तालिबान को ख़तरा आईएस से नहीं, तो फिर किस से..

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ऐसा लगता है कि चरमपंथी समूह इस्लामिक स्टेट (आइएस) से अफ़ग़ान तालिबान के लिए ख़तरा कम हो गया है. अब तालिबान की ज़्यादा चिंता अपने लड़ाकों के टूटने को लेकर है.

जहां एक ओर इस्लामी इलाक़ों में पैठ बनाने वाला आइएस पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के अपने गढ़ नैनगरहर में कमज़ोर हो रहा है, वहीं तालिबान से टूटा एक गुट अब भी संघर्ष कर रहा है और ख़बरों के अनुसार बड़े हमले की तैयारी कर रहा है.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आइएस लड़ाकों को अब अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा के दोनों ओर फैले कुछ ज़िलों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया गया है.

हाल ही के कुछ हफ़्तों में लगातार हवाई हमलों और अफ़ग़ान सेनाओं के ज़मीनी हमलों में बड़ी संख्या में आइएस लड़ाके मारे गए हैं.

नैनगरहर में स्कूल फिर से खुल गए हैं. आइएस का इरादा ज़िले को इससे सटे प्रांतों के लिए एक पुल की तरह इस्तेमाल करने का था. लेकिन उनके नियंत्रण से छुड़ाए गए इलाक़ों में बहुत से विस्थापित लोगों ने लौटना शुरू कर दिया है.

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Image caption मुल्ला अख़्तर मंसूर

नए तालिबान नेता, मुल्ला अख़्तर मंसूर, के लिए यह तात्कालिक राहत तो है लेकिन अपने ही समूह के नाराज़ और मौक़ापरस्त साथियों से उन्हें चुनौतियां भी मिल रही हैं.

पिछले साल जुलाई 2015 में तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर की मौत का ऐलान होने के बाद जब मंसूर ने खुद को नया नेता घोषित किया था तो तालिबान कमांडरों के बीच अंदरूनी होड़ शुरू हो गई थी.

मंसूर ने अपने विरोधियों को कभी प्यार से, और कभी मार से, नियंत्रण में रखने की रणनीति अपनाई लेकिन इसके अब तक कोई ख़ास नतीजे सामने नहीं आए हैं. ऐसे में हाल ही में आइएस के पीछे हटने से उन्हें राहत ज़रूर मिली है.

संकेत हैं कि और ज़्यादा लड़ाके टूटकर बने मुख्य समूह, हाई काउंसिल ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान इस्लामिक अमीरात, में शामिल हो रहे हैं.

मुल्ला मोहम्मद रसूल के नेतृत्व वाला नया धड़ा पश्चिमी हेरात प्रांत में मंसूर गुट के गढ़ शिंदांद ज़िले में उसके ख़िलाफ़ खड़ा होने में कामयाब रहा है.

पिछले साल मंसूर दक्षिणी प्रांतों हेलमंड और ज़ाबोल में अपने विरोधियों को 'सबक सिखाने' में कामयाब रहे थे. वह ज़ाबोल से इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ उज़्बेकिस्तान (आईएमयू) के वफ़ादार लड़ाकों को साफ़ करने में भी कामयाब रहे थे.

आईएमयू के लड़ाके आइएस और विद्रोही तालिबान कमांडरों के साथ तालमेल बनाए हुए थे.

लेकिन मंसूर शिंदांद से रसूल के लड़ाकों को बेदखल करने में उतने कामयाब नहीं रहे, क्योंकि वो यहां मजबूत आधार बना चुके थे.

पिछले साल दिसंबर में कई मुठभेड़ों में दोनों के दर्जनों लड़ाकों के मारे जाने के बाद, कथित तौर पर मंसूर संघर्ष विराम पर राज़ी हो गए.

माना जा रहा था कि यह समझौता कमज़ोर और जल्द टूट जाने वाला था. लेकिन यह मज़बूत निकला. ये उन विरोधी गुटों की गुटबंदी को ख़त्म करने में कामयाब रहा जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वो अपनी ताक़त दिखाने की तैयारी में जुटे हैं और दूसरे इलाक़ों से भर्तियां कर रहे हैं.

एकजुटता की छवि दिखाने की कोशिश कर रहा मुख्यधारा का तालिबानी मीडिया अपने लड़ाकों को यह समझाने की कोशिश में लगा हुआ है कि सभी प्रमुख तालिबान कमांडर और नेता, नए नेता का नेतृत्व स्वीकार कर रहे हैं और विरोध की आवाज़ें दुश्मनों के प्रचार के अलावा कुछ नहीं या फिर मामूली लोगों की मामूली शिकायतें भर हैं.

मुख्यधारा के तालिबानी मीडिया समूह की सबसे बड़ी मुश्किल, यह साबित करना है कि मुल्ला क़यूम ज़ाकेर जैसे प्रभावशाली कमांडरों और नेताओं ने मंसूर के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है.

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एक वेब पोस्ट में ज़ाकेर के हवाले से ये कहा गया है कि उनके मंसूर से कोई मतभेद नहीं हैं और वो सभी तालिबान सदस्यों को मतभेद ख़त्म करने पर ज़ोर देते हैं.

अफ़ग़ान गुप्तचर सेवा, नेशनल डायरेक्टोरेट ऑफ़ सिक्योरिटी (एनडीएस) ने पिछले साल ज़ोर देकर कहा था कि मंसूर ने ज़ाकेर को ख़ामोश रहने के लिए 1.4 करोड़ डॉलर का प्रस्ताव दिया था.

मंसूर ने 2014 में उन्हें तालिबान मिलिट्री कमीशन के प्रमुख पद से हटा दिया था, जो साफ़ तौर पर ख़ुद को तालिबान नेता के रूप में पेश करने की तैयारी थी.

इसी तरह एक महीने पहले इस समूह ने मुल्ला हसन रहमानी की वफ़ादारी के ऐलान को पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह मंसूर का समर्थन करते हैं.

रहमानी 1996 से 2001 के दौरान अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के राज के समय कंधार के गवर्नर थे.

इस बयान के दो हफ़्ते बाद रहमानी, जो मंसूर के कट्टर-विरोधी थे, पाकिस्तान में 'कैंसर' की वजह से मारे गए. लेकिन अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में दिए गए रहमानी के बयान की सच्चाई पर बहुत ज़्यादा लोगों को यकीन नहीं हुआ.

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मुख्य धारा का तालिबान विरोधियों के ख़िलाफ़ अपनी जंग को 'चोरों और लुटेरों' या आइएस के सफ़ाई अभियान की तरह बता रहा है.

दोनों धड़ों के बीच विरोध अब कई प्रांतों तक फैल गया है. मंसूर के विरोधी अपने पर आइएस का सहयोगी होने का ठप्पा लगाने का विरोध करते हैं और कहते हैं कि वह रसूल धड़े के वफ़ादार हैं.

मुख्य तालिबान प्रवक्ता ने 14 फ़रवरी को दावा किया कि उन्होंने आइएस से जुड़े मावलावी ओबेदुल्लाह होनार और उसके कई लड़ाकों को पूर्वी पक्तिका प्रांत में मार गिराया है और इलाक़े से आइएस लड़ाको का सफ़ाया कर दिया है.

लेकिन जल्द ही कमांडर होनार ने एक वीडियो के ज़रिये, जिसमें उन्हें 100 से ज़्यादा हथियारबंद लड़ाकों के साथ दिखाया गया था, इस दावे का खंडन कर दिया और कहा कि वो रसूल के प्रति वफ़ादार हैं.

पेशावर स्थित न्यूज़ एजेंसी अफ़ग़ान इस्लामिक प्रेस (एआईपी) ने 21 फ़रवरी को ख़बर दी थी कि एक और तालिबान कमांडर, मुल्ला अब्दुल सलाम राकेति अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरपश्चिमी इलाक़े में रसूल गुट के साथ जुड़ गए हैं.

एआईपी एजेंसी, जिसके तालिबान के बीच अच्छे संपर्क सूत्र हैं, ने राकेति के हवाले से कहा है कि कई कमांडर और सैकड़ों लड़ाके घोरमाक़ ज़िले में हुई एक सभा में मंसूर से अलग हो गए हैं.

लेकिन तालिबान की वेबसाइट में 23 फरवरी को इस बात से इनकार किया गया कि राकेति मंसूर से अलग हुए हैं.

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