आधी रात के फ़ैसले से 'पाकिस्तान में सब हैरान'

पिछले दिनों पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्कूलों को हफ़्ते भर के लिए अचानक बंद करने के फ़ैसले ने पाकिस्तानी उर्दू मीडिया का ध्यान खींचा है.

रोज़नामा ‘दुनिया’ के संपादकीय का शीर्षक है- स्कूलों में छुट्टियां, भ्रम पैदा न किया जाए.

अख़बार के मुताबिक़ सरकार ने कहा कि स्कूलों को बढ़ती सर्दी के कारण बंद किया गया है, लेकिन ये अटकलें गर्म रहीं कि ऐसा चरमपंथी हमले की आशंका के मद्देनज़र किया गया है.

अख़बार कहता है कि लोग हैरत में इसलिए पड़े कि स्कूलों को बंद करने का फ़ैसला आधी रात को लिया गया और जो लोग इससे बेख़बर थे, वो सुबह बच्चों को स्कूल लेकर पहुँच गए.

अख़बार ने जहां ऐसे फ़ैसलों को मुनासिब समय पर करने की सलाह दी है ताकि कोई भ्रम न फैले, वहीं स्कूलों की सुरक्षा बेहतर करने पर भी ज़ोर दिया है.

लेकिन 'जंग' लिखता है कि भ्रम विभिन्न स्तरों से होने वाली घोषणाओं से फैल रहा है.

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अख़बार के मुताबिक़़ कभी कहा जाता है कि अचानक सर्दी बढ़ने से यह क़दम उठाया गया है तो कभी इसकी वजह दहशतगर्दों की तरफ़ से शिक्षण संस्थानों पर संभावित हमलों के बारे में मिलने वाली सूचना को बताया जाता है.

अख़बार कहता है कि दहशतगर्दों से निपटने के लिए सुरक्षा को बेहतर बनाया जाना चाहिए, लेकिन जनता से इस बारे में पहेलियां बुझाने के बजाय उसे सब कुछ साफ़-साफ़ बताया जाना चाहिए.

वहीं ‘औसाफ़’ लिखता है कि शिक्षण संस्थाएं दहशतगर्दों की हिटलिस्ट पर हैं.

अख़बार कहता है कि सरकार ने प्राइवेट स्कूलों की सुरक्षा के लिए तो प्रबंध किए हैं, लेकिन आम स्कूलों में छात्र और अध्यापक सुरक्षित नहीं हैं.

इस सिलसिले में अख़बार ने उन रिपोर्टों का हवाला भी दिया है जिनके मुताबिक़ 13 आत्मघाती हमलावर पाकिस्तान में दाख़िल हो चुके हैं.

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Image caption पेशावर आर्मी स्कूल पर हमले के बाद चरमपंथियों ने हाल में बाचा ख़ान यूनिवर्सिटी को निशाना बनाया

रोज़नामा 'पाकिस्तान' का संपादकीय है- नागरिकों और पुलिस का सहयोग, रेलवे लाइन बच गई.

अख़बार लिखता है कि घटना पंजाब के दीना इलाक़े की है जहां एक चरमपंथी रेलवे लाइन उड़ाने के लिए बम बांध रहा था कि एक किसान ने उसे देख लिया.

अख़बार के मुताबिक़़ सूचना देने पर पुलिस ने भी कोई देर नहीं की और उसके इरादों को नाकाम कर दिया, लेकिन इस बीच हमलावर ने ख़ुद को उड़ा लिया.

अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ असल और प्रभावी कार्रवाई तभी हो सकती है जब आम नागरिक संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रखें और प्रशासन के साथ पूरा सहयोग करें.

उधर 'नवा-ए-वक़्त' ने भारत के साथ कारोबार में पाकिस्तान को हो रहे नुक़सान का मुद्दा उठाया है.

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अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान को भारत से होने वाले आयात में इज़ाफ़ा हुआ है, जबकि निर्यात घट रहा है और इससे पाकिस्तान को 64 करोड़ 76 लाख डॉलर का घाटा हुआ है.

अख़बार ने इस सिलसिले में पाकिस्तानी हुकमरानों को आड़े हाथ लिया है जो उसके मुताबिक़ भारत से तिजारत का राग अलापते हैं.

रुख़ भारत का करें तो 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की हालिया किताब 'द टरबुलेंट ईयर्स 1980-1996' पर संपादकीय लिखा है जिसके मुताबिक़़ अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना उस वक़्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी का ग़लत फ़ैसला था और बाबरी मस्जिद का गिराया जाना पूरी तरह धोखा था, जिससे भारत की छवि ख़राब हुई.

अख़बार के मुताबिक़़ मुखर्जी लिखते हैं कि मस्जिद गिरने से न बचा पाना तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव की नाकामी थी.

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किताब में प्रणव इन बातों को कोरी अटकलें बताते हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वह अंतरिम प्रधानमंत्री बनना चाहते थे

अख़बार के मुताबिक़ ये किताब मुखर्जी के संस्मरणों का दूसरा हिस्सा है और उन्होंने वादा किया है कि तीसरा हिस्सा भी जल्द जाएगा.

वहीं रोज़ानामा 'ख़बरें' ने अरुणाचल प्रदेश के सियासी संकट को लेकर केंद्र सरकार और गवर्नर की मंशा पर सवाल उठाया है.

अख़बार कहता है कि निवर्तमान मुख्यमंत्री नाबाम टुकी अब भी 31 विधायकों के साथ बहुमत का दावा कर रहे हैं, ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं होगा कि नई सरकार का फ़ैसला राजभवन के बजाय विधानसभा में हो.

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