हिटलर का ये विमान बाज़ी पलट सकता था

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Image caption नॉर्थॉप ग्रनमैन की बग़ैर दुम के जहाज़ की परिकल्पना हॉर्टन की डिज़ाइन से मिलती जुलती है.

दूसरे विश्व युद्ध ख़त्म होने के कुछ ही महीने पहले जर्मनी ने एक ऐसे लड़ाकू विमान का परीक्षण किया, जो हवाई जहाज़ कम और स्पेसशिप या उड़न तश्तरी ज़्यादा लगता था.

दरअसल 'हॉर्टन हो 229' का डिज़ाइन, विमानन उद्योग के भविष्य का डिज़ाइन था और अपने समय से बहुत आगे था.

दशकों बाद बीते दिसंबर (2015) में जब हवाई जहाज़ बनाने वाली अमरीकी कंपनी नॉर्थ्रॉप ग्रनमैन ने भविष्य के लड़ाकू विमान के एक क्रांतिकारी डिज़ाइन को पेश किया तो लोगों को दूसरे विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में नाज़ी जर्मनी में बनाए गए एक लड़ाकू विमान के डिज़ाइन की याद आई.

विमानन विशेषज्ञ इसे 'फ़्लाइंग विंग' यानी 'उड़ने वाला पंख' कहते हैं.

इस डिज़ाइन में जहाज़ के अंत में लगने वाली पारंपरिक 'दुम' नहीं लगाई गई थी. इससे लड़ाकू जहाज़ का आकार छोटा हो गया और ये संभावना भी बढ़ गई कि यह विमान रडार की पकड़ में न आए.

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Image caption आज का लड़ाकू हवाई जहाज़

'हॉर्टन हो 229' विमान भले ही विमानन के इतिहास में हाशिए पर रहा हो लेकिन इस विमान का डिज़ाइन अपने समय से इतना आगे था कि कई वैज्ञानिक आज तक उस विमान के डिज़ाइन के पूरे रहस्य को ठीक से नहीं समझ पाए हैं.

नासा के एक वैज्ञानिक अभी भी यह पता लगाने में लगे हैं कि डिज़ाइन बनाने वाले एरोडायनेमिक्स की चुनौतियों से कैसे निपटे और किस तरह इसे उड़ने लायक़ बनाया क्योंकि उस समय विज्ञान का जितना विकास हुआ था उसके अनुसार इस विमान का उड़ना बहुत मुश्किल था.

दुम हवाई जहाज़ को स्थिर रखती है, इसे हिलने डुलने से रोकती है. इसके न रहने से जहाज़ पर क़ाबू रखना निहायत ही मुश्किल होता है.

दुम बग़ैर हवाई जहाज़ का उड़ना ही उस समय कल्पना से परे था.

पहली बार हवाई जहाज़ बनाने वाले राइट बंधुओं के लिए भी यह एक चुनौती थी. यही वजह 'हॉर्टन हो 229' का डिज़ाइन बनाने वाले जर्मनी के हॉर्टन बंधुओं की इस सफलता को ख़ास बनाती है और आज के वैज्ञानिक भी उनसे बहुत प्रभावित हैं.

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Image caption साल 1940 में जहाज़ों के पंख कुछ इस तरह के होते थे.

पहले विश्व युद्ध के बाद हुई वर्साय संधि (1919) की शर्तों के तहत जर्मनी वायु सेना नहीं रख सकता था.

दो जर्मन नागिरकों वॉल्टर हॉर्टन और राइमर हॉर्टन ने साल 1930 में ही हवाई जहाज़ की डिज़ाइन पर काम करना शुरू कर दिया था.

वर्साय संधि के प्रतिबंधों से बचने के लिए उन्होंने स्पोर्टिंग एयर क्लब की स्थापनी की. यही आगे चल कर नाज़ियों की वायु सेना लुफ़्तवैफ़े बनी.

यहां ग्लाइडर और 'सेलप्लेन' उड़ाना सीखने वाले कई लोग आगे चल कर लुफ़्तवैफ़ै के लड़ाकू पायलट बने.

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Image caption नासा को फ़्लाइंग विंग की परिकल्पना की प्रेरणा हो 229 की डिज़ाइन से मिली थी.

विमानन की एक वेबसाइट 'एयरोस्टोरीज़' के मुताबिक़, हॉर्टन भाइयों ने अपने घर में ही वर्कशॉप खोल ली थी. इसमें नए-नए डिज़ाइन तैयार किए जाते थे.

हॉर्टन बंधुओं ने डेल्टा विंग हवाई जहाज़ का डिज़ाइन बनाने वाले फ़्रेडरिक लिपिस्क से भी बहुत कुछ सीखा.

लिपिस्क के बनाए डिज़ाइन ने ही आगे चल कर जेट इंजन का रूप लिया.

हॉर्टन भाइयों ने इस पर काम करते हुए ही 'हॉर्टन हो 4' का डिज़ाइन तैयार किया.

जब तक 'हॉर्टन हो 4' का परीक्षण होता, वॉल्टर हॉर्टन जर्मनी की वायु सेना लुफ़्तवैफ़े के लड़ाकू पायलट बन चुके थे. उन्होंने 'ब्रिटेन की लड़ाई' में भी भाग लिया था.

वॉशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन एयर एंड स्पेस म्यूज़ियम के क्यूरेटर रस ली का मानना है कि यह युद्ध का निर्णायक मोड़ था.

Image caption जर्मन सैनिक

वह कहते हैं, "उस समय तक जर्मनी 'ब्रिटेन की लड़ाई' हार चुका था. वॉल्टर हॉर्टन ने महसूस किया कि उनके देश को नए क़िस्म के लड़ाकू विमान की ज़रूरत है".

इसी समय जर्मन वायु सेना लुफ्तवैफ़े के प्रमुख हर्मन गोरिंग ने '3x1000' नामक एक परियोजना पर काम करने को कहा.

इस परियोजना के तहत ऐसा लड़ाकू विमान बनाया जाना था, जो 1,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से उड़े, 1,000 किलोग्राम का बम 1,000 मील की दूरी तक ले जा सके.

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हॉर्टन ने इस पर काम करते हुए जो डिज़ाइन बनाए वो वास्तव में 'हो 229' के प्रोटोटाइप कहलाए. पहला प्रोटोटाइप ब़गैर किसी ईंधन के उड़ने वाला ग्लाइडर था.

दूसरे प्रोटोटाइप में एक जेट इंजन लगाया गया. इसका सफल परीक्षण 2 फ़रवरी 1945 को हुआ. लेकिन यह विमान कुछ हफ़्ते बाद होने वाले एक दूसरे परीक्षण में इंजन की गड़बड़ी के कारण हादसे का शिकार हो गया. इसका पायलट मारा गया.

लेकिन रस ली कहते हैं कि इस परीक्षण से यह तो साबित हो ही गया था कि यह हवाई जहाज़ उड़ान भर सकता था, उतर सकता था और इसका मूल डिज़ाइन सही था.

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Image caption हो 229 का प्रोटोटाइप

रस ली 'हो 229' के पीछे की पूरी कहानी जानते हैं. इसकी ख़ास वजह ये है कि इस कड़ी में बने तीसरे प्रोटोटाइप विमान 'हो 229 वी 3' को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. दूसरे युद्ध के ख़त्म होने और नाज़ियों की हार के बाद इसे लंदन होते हुए अमरीका ले जाया गया था.

ली कहते हैं, "हो 229 विमान के लिए तो क्रांतिकारी शब्द भी काफ़ी नहीं है. हॉर्टन इस क्षेत्र में दुनिया में सबसे आगे थे."

परमाणु बमों को ले जाने वाले अमरीकी लड़ाकू विमानों में प्रमुख हैसियत रखने वाले नॉर्थ्रॉप बी-2 विमान पहली नज़र में हॉर्टन बंधुओं के डिज़ाइन वाले विमान जैसे लगते हैं.

यहां तक कि कुछ विशेषज्ञों ने तो 'हो 229' को दुनिया का पहला 'स्टील्थ बॉम्बर' क़रार दिया है, हालांकि इसका काम जंग के दौरान जर्मनी के शहरों पर बम बरसा रहे दुश्मन के विमानों को निशाना बनाना था.

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Image caption नाज़ी हवाई जहाज़ों की बमबारी से हुई तबाही

हॉर्टन बंधुओं ने हवाई जहाज़ का संतुलन बनाए रखने के लिए इसके पंखों को लंबा और पतला बनाया था.

इससे जहाज़ का वज़न बड़े इलाक़े में फैल जाता था. इससे हवाई जहाज़ की रफ़्तार कम करने के लिए ज़रूरी तेज़ हवा का अनुपात भी कम हो जाता था.

राइमर हॉर्टन को शायद इसका अंदाज़ा नहीं था कि ऐसा करके वो एरोडायनेमिक्स सिद्धांत के दो अहम सवालों को एक साथ ही सुलझा रहे थे. कैलीफ़ोर्निया स्थित नील आर्मस्ट्रॉंग फ़्लाइट रिसर्च सेंटर में नासा के प्रमुख वैज्ञानिक अल-बोवर्स का तो यही मानना है.

वे हॉर्टन के डिज़ाइन पर कई साल से काम कर रहे हैं.

वे कहते हैं, "राइमर हॉर्टन ने घंटी के आकार के एक पंख का इस्तेमाल कर बग़ैर दुम वाले हवाई जहाज़ के साथ होने वाले संतुलन की समस्या का निपटारा कर लिया. उन्होंने इसके साथ ही जहाज़ की रफ़्तार कम होने की आशंका को भी कम कर दिया."

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Image caption अमरीकी 'स्टील्थ बॉम्बर' बी-2

हॉर्टन के डिज़ाइन ने एक दूसरे जर्मन वैज्ञानिक लुडविग प्रैंडटल के प्रयोग को भी सही साबित कर दिया. प्रैंडटल ने कहा था कि किसी विमान के उड़ने की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पंख का आकार और डिज़ाइन क्या है.

जैक नॉर्थ्रॉप को हॉर्टन के स्पोर्ट्स ग्लाइडर से काफ़ी प्रेरणा मिली थी. उनके ही प्रयासों के कारण 50 के दशक में फ्लाइंग विंग डिज़ाइन को काफ़ी प्रमुखता मिली थी.

नॉर्थ्रॉप ने 40 के दशक में वाईबी-35 विमान का परीक्षण किया जो विफल हुआ. उसके बाद हॉर्टन भाईयों से सबक़ लेकर उन्होंने वाईबी-49 विमान में जेट इंजन का इस्तेमाल किया जो कि सफल हुआ.

दशकों बाद कंपनी ने इसी तकनीक का इस्तेमाल कर 'बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर' बनाने में सफलता पाई.

बी-2 बॉम्बर का डिज़ाइन साफ़ तौर पर 'हो-229' के डिज़ाइन से बहुत मिलता जुलता है.

बोवर्स कहते हैं, "मेरा मानना है कि हम हवाई जहाज़ की कार्यकुशलता को कम से कम 70 फ़ीसदी बढ़ा सकते हैं. राइमर हॉर्टन सही रास्ते पर थे. वे अपने विचारों की ताक़त को पूरी तरह समझ नहीं पाए थे. पर मुझे लगता है कि अगर वो ये देख सकते कि हम आज कहां पहुंचे हैं तो वह बहुत ख़ुश होते".

रस ली कहते हैं कि हॉर्टन बंधुओं के डिज़ाइन को बचाकर रखना बहुत मुश्किल है और ये काम 2020 से पहले तक शायद पूरा कर पाना आसान नहीं.

लेकिन ली कहते हैं कि 2020 के बाद हॉर्टन बंधुओं के डिज़ाइन सार्वजनिक होंगे और ज़्यादा लोग विमानन के क्षेत्र में उनकी अहमियत को देख और समझ सकेंगे.

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