैं.” जॉन की आख़िरी गतिविधियों पर उनका अध्ययन वेस्टर्न फ्रंट एसोसिएशन में इसी हफ्ते प्रकाशित हुआ.

जंग के चश्मदीदों के बयान भी अलग-अलग हैं. कुछ का कहना है कि जॉन जर्मन सैनिकों की तरफ आगे बढ़ गए थे, जबकि दूसरों का दावा है कि जॉन और उनके साथी एक खेत की तरफ भाग गए थे.

बाद में जॉन के कर्नल ने लिखा था कि उन्हें दुश्मन की कतार के क़रीब देखा गया था. जॉन लड़खड़ा रहे थे और उनके सिर में चोट लगी हुई थी.

लेग कहती हैं, “मशीन गनों से भारी गोलीबारी हो रही थी और उस छोटे से इलाके में 1,000 से अधिक लोग थे.”

जॉन किपलिंग का शव बरामद नहीं हो सका.

रुडयार्ड किपलिंग ने अपने लापता बेटे को ढूंढने में चार साल लगाए. उन्होंने जॉन की बटालियन के साथियों को ढूंढा और अपने बेटे के बारे में उनसे पूछताछ की. उन्होंने कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से मुलाक़ात की और रेड क्रॉस से इस मामले की जाँच कराने की मांग की.

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Image caption जॉन किपलिंग को पूर्वी ससेक्स स्थित युद्ध स्मारक में याद किया गया है.

रुडयार्ड ने 1919 में यह मानते हुए सेना को खत लिखा कि उनका बेटा संभवत: मारा गया है.

युद्ध के बाद उनके जीवन में काफी बदलाव आ गया था. सार्वजनिक तौर पर वे ज़्यादा मुखर और नाराज़ दिखने लगे थे, लेकिन बतौर लेखक उनके लेखन में अधिक उदासी आ गई थी.

युद्ध के बाद किपलिंग ने एक कविता लिखी जो काफी मशहूर हुई, “अगर कोई सवाल है हम क्यों मरे, / उन्हें बताओ, क्योंकि हमारे पिता ने झूठ बोला था."

80 साल तक जॉन की मौत एक रहस्य ही रही. इसके बाद 1992 में कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन ने एक अज्ञात सैनिक की क़ब्र का पत्थर बदलकर जॉन किपलिंग का नाम दिया.

इस फ़ैसले पर खूब बहस हुई. जोआना लेग और ग्राहम पार्कर का मानना है कि अब उन्होंने इस विवादित क़ब्र का रहस्य सुलझा लिया है.

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लेकिन इसमें तीन समस्याएं थी. लेग कहती हैं, “पहला ये कि ये शव उस जगह से तीन मील दूर मिला जहाँ जॉन लड़ रहे थे. और अब हमें ये बताया जा रहा है कि ये लिपिकीय ग़लती थी.”

लेग कहती हैं, “हम जानते हैं कि लड़ाई के दौरान दूसरे अधिकारी को अस्पताल ले जाया गया था. उन्हें लड़ाई के मैदान से कुछ दूर दफ़नाया गया.”

तीसरा रहस्य जॉन की रैंक से जुड़ा है. जो शव मिला वो फ़र्स्ट लेफ्टिनेंट के सितारे वाले अधिकारी का था और किपलिंग आधिकारिक तौर पर सेकेंड लेफ्टिनेंट थे.

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लेग का कहना है कि ऐसा शायद जानकारी के अभाव में हुआ होगा- जॉन को जून में ही प्रोन्नत किया गया था.

लेग कहती हैं, “हम देख सकते हैं कि उन्हें फर्स्ट लेफ्टिनेंट का वेतन दिया जा रहा था.” जॉन अपनी बटालियन के इकलौते फर्स्ट लेफ्टिनेंट थे, जिनका शव नहीं मिल सका था और इस आधार पर लेग का कहना है कि वह शव जॉन किपलिंग का ही रहा होगा.

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