हिंदू मैरिज बिल को मंज़ूरी पर पाक मीडिया ख़ुश

पाकिस्तान में हिन्दू मैरेज रजिस्ट्रेशन बिल

पाकिस्तान में हिंदू मैरिज रजिस्ट्रेशन बिल को संसदीय समिति की मंज़ूरी मिलने का पाकिस्तानी उर्दू मीडिया ने स्वागत किया है.

"जंग" ने इसे अल्पसंख्यक समुदाय को उसके अधिकार देने की दिशा में एक अहम क़दम बताया है.

अख़बार लिखता है कि अब तक पाकिस्तान में ऐसा कोई क़ानून नहीं था और इसलिए हिंदू शादियों को कोई क़ानूनी मान्यता नहीं थी.

ऐसे में, न सिर्फ़ हिंदू लड़कियों से जबरन शादी के मामले देखने को मिलते रहे हैं, बल्कि हिंदू समुदाय के लिए पहचान पत्र, वीज़ा-पासपोर्ट हासिल करने और प्रॉपर्टी ट्रांसफ़र करने में बेहद दिक़्क़तें आती हैं.

संसदीय समिति के फ़ैसले का स्वागत करते हुए "जंग" लिखता है कि अब हर हिंदू शादी को रजिस्टर कराना ज़रूरी होगा.

वहीं 'नवा-ए-वक़्त' ने बिल का ब्यौरा देते हुए लिखा है कि हिंदू लड़के या लड़की के लिए शादी की उम्र 18 साल होगी और पंडित शादी कराएगा, इस मौक़े पर सरकारी रजिस्ट्रार भी मौजूद होगा.

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अख़बार कहता है कि शादी की उम्र 18 साल होने से बाल विवाह रोका जा सकेगा और पति-पत्नी में से किसी ने भी धर्म बदला तो शादी टूट जाएगी.

अख़बार कहता है कि जबरन धर्मपरिवर्तन को लेकर हिंदू बिरादरी की जो आशंकाएं हैं, उनको दूर करने के लिए संसद में बिल मंज़ूर करने से पहले अगर हिंदू सांसदों से भी राय लेकर कोई सकारात्मक क़दम उठाया जाए तो इससे उनके शक और संदेह दूर होंगे.

'एक्सप्रेस' लिखता है कि प्रस्तावित क़ानून हिंदू समुदाय के लिए एक सकारात्मक संदेश है, जिससे उनमें पाकिस्तानी संविधान के तहत समानाधिकार नागरिक होने का भरोसा और मज़बूत होगा.

अख़बार कहता है कि इस क़ानून से न सिर्फ़ हिंदू लड़कियों से जबरन शादियों की समस्या ख़त्म करने में मदद मिलेगी, बल्कि उनके शादी-ब्याह के मामलों को पूरी तरह संवैधानिक संरक्षण मिलेगा.

वहीं 'रोज़नामा पाकिस्तान' का संपादकीय है- पाक-भारत संबंध? देश को भरोसे में लें.

अख़बार की टिप्पणी है कि विवाद अपनी जगह हैं, लेकिन भारत के मौजूदा रूख़ में कोई लचक नहीं दिखाई देती.

अख़बार की टिप्पणी है कि भारत की सरकार अपनी पार्टी के कट्टरपंथी नेताओं को पाकिस्तानी विरोधी, मुसलमान विरोधी बयान देने और अल्पसंख्यकों से बुरे बर्ताव से भी नहीं रोकती है. उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है.

अख़बार की टिप्पणी है कि ऐसे में पाकिस्तान सरकार को भारत के साथ दोस्ती और रिश्तों को लेकर पूरी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए ग़ौर करना चाहिए.

वहीं कई अख़बारों ने पाकिस्तान के पुलिस थानों में फैले भ्रष्टाचार को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी पर संपादकीय लिखे हैं.

'मशरिक़' लिखता है कि यह बात किसी से नहीं छुपी है कि थाने करोड़ों में बिकते हैं और एसएचओ करोड़ों में तैनात किए जाते हैं. लेकिन एक अदालती सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश का इन बातों का कहना, इन पर मुहर लगाता है.

अख़बार कहता है कि क़ानून और जवाबदेही का निज़ाम ठीक से काम करे तो फिर किसकी मजाल है कि थानों की बोली लगाए और एसएचओ करोड़ों देकर थाने हासिल करें और दिन रात भ्रष्टाचार करके अदा की गई अपनी रक़म की वसूली करें और फिर मुनाफ़ा कमाए.

रुख़ भारत का करें तो मुंबई हमलों के मामले में अमरीका से चरमपंथी डेविड हेडली की गवाही पर काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है.

'हमारा समाज' का संपादकीय है-हेडली की गवाही पर पाक की बेचैनी.

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अख़बार के मुताबिक़ हेडली ने मुंबई हमलों में पाकिस्तान के शामिल होने को लेकर कई राज़ों पर से परदा हटाया है, हालांकि पाकिस्तान ने हेडली की गवाही को महज़ झूठ का पुलिंदा क़रार दिया है.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान यह क्यों नहीं मानता कि हेडली किसी दबाव में बयान नहीं दे रहा है, बल्कि अमरीका से स्वतंत्र तौर पर गवाही में शामिल हुआ है.

अख़बार ने पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक को आड़े हाथ लिया है, जिनके मुताबिक़ हेडली को भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने खड़ा किया है ताकि पाकिस्तान को बदनाम किया जा सके.

वहीं 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' लिखता है कि अगर पाकिस्तान की सरकार का दहशतगर्दी से लड़ने का इरादा पक्का होता तो वो कार्रवाई करने के लिए उसकी गवाही को ही काफ़ी मानती.

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अख़बार कहता है कि विश्व समुदाय ने जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिज़्बुल मुजाहिदीन जैसे गुटों को दहशतगर्दों की सूची में शामिल किया है. इसके बावजूद पाकिस्तान सरकार ने हाफ़िज़ सईद और ज़कीउर रहमान लखवी जैसों को खुले आम घूमने की छूट दे रखी है.

वहीं पिछले दिनों एक मजिस्ट्रेट के लॉन की घास चरने पर एक बकरी को पकड़े जाने पर 'रोज़नामा ख़बरें' ने संपादकीय लिखा – बेचारी बकरी.

अख़बार लिखता है कि नेता भी कहते हैं, जज भी कहते हैं और यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर भी कहते हैं कि क़ानून सबके लिए बराबर होता है, लेकिन जब एक बकरी को पकड़ा किया गया तो ख़्याल आया कि क़ानून सबके लिए बराबर होता है.

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