हॉलीवुड में अरब केवल शेख़, बेली डांसर्स और हमलावर..

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अभी हाल में हॉलीवुड में एक बड़ी बहस छिड़ गई. बहस इस बात की कि आख़िर ऑस्कर अवार्ड्स में सिर्फ़ गोरों का ही क्यों बोलबाला है.

हॉलीवुड में, अमरीकी मनोरंजन जगत में तो बड़ी संख्या में अफ़्रीकी-अमरीकी भी काम करते हैं. फिर ऑस्कर अवार्ड चुनने वाली कमेटी और उसके लिए नॉमिनेट किए गए कलाकारों में, क्यों नहीं दिखते अफ़्रीकी-अमरीकी.

ये बहस तो ज़्यादा बड़ी है. मगर इसी बहाने से ब्रिटिश पत्रकार अरवा हैदर ने सोचा कि ज़रा ये देखें कि पश्चिमी देशों की फ़िल्म और टीवी इंडस्ट्री में अरबों को किस तरह दिखाया जाता है. उनके लिए कितने मौक़े हैं. अरबों के प्रति पश्चिमी मनोरंजन जगत में सोच कैसी है.

आज की तारीख़ में इन सवालों के जवाब तलाशना इसलिए भी ज़रूरी हैं कि आज अरब देश, पूरी दुनिया की मीडिया में छाए हुए हैं. सीरिया का संकट है. इराक़ में हिंसा बढ़ रही है. लीबिया में कर्नल ग़द्दाफ़ी के मारे जाने के बाद अराजकता है.

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Image caption थे़डा बेडा, अरब कलाकार

जब मैंने पश्चिमी मनोरंजन की दुनिया में अरब किरदार तलाशना शुरू किया तो मिले तो एक से एक मगर सबके सब, घिसी-पिटी लीक पर, एक ही चश्मे से देखे जाने वाले थे.

फ़िल्मों में, टीवी में, नाटकों में अरबी किरदारों की कमी नहीं थी. मगर वो या तो शेख़ थे, चरमपंथी थे या बेली डांसर्स थे, यानी एक ही, घिसे-पिटे चश्मे से देखे जाने वाले.

सबसे बड़ी बात ये कि ज़्यादातर अरबों के रोल, अरब नहीं बल्कि दूसरे समुदाय के लोग निभा रहे थे.

हॉलीवुड की हालिया फ़िल्म ‘गॉड्स ऑफ़ इजिप्ट’ का जब ट्रेलर जारी हुआ तो पता चला कि मिस्र की काल्पनिक कहानी पर बनी इस फ़िल्म में एक भी अरब कलाकार नहीं था. सारे रोल, ग़ैर-अरब एक्टर निभा रहे थे. फ़िल्म का इतना विरोध हुआ कि फ़िल्म की निर्माता कंपनी और निर्देशक को माफ़ी मांगनी पड़ी.

वैसे क़रीब से देखें तो पश्चिमी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में अरब देशों से जुड़ी कहानियों, किरदारों की भरमार सी रही है. पश्चिमी जगत की अरब देशों में ख़ास दिलचस्पी है.

तभी तो हाल के दिनों में मध्य पूर्व के देशों से जुड़ी फ़िल्मों, सीरियल्स, किरदारों और कहानियों की अच्छी ख़ासी तादाद, अमरीकी और यूरोपीय देशों के मनोरंजन जगत में देखी जा रही है.

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जैसे 2015 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'अमेरिकन स्नाइपर', जिसमें इराक़ में ढाई सौ लोगों से ज़्यादा शिकार करने वाले अमरीकी शूटर की कहानी थी. इस फ़िल्म को कई ऑस्कर अवार्ड्स के लिए नॉमिनेट किया गया था.

ऐसे ही अमरीकी टीवी सीरीज़ ‘अरब डाइनैस्टी ऑफ़ टायरैंट’ है. जो इतना मशहूर हुआ कि अब इसका तीसरा सीज़न आने वाला है.

पश्चिमी मनोरंजन दुनिया में अरब किरदार हॉलीवुड जितने ही पुराने हैं. मूक फ़िल्मों के दौर में एक मशहूर वैम्प थी थेडा बारा. जिसका अरबी में मतलब होता है अरब मौत. फिर 1921 में आई फ़िल्म द शेख़, जिसमें रुडॉल्फ़ वैलेंटिनो ने एक शेख़ का रोल किया था.

जब आवाज़ वाली फ़िल्में बननी शुरू हुईं तो भी ऐसे ही अरब किरदार देखने को मिलते रहे. अमरीकी लेखक जैक शाहीन ने इस बारे में बहुत लिखा है. उनकी मशहूर किताब है ‘रील बैड अरब्स: हाऊ हॉलीवुड विलीफ़ाइस ए पीपुल.

1984 में जैक शाहीन ने अपनी किताब ‘द टीवी अरब’ में लिखा कि हॉलीवुड में मध्य-पूर्व देशों के किरदार, अरबपति शेख़ों, चरमपंथियों और बेली डांसर्स तक सीमित हैं.

उस किताब के आने के 31 साल बाद भी हालात जस के तस हैं.

इस कहानी पर काम करने वाली अरवा हैदर ख़ुद इराक़ी मूल की ब्रिटिश नागरिक हैं. उन्होंने बचपन से ही महसूस किया है कि पश्चिमी समाज में अरबों को एक ही नज़रिए से देखा जाता है

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फिर चाहे वो फ़िल्में हों, सीरियल हों या विज्ञापन. पश्चिमी देशों की नज़र में अरब या तो अमीर शेख़ हैं, या चरमपंथी हैं. और अरब महिलाएं तो वहां के फ़िल्मी किरदारों में न के बराबर हैं. जो इक्का-दुक्का दिखती भी हैं. वो पर्दे में हैं, उनकी कोई आवाज़ नहीं. अरवा हैदर जैसी मज़बूत इरादों वाली अरब औरत का तो कोई किरदार ही नहीं गढ़ा गया.

दिक़्क़त तब और महसूस होती है जब, गिने-चुने अरब किरदार भी गोरे निभाते है.

अरब किरदारों की बात करें तो मशहूर अमरीकी कलाकार हैरिसन फ़ोर्ड की फ़िल्म 'इंडियाना जोन्स' हो 'जूल ऑफ़ नाइल' हो, आर्नॉल्ड श्वार्जनेगर की 'ट्रू लाइज़' हो या 'हरम' या फिर कॉमेडी फ़िल्म 'फादर ऑफ़ द ब्राइड 2' सभी में अरब किरदारों को पेश करने का एक जैसा ही नज़रिया रहा है.

जब भी हॉलीवुड फ़िल्मों की बंदूक़ें इंसानी ख़ून की प्यासी हुईं, उन्हें अरब शिकार सबसे पहले नज़र आए. जैसे साल 2000 में आई फ़िल्म 'रूल्स ऑफ़ एंगेजमेंट' का एक सीन जिसमें बेगुनाह अरबों की भीड़, जिसमें औरतें और बच्चे भी शामिल होते हैं, को अमरीकी मरीन्स गोलियों से भून डालते हैं.

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हर दौर के हिसाब से हॉलीवुड फ़िल्मों और सीरियल्स में अरब खलनायक भी बदलते रहते हैं, उस दौर के असली अरब किरदारों की तरह.

मसलन, अस्सी के दशक में फ़लीस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात और लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर ग़द्दाफ़ी, पश्चिमी देशों की नज़र में खलनायक थे. तो उस दौर की पश्चिमी फ़िल्मों में अरब चरमपंथी किरदार अक्सर फ़लस्तीन या लीबिया के होते थे.

लेकिन 1991 के पहले खाड़ी युद्ध के बाद यही किरदार इराक़ी हो गए. जैसे डेविड ओ रसेल की 1999 में आई फ़िल्म, 'थ्री किंग्स'.

हंसी तो तब आती है, जब ईरानी किरदारों को भी अरबों की जमात में खड़ा कर दिया जाता है, जबकि दोनों एकदम अलहदा हैं. अलग ज़ुबानें बोलते हैं. मगर जब यहूदियों और ईसाइयों के दुश्मन दिखाने की बात आती है तो सबको एक ही क़तार में खड़ा कर दिया जाता है.

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सवाल ये है कि क्या मनोरंजन के नाम पर सच से ऐसे समझौते करना ठीक है? क्योंकि पश्चिमी देशों की फ़िल्मों और सीरियल्स देखने वालों की अच्छी ख़ासी तादाद अरबों की भी है.

अमरीकी सीरियल होमलैंड में ऐसे ही झूठ के विरोध के लिए कुछ अरब कलाकारों ने अरबी में 'होमलैंड नस्लवादी है' लिखकर लगा दिया. सीरियल के निर्माताओं ने कहा कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि उनके दर्शकों में से 99 फ़ीसद, अरबी समझते ही नहीं.

एक और मशहूर अमरीकी सीरियल, 'टायरैंट', कल्पना के अरब देश अब्बुदीन पर आधारित है. इसके सभी प्रमुख कलाकार, गोरे हैं. हालांकि कुछ अरब कलाकार भी हैं. मगर उनके रोल बहुत छोटे हैं.

इस सीरियल में काम करने वाले अरब कलाकार वायल एलगादी कहते हैं कि ये मध्य पूर्व की कहानी मध्य पूर्वी अमरीका को बेचने की कोशिश थी. ये चौंकाने वाली बात है कि एक अरब कहानी में कलाकार अरबी नहीं. मगर, उन्हें इस बात की तसल्ली है कि कुछ अरबी कहानियां तो सामने आ रही हैं.

टायरैंट सीरियल में काम करने वाले एक और अरब कलाकार हैं, पच्चीस बरस के अमीर अल मसरी. वो जल्द ही बीबीसी के एक सीरियल में भी आने वाले हैं. थिएटर से शुरुआत करने वाले मसरी पश्चिमी जगत में बड़ा ब्रेक चाहते थे. उन्हें छोटे किरदारों से भी कोई गुरेज नहीं था.

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तभी अचानक उनकी मुलाक़ात, मिस्र के मशहूर कलाकार उमर शरीफ़ से हुई. शरीफ़ ने मसरी को कहा कि अगर पश्चिमी मनोरंजन जगत में कामयाबी चाहते हो तो पहले अपने मुल्क में काम करो, नाम कमाओ, तभी तुम्हें गोरे भी सम्मान देंगे.

2008 में मसरी को मिस्र की एक फ़िल्म में लीड रोल मिला. इसके लिए उन्हें अवार्ड भी मिला. इसके बाद उनके लिए दूसरी दुनिया के दरवाज़े खुल गए.

अब मसरी, अपनी अरब पहचान को लेकर काफ़ी संजीदा हैं. हाल ही में उन्होंने हॉलीवुड की एक बड़ी फ़िल्म का ऑफ़र ठुकरा दिया. क्योंकि उसमें उनके रोल का पूरी फ़िल्म में कोई डायलॉग नहीं था. और आख़िर में उस किरदार को ख़ुद को बम से उड़ा लेना था.

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मसरी कहते हैं कि अगर उन्होंने अरबों को नीचा दिखाने वाले ऐसे रोल किए तो, उनके देश के लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे. यही कि वो थोड़े से पैसों के लिए अपने मुल्क को बदनाम कर रहे हैं.

वाएल एलगादी मानते हैं कि मनोरंजन की पश्चिमी दुनिया में अरबों के लिए ऐसे ही गिने-चुने मौक़े हैं. घिसे-पिटे किरदार हैं. उन्होंने एक्टिंग की ट्रेनिंग 9/11 के आतंकी हमले के ठीक बाद शुरू की थी.

एलगादी कहते हैं कि लोग उन्हें शक की नज़र से देखते थे. क्योंकि अरबों को ऐसे ही देखने का चलन था. वो बताते हैं कि आज की तारीख़ में उन्होंने हर तरह के आतंकवादी का रोल कर डाला है. साथ ही अरब सूफ़ी के रोल भी किए हैं, जिसकी आंखों में रेगिस्तान दिखता है.

वो बताते हैं कि कई बार तो लोग डबिंग के दौरान एक ख़ास तरह से बोलने को कहते हैं...ख़ख़ख़ की आवाज़ निकालने को कहते हैं ताकि अरबी पहचान ज़ाहिर हो. जबकि एलगादी ख़ुद धड़ल्ले से अरबी बोलते हैं.

एलगादी कहते हैं कि कई बार ऐसे घिसे-पिटे दायरे से बाहर आने का मन होता है. मगर आपको ये ध्यान रखना होता है कि लोग आपको परेशानी खड़ी करने वाला न सोचें. लिहाज़ा रोल चुनते वक़्त आपको सावधानी बरतनी होती है.

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उन्हें एक्टिंग के एक उस्ताद ने मशविरा दिया था कि वो अपना नाम वाएल एलगादी से विलियम एलगार्दी कर लें, ताकि अरब स्टीरियोटाइप में फंसने से बच सकें. उन्होंने ऐसा किया भी.

लेकिन कुछ साल पहले छुट्टियों में वो सूडान गए, अपने परिवार के साथ वक़्त बिताने. तब उन्हें अपनी अरब पहचान का शिद्दत से एहसास हुआ और उन्होंने वापस अपना नाम बदल लिया.

वो मानते हैं कि अपने को इस तरह से पेश किए जाने के लिए अरब मुल्कों के हालात ज़िम्मेदार हैं. वहां ख़ून-ख़राबा है, तानाशाही है, ज़ुल्म के क़िस्से हैं. अरबों को ख़ुद आगे आकर इन मुद्दों पर खुलकर बात करनी चाहिए.

लेकिन धीरे-धीरे ही सही बदलाव की बयार बहनी शुरू भी हुई है. ये जानकर आप चौंकेंगे कि इसकी शुरुआत मशहूर कार्टून सीरियल 'सिम्पसन' के एक एपिसोड से हुई. जिसमें बार्ट नाम के किरदार की दोस्ती जॉर्डन के बशीर नाम के एक बच्चे से होती है. जो चरमपंथियों को लेकर उसके बेजा डर का मज़ाक़ उड़ाता है.

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एक और अमरीकी सीरियल 'कम्युनिटी' में आधा फ़लस्तीनी किरदार है आबेद, जिसे डैनी पुडी ने निभाया है. गोल्डेन ग्लोब अवार्ड जीतने वाले सीरियल मिस्टर रोबोट में इसका मुख्य किरदार ही अरबी है.

इसे अरब मूल के कलाकार रामी मलेक ने निभाया है. वो मानते हैं कि धीरे धीरे ही सही, पुरानी सोच के दायरे से लोग बाहर आ रहे हैं.

वैसे मलेक से पहले भी अमरीकी फ़िल्म इंडस्ट्री में अरब मूल के लोगों ने कामयाबी हासिल की है. जैसे अभिनेत्री सलमा हयाक या फिर एक्टर जेरी शॉनफ़ील्ड. सलमा के पिता लेबनानी मूल के थे तो जेरी की मां सीरियाई मूल की. मगर इन्होंने कभी अपनी अरब पहचान पर ज़ोर नहीं दिया. ऐसे ही एक अरब मूल के कलाकार जेमी फार, जिनका मूल नाम जमील फ़राह था, ने अरबी किरदार निभाए, मगर अपनी अरब पहचान पर ज़ोर नहीं दिया.

हालांकि मेनस्ट्रीम सिनेमा से हटकर छोटे-छोटे बजट वाली कई फ़िल्में ऐसी बनी हैं, या बन रही हैं जो अरबों को नए नज़रिए से पेश करती हैं.

मसलन फ़लस्तीनी कलाकार और फ़िल्म निर्माता एलिया सुलेमान को ही लीजिए. जिन्होंने 'द डिवाइन इंटरवेन्शन' द टाइम दैट रिमेन्स' जैसी फ़िल्म बनाई है, जो इज़राइल-फ़लस्तीन की सरहद के आर-पार की प्रेम कहानी बयां करती है.

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ऐसे ही लेबनानी फ़िल्मकार नदीन लबाकी और उनकी चर्चित फ़िल्म 'कैरामेल'. जिसमें उन्होंने हिंसा से सिसकते लेबनान की घिसी-पिटी लकीर छोड़कर, पांच औरतों की कहानी दिखाई थी.

सबसे बड़ा बदलाव तब नज़र आता है, जब फ़िल्मों में अरब किरदार, असल ज़िंदगी के मुद्दों से जूझते दिखाए जाते हैं.

इसकी सबसे अच्छी मिसाल है, मिस्री मूल की वेल्श निर्देशक, सैली अल हुसैनी. जिन्होंने 2013 में 'माई ब्रदर द डेविल' नाम से फ़िल्म बनाई. फ़िल्म को कई अवार्ड मिले.

इसके मुख्य किरदार मोद और राशिद नाम के दो भाई हैं. जो मिस्र मूल के हैं, लंदन में रहते हैं और वहां के आम युवाओं की तरह, गैंग कल्चर, मर्दवादी पहचान, ड्रग के जाल से बचने जैसी आम चुनौतियों से जूझते दिखाए जाते हैं.

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अल हुसैनी कहती हैं कि वो फ़िल्मों में अरबों के घिसे-पिटे रोल देखकर पक गईं थीं. इसीलिए उन्होंने एक नई कहानी और नए नज़रिए से अरबों को पेश करने की सोची.

अल हुसैनी बहुत अच्छी क़िस्सागो हैं. मगर वो जानती हैं कि मनोरंजन के कारोबार में मुनाफ़ा कमाना भी ज़रूरी है. अब जिस इंडस्ट्री में सब-कुछ डॉलर में तौला जाता हो. वहां बेहद सशक्त मगर छोटी-छोटी फ़िल्में, मुख्यधारा पर बहुत असर नहीं डाल पातीं.

उन जैसे फ़िल्मकार मानते हैं कि एंटरटेनमेंट की दुनिया में नस्लवाद और मर्द-औरत में भेद हावी है. पर्दे पर भी और कैमरे के पीछे भी. मतलब ये कि किरदार ही नहीं, फ़िल्मकार भी एक जैसे चश्मे से ही ख़ास तबक़े को देखते हैं.

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अल हुसैनी कहती हैं कि असल बदलाव के लिए ज़रूरी है कि ऐसे लोग आगे आएं, जिनकी कथनी-करनी में फ़र्क़ नहीं होता.

वैसे, घिसी-पिटी सोच से बाहर निकलने, नज़रिया बदलने की मांग तेज़ हो रही है. उम्मीद यही है कि बड़े निर्माता-निर्देशक, कहानीकार और कलाकार, सब इस बदलाव की ज़रूरत को समझेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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