'बीमारी का ड्रामा कर पाकिस्तान से भागे मुशर्रफ़'

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देशद्रोह और हत्या के आरोपों से घिरे पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ अदालत से इजाज़त मिलने के बाद इलाज कराने दुबई पहुँचे हैं, पर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया उनकी बीमारी को सिर्फ़ देश से भागने का नाटक बता रही है.

कई बड़े अख़बारों ने अपने पहले पन्ने पर सुर्खियां लगाईं- 'मुशर्रफ़ का इलाज ड्रामा निकला, सियासी सरगर्मियां शुरू कीं', 'दुबई में मुशर्रफ़ ने अपनी पार्टी की बैठक ली, मेडिकल चेकअप टाला', 'बेहद बीमार मुशर्रफ़ ने दुबई में सियासी सरगर्मियां शुरू कीं' और 'मुशर्रफ़ ने न एंबुलेंस बुलाई और न व्हीलचेयर इस्तेमाल की.'

'जसारत' का संपादकीय है- मुशर्रफ़ फिर गच्चा दे गए. अख़बार लिखता है कि हवाई अड्डे पर पत्रकार यह देखकर हैरान थे कि जो व्यक्ति चलने-फिरने से लाचार है और जिसकी कमर में बेहद दर्द है, वो कूदता-फांदता अपनी ख़ास चाल में अकड़ता हुआ दाख़िल हुआ.

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अख़बार के मुताबिक़ मुशर्रफ़ इसी तरह फुर्ती से विमान की सीढ़ियां चढ़ गए और अहसास नहीं हुआ कि वह बीमार हैं.

अख़बार की टिप्पणी है कि देश से भागने की ख़ुशी में सारी बीमारी जाती रही, जिससे सुप्रीम कोर्ट के जज की कही यह बात सही साबित हुई कि बीमारी के ऐसे सर्टिफ़िकेट तो कोई भी पैसे ख़र्च करके हासिल कर सकता है.

रोज़नामा 'इंसाफ़' लिखता है कि मुशर्रफ़ को ऐसी कोई बीमारी ही नहीं है, जिसका इलाज पाकिस्तान में मौजूद न हो.

अख़बार के मुताबिक़ विश्लेषक मानते हैं कि मुशर्रफ़ को देश से बाहर भेजने के लिए अंदरूनी और बाहरी दबाव था.

अख़बार लिखता है कि अंदरूनी दबाव में हमेशा सेना का नाम लिया जाता है कि वह अपने पूर्व प्रमुख को मुक़दमों और सज़ा से बचाना चाहती है, पर सेना की तरफ़ से कभी इस तरह का कोई संकेत नहीं दिया गया है.

'जंग' लिखता है कि मुशर्रफ़ के वकीलों ने तो भरोसा दिया है कि वो डेढ़ माह के भीतर वापस आकर मुक़दमों का सामने करेंगे, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि वह तब तक वापस नहीं आएंगे जब तक हालात उनके हक़ में नहीं हो जाते.

अख़बार की टिप्पणी है कि अगर परवेज़ मुशर्रफ़ को विदेश न जाने दिया जाता, तो भी सरकार की आलोचना होती और अब जाने दिया गया है तो फिर उसे घेरा जा रहा है, लेकिन ये मामला ऐसा है कि इसके अलग-अलग पहुलओं पर मु्द्दत तक सवाल उठाए जाते रहेंगे.

वहीं काठमांडू में भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तानी विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ की मुलाक़ात पर 'औसाफ़' की टिप्पणी है कि कश्मीर मुद्दे को नज़रअंदाज़ करके भारत के साथ बातचीत की फ़िज़ूल क़वायद जारी न रखी जाए.

अख़बार की टिप्पणी है कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ कश्मीर पर दोटूक नीति का ऐलान करें और जब तक कश्मीर मसला हल नहीं होता, भारत से अन्य मुद्दों पर बातचीत का ढकोसला बंद किया जाए.

उधर 'एक्सप्रेस' ने सुषमा-सरताज मुलाक़ात को तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक क़दम बताया है.

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अख़बार लिखता है कि विश्व शक्तियां भी कश्मीर मुद्दे के हल में कोई सरगर्मी नहीं दिखा रही हैं इसलिए यह ज़िम्मेदारी भारत और पाकिस्तान की सरकार पर आ गई है कि वो स्थायी आधार पर दोस्ताना रिश्ते क़ायम करें और उन वजहों को तलाशें, जो तनाव का कारण बन रही हैं.

वहीं 'नवा-ए-वक़्त' ने अपना वेतन बढ़ाने की पाकिस्तानी सांसदों की मांग पर संपादकीय में लिखा कि पाकिस्तान पर कुल 53 अरब 40 करोड़ डॉलर का विदेशी क़र्ज़ है.

अख़बार कहता है कि सत्ता और विपक्ष के नुमाइंदों के पास देश को क़र्ज़ के बोझ से निजात दिलाने और डूबती अर्थव्यवस्था संभालने की कोई नीति नहीं है बल्कि अलग-अलग फ़ोरमों पर वो अपना वेतन बढ़वाने के लिए ज़ोर लगा रहे हैं.

रुख़ भारत का करें तो 'सियासी तक़दीर' ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक की पोशाक में बदलाव पर लिखा है- एक नए रूप में आरएसएस.

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Image caption अब आरएसएस ने अपनी पोशाक में निकर की जगह पेंट को लागू किया

अख़बार के मुताबिक़ आरएसएस के रणनीतिकार कह रहे हैं कि संगठन वक़्त के साथ ख़ुद को बदलता आया है लेकिन यह शायद सच नहीं है.

अख़बार की टिप्पणी है कि आरएसएस की कोशिशों के बावजूद युवा उसकी तरफ़ आकर्षित नहीं हो रहे हैं और इसकी एक बड़ी वजह संगठन की पोशाक को माना गया.

अख़बार के मुताबिक़ बदलाव सिर्फ़ पोशाक में नहीं हुआ, बल्कि कई और मुद्दों पर भी हो रहा है जिसमें समलैंगिकता जैसा मुद्दा भी शामिल है.

उधर, आलमी सूफ़ी कांफ्रेस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर 'रोज़नामा ख़बरें' लिखता है कि मोदी ने गंगा-जमनी तहज़ीब, सहिष्णुता, संयम और एक दूसरे का आदर करने की जिन बातों का ज़िक्र किया है, उम्मीद है उन्हें ज़मीन पर उतारने की कोशिश होगी.

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अख़बार के मुताबिक़ अगर ऐसा होता है तो इससे देश में अभी जिस तरह तनाव और वैचारिक मतभेद के आधार पर एक तबक़े को दबाने की कोशिश हो रही है, उसमें कमी आएगी.

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