पाकिस्तान में भगत सिंह का केस दोबारा खुला

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लाहौर हाई कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह की फांसी का मुक़दमा दोबारा खोलने के लिए एक बड़ी बेंच बनाने का आदेश दिया है.

भगत सिंह को 85 साल पहले 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी. उन पर इल्ज़ाम था कि उन्होंने एक ब्रितानी अधिकारी की हत्या की है.

इस मुक़दमे की नए सिरे से सुनवाई के लिए 'भगत सिंह मेमोरियल फ़ाउंडेशन' नाम के एक संगठन ने याचिका दायर की है.

इतने साल बाद ये याचिका क्यों दायर की गई है?

इस पर संगठन के अध्यक्ष इम्तियाज़ क़ुरैशी ने बीबीसी को बताया, ''इस केस में बहुत सारे पेंच थे. हमने शहीद भगत सिंह केस की एफ़आईआर निकलवाई. उसमें न भगत सिंह का नाम है, न राजगुरु का न सुखदेव का. ये तीनों बेगुनाह थे जिन्हें फांसी पर लटका दिया गया. इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका इंसाफ़ क्या इंसाफ़ था."

वो कहते हैं, "साढ़े चार सौ गवाहों को सफ़ाई का मौक़ा ही नहीं दिया गया. न तो क्रॉस एक्ज़ामिनेशन की इजाज़त दी गई. ये कैसा इंसाफ़ वो हमें देकर गए हैं.''

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राशिद क़ुरैशी की मांग है कि इस मुद्दे पर ब्रिटेन माफी मांगे और स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को भारी मुआवज़ा भी दे.

राशिद क़ुरैशी के मुताबिक भारत में भगत सिंह का परिवार चाहता है कि इस मामले को दोबारा खोला जाए और वह हाल ही में होशियारपुर होकर आए थे जहां उनका उनके परिवार से संपर्क हुआ.

तो क्या भारत में और भी किसी की इसे लेकर दिलचस्पी है? इस पर राशिद क़ुरैशी ने दावा किया कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और उर्दू के साहित्यकार मौलाना हसरत मोहानी के दामाद डॉ नफ़ीस अहमद सिद्दीक़ी के नेतृत्व में वकीलों का एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आएगा.

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Image caption पाकिस्तान के जड़ानवाला स्थित भगतपुर में भगत सिंह का घर

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