लखनऊ की चिकनकारी पर चीन की नज़र

चिकन कारी कढ़ाई

चिकनकारी भारत की सबसे मशहूर और महीन कढ़ाई है, जो सदियों से चलती आ रही है.

लेकिन भारत के एक प्रमुख औद्योगिक संस्था के एक ताज़ा अध्ययन में पता चला है कि यह परम्परागत हस्तकला चीन के मशीन से बने कपड़ों के आने से ख़तरे में है.

अध्ययन के अनुसार, चीन से बने कपड़ों की वजह से क़रीब पांच लाख लोगों की रोज़ीरोटी भी ख़तरे में है.

लखनऊ की इस विशेष हस्तकला से ही कारीगरों की रोज़ाना कमाई होती है और घर का ख़र्च चलता है. इससे शहर की हज़ारों कुशल महिलाओं को रोज़गार मिलता है.

पर इसे अब चुनौती मिल रही है चीन में बनी और एक चौथाई क़ीमत पर बिकने वाली चिकनकारी कढ़ाई से.

चीन में यह कढ़ाई मशीन से की जाती है और बहुत ही कम समय और लागत में हो जाती है.

नतीजतन, लखनऊ की यह खूबसूरत कला और परंपरा अब ख़तरे में है.

शबनम हारून ने यह कला उस समय सीखी जब वे महज़ आठ साल की बच्ची थीं. वो कहती हैं, "इस काम की हमारी ज़िंदगी में बहुत अहमियत है. इससे मिलने वाले पैसों से ही हमारे घर का ख़र्च चलता है."

ये महिलाएं बच्चों का देखभाल करते हुए इस बारीक कढ़ाई वाले काम में लगी रहती हैं.

वो कहती हैं, "मैं ऐसी बहुत लड़कियों के बारे में जानती हूं जो इस काम से ही अपने दहेज का पैसा जोड़ने की कोशिश करती हैं."

पर मशीन से बनने वाली डिज़ाइन के कारण हाथ से बनी चिकनकारी पर ख़तरा मंडराने लगा है.

नज़राना चिकन के सेल्स एंड मार्केटिंग मैनजर मोहनीश कुमार ख़रजानी कहते हैं, "इस पारंपरिक कला को मशीन से बनी इन डिज़ायनों से मुक़ाबला करना पड़ रहा है. हालांकि अभी भी कोने कोने से लोग आकर लखनऊ का असली चिकन ख़़रीदते हैं, पर आयातित चिकन ने इसमें सेंध तो लगा ही दी है."

लखनऊ की चिकन के कपड़ों की दुकानों में हाथ से की गई कढ़ाई और चीन से आयातित कपड़े दोनों मिलते हैं और किसी भी नए इंसान के लिए इन दोनों में फ़र्क़ कर पाना बेहद मुश्किल है.

ख़ैरजानी कहते हैं कि कम क़ीमत की चीजों पर इन आयातित डिज़ायनों का ज़्यादा असर पड़ा है, क्योंकि सस्ता सामान ख़रीदने वालों को वह आसानी से मिल जाता है.

वे कहते हैं, "शादी ब्याह के लिए या दूसरे ख़ास मौकों पर जो लोग अच्छा और असली चिकनकारी ख़रीदना चाहते हैं वे ऊंची क़ीमत चुकाने को तैयार रहते हैं. इस तरह के सामान पर आयातित डिज़ायन का अधिक असर नहीं पड़ा है."

यूनिक चिकन के निदेशक फ़ैज फ़ारूक़ी का भी यही मानना है. उनकी कंपनी जिस तरह के डिज़ायन पर ज़ोर देती है, उसकी एक साड़ी की क़ीमत लगभग 30,000 रुपए बैठती है.

पहले वे आम जनता के इस्तेमाल के लिए कम क़ीमत की चीजें बड़ी तादाद में बेचा करते थे. पर अब उन चीजों का बाज़ार सिकुड़ने लगा है.

फ़ारूक़ी कहते हैं, "इसकी एक वजह यह हो सकती है कि चीन ने हमारे कुछ डिज़ायनों की नकल कर ली है और वैसा ही बना लिया है. इसलिए हम लोग घरेलू बाज़ार के खास ग्राहकों पर ध्यान देने लगे हैं."

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