कैसे निपटें तानाशाह बॉस से?

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हम या हमारे दोस्तों का कई बार बड़बोले, तानाशाह सरीखे बॉस से पाला पड़ जाता है. जो शेखी बघारने के उस्ताद होते हैं. अपने आगे किसी को समझते नहीं.

किसी की सुनते नहीं. बस अपनी मनमर्ज़ी दूसरों पर थोपते रहते हैं.

करियर में हम सभी का ऐसे बॉस से सामना हो ही जाता है, जिनकी नज़र में उनसे बेहतर, उनसे क़ाबिल कोई होता ही नहीं.

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सवाल यह है कि ऐसे बॉस से निपटा कैसे जाए? प्रोफ़ेशनल्स की वेबसाइट लिंक्डइन पर जब हमने इस सवाल का जवाब तलाशा, तो दो एक्सपर्ट्स ने अपने तजुर्बे और अपनी राय साझा की.

ऐसे ही एक्सपर्ट डेनियल गोलमैन ने एलेन नाम के एक मैनेजर का क़िस्सा बताया. एलेन को उनके मातहत मिस्टर डिक्टेटर कहते थे. एलेन का अपने विभाग पर फ़ौलादी शिकंजा था. हर छोटा-बड़ा फ़ैसला वह ख़ुद करता था. उसका इतना ख़ौफ़ था कि मातहत उसके सामने ज़ुबान खोलने से डरते थे. कभी मशविरा नहीं दे पाते थे.

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तमाम रिसर्च से यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसे तानाशाह बॉस के अंदर काम करने वाली टीम का काम बहुत अच्छा नहीं होता. बॉस के तानाशाही रवैये के चलते, उसकी टीम का फ़ोकस काम से ज़्यादा ध्यान नौकरी बचाने के जोड़तोड़ में रहता है.

लेकिन, गोलमैन कहते हैं कि ऐसे बॉस के बर्ताव पर क़ाबू पाया जा सकता है. उसमें बदलाव किया जा सकता है. गोलमैन ने लेखक डेनियल सीगल के हवाले से ऐसे बॉस के किरदार को समझाने की कोशिश की है.

वे बताते हैं कि हर इंसान को तीन बातों की ज़रूरत होती है. पहला यह कि सबका ध्यान उस पर रहे. दूसरा यह कि सब उसकी ख़ुशामद करेें, तारीफ़ करें, चापलूसी करें. और सबसे बढ़कर यह कि ये सब करते वक़्त वो ख़ुद को महफ़ूज़ महसूस करे.

तो जब बॉस के इर्द-गिर्द लोग मंडराते नहीं, ख़ुशामद नहीं करते तो उसे असुरक्षा का अहसास होने लगता है. फिर उसका बर्ताव तानाशाही हो जाता है.

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गोलमैन कहते हैं कि ऐसे ख़ुदगर्ज़ तानाशाही रवैये वाले बॉस को बदलने से पहले उससे दो सवाल पूछने होंगे. पहला यह कि क्या उन्हें दूसरे की राय से फ़र्क़ पड़ता है? दूसरा यह कि क्या वो बदलना चाहते हैं?

अगर वो बदलना चाहते हैं तो, उन्हें सबसे पहले अपना नज़रिया बदलना होगा. दूसरे उनके बारे में क्या राय रखते हैं, वो ईमानदारी से उसे सुनें-समझें. सबसे क़रीबी साथी की राय इस मामले में सबसे अहम हो सकती है.

फिर ऐसे मैनेजर्स के लिए किसी रोल मॉडल की तलाश करनी होगी. ऐसे शख़्स की जिससे ख़ुद बॉस का अपने करियर में साबका पड़ा हो. जिसके काम करने के तरीक़े का उस पर गहरा असर हो. जिसके काम को ख़ुद तानाशाह बॉस पसंद करता हो. इस रोल मॉडल के हवाले से तानाशाह क़िस्म के बॉस को बदलने के लिए समझाया जा सकता है.

आख़िर में गोलमैन कहते हैं कि किसी भी बड़बोले बॉस को बदला जा सकता है. उसके लिए देर नहीं हुई होती, बशर्ते वो ख़ुद बदलने के लिए तैयार हों.

इस बारे में हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल के प्रोफ़ेसर बिल जॉर्ज ने भी काफ़ी दिलचस्प बातें लिखी हैं.

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वे कहते हैं कि आज मीडिया की सुर्ख़ियां घमंडी, बड़बोले नेताओं की हरकतों से अटी पड़ी होती हैं. वैसे भी नेताओं की फ़ितरत, किसी के अहसास की परवाह न करने की होती है. और आजकल तो मानो बड़बोले नेताओं का ही ज़माना है. वो इसके लिेए अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प की मिसाल देते हैं.

जॉर्ज कहते हैं कि अच्छे टीम लीडर को अपनी क़ाबिलियत, अपनी कमज़ोरियों का अच्छे से अहसास होता है. साथ ही वह अपने साथ काम करने वालों की अच्छाइयों-बुराइयों से वाक़िफ़ होते हैं.

उन्हें ये भी अच्छे से पता होता है कि जिस संस्थान में वह आज काम कर रहे हैं, वो उनसे किसी बेहतर इंसान ने अपनी मेहनत और लगन से खड़ा किया है. उस परंपरा को निभाने की ज़िम्मेदारी का भी उन्हें अच्छे से अहसास होता है.

ऐसे टीम लीडर, अपने बर्ताव में हमेशा नरमी रखते हैं. ऐसी विनम्रता जो सबको दिखाई देती है, महसूस होती है.

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जॉर्ज कहते हैं कि आज इसी बर्ताव में नरमी की कमी दिखती है लोगों में. इसी बात को लोग समझ नहीं रहे हैं, या समझना नहीं चाहते. अक्सर लोग ख़ुद को बाक़ियों से बेहतर, ज़्यादा क़ाबिल मान लेते हैं. यहीं से उनकी विनम्रता ख़त्म हो जाती है.

अगर लोगों को अपनी अच्छाइयों के साथ अपनी कमियों का भी अहसास हो, तो वह तानाशाही रवैया कभी नहीं अपनाएंगे. वो यह समझेंगे कि टीम लीडर होने का मतलब, अपने ग्राहकों, अपने मातहतों, अपने निवेशकों और समाज की सेवा करना है.

जॉर्ज कहते हैं कि तानाशाही लोगों को ख़ुद के मोल का सही तरीक़े से अहसास ही नहीं होता. ऐसे लोग अक्सर शेखी बघारते दिखते हैं. यह उनकी ख़ुद के बारे में असुरक्षा की भावना दिखाती है. बाहर से तो वो दूसरों को डराते-धमकाते हैं. लेकिन, भीतर ही भीतर उन्हें यह डर खाए जाता है कि कहीं कोई उनका ताक़तवर होने का मुखौटा न उतार फेंके. इससे उनकी कमज़ोरी, नाक़ाबिल होने की सच्चाई दुनिया के सामने आ जाएगी.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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