ये है उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा निर्यात

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उत्तर कोरिया के पास ऐसी ज़्यादा चीज़ें नहीं है जिन्हें ख़रीदने में दुनिया की दिलचस्पी हो, लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जहां उत्तर कोरिया और उसके कलाकारों की धूम मची है.

बड़ी-बड़ी कांसे की मूर्तियों को उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा निर्यात कहा जा सकता है. ख़ास कर अफ़्रीका में तो इन मूर्तियां की बहुत मांग है.

और इन मूर्तियों के पीछे है उत्तर कोरिया का 'मन्सुदाए आर्ट स्टूडियो', जिसकी स्थापना 1959 में की गई थी.

मुख्य तौर पर ये उत्तर कोरिया की घरेलू प्रोपेगेंडा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करता है. इसकी बनाई विशाल मूर्तियां, चित्र और बैनर उत्तर कोरिया की सैन्य परेडों में दिखाई देते हैं और उन्हें ख़ूब सराहना भी मिलती है.

इस स्टूडियो में लगभग चार हज़ार लोग काम करते हैं और इसकी बनाई चीजें उत्तर कोरिया में हर तरफ़ दिखती हैं.

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इतालवी नागरिक लुइगी सेसियोनी दुनिया के लिए इस आर्ट फ़ैक्ट्री के अकेले प्रतिनिधि हैं.

उनका कहना है, "मन्सुदाए प्योंगयांग के बीचों बीच स्थित एक ज़िला है. जहां तक स्टूडियो की बात है तो ये एक स्टूडियो से कहीं ज़्यादा एक फैक्ट्री है, दुनिया की सबसे बड़ी आर्ट फैक्ट्री."

हाल ही में उन्होंने बेनेट फैशन घराने के लिए बेल बूटों की एक विशाल झालर तैयार की है और कंबोडिया में एक म्यूज़ियम तैयार किया है. लेकिन विदेशों में उनके मुख्य ग्राहक हैं अफ़्रीकी देश.

उत्तर कोरिया का ये निर्यात 1980 के दशक में शुरू हुआ जब उसने समाजवादी या फिर गुटनिरपेक्ष देशों को ये मूर्तियां उपहार में देनी शुरू कीं.

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लेकिन अब ये मूर्तियां उत्तर कोरिया के लिए आमदनी का ज़रिया बन रही हैं. उत्तर कोरियाई कलाकार अब अंगोला, बेनिन, चाड, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, इक्वाटोरियल गिनी, इथियोपिया और टोगो जैसे अफ़्रीकी देशों में काम कर रहे हैं.

ज़िम्बाब्वे में तो मीडिया में ऐसी भी ख़बरें हैं कि राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की दो विशाल प्रमिताएं तैयार हैं जो उनके निधन के बाद लगाई जाएंगी.

यही नहीं, सेनेगल में 2010 में जिस अफ़्रीकी रेनेसा स्मारक का उद्घाटन हुआ, उसे भी उत्तर कोरियाई कलाकारों ने बनाया था. बताया जाता है कि इस प्रतिमा के निर्माण से उत्तर कोरिया ने करोड़ों डॉलर बनाए.

उत्तर कोरिया की प्रतिमाएं अफ़्रीकी देशों को दो वजहों से पसंद आती हैं. एक तो वो पश्चिमी देशों के कलाकारों के मुक़ाबले कहीं सस्ते दामों में तैयार हो जाती हैं.

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मिसाल के तौर पर 161 फीट ऊंची प्रतिमा के बदले सेनेगल ने उत्तर कोरिया को एक जमीन का टुकड़ा दिया जिसने उसने तुरत फुरत बेच कर कैश हासिल कर लिया.

इस प्रतिमाओं को पसंद करने की दूसरी वजह है इनकी शैली. एक आर्ट क्रिटिक विलियम फ़ीवर कहते हैं, "रूसी या फिर चीनी कलाकार अब ऐसा माल नहीं बनाते हैं. और हां, आकार तो अहम है ही."

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