98 मीटर ऊँचा कचरे का पहाड़ बना सैरगाह

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हवा में बसंत की आहट सुनाई दे रही थी, बर्फीली सर्दी में सूखे पेड़ों की कोपलें फूट रही हैं और मेंढकों की टरटराहट नए जीवन का आभास देती है.

ये जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं लगती. दूर दूर तक उंची घास, पवन चक्कियां और मनमोहक पार्क - ये जगह दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल के लोगों की पसंदीदा पिकनिक की जगह ही नहीं शहर का फेफड़ा भी है.

हान नदी पर नानजीडो नाम का एक द्वीप है जो अपने फूलों के लिए जाना जाता था फिर विकास की आंधी ने इसे कचरे के ढेर में बदल दिया.

70 के दशक के अंत से अगले 15 सालों तक ये गीज़ा के पिरामिड सरीखा दिखने लगा - बस उससे 34 गुना उंचा, लगभग 98 मीटर उंचा कचरे का पहाड़.

गंध और बदबू ने लोगों का जीवन दूभर कर दिया, ज़मीन में मिथेन गैस का रिसाव और ख़तरनाक रसायन उसे ज़हरीला बना रहे थे.

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यहां प्रॉपर्टी की कीमतें गिरने लगीं, कोई यहां रहना नहीं चाहता था. आप मुंबई के देवनार के कचरे के ढेर या दिल्ली के गाज़ीपुर को याद कीजिए - तस्वीर साफ़ हो जाएगी.

जहां के पास से ग़ुज़रना भी दूभर है, जहां ऐसी बदबू होती है कि सांस लेना मुश्किल और आसमान में हज़ारों चील कौवें मंडराते हुए दिखते हैंं.

हाल में देवनार में लगी आग इतनी भीषण थी कि स्थानीय लोगों को सांस लेने की तकलीफ समेत कई बीमारियां झेलनी पड़ी थीं और आग बुझाना मुश्किल हो गया था.

फिर 1996 के आस पास एक महत्वाकांशी परियोजना पर काम शुरु हुआ - 'नानजीडो लैंडफिल रिकवरी प्रोजेक्ट'.

एक सपना जिसमें कचरे के ढेर को पार्क की शक्ल देना और वापस शहर के फेफड़ों में तब्दील करना था.

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पर ये काम आसान नहीं था. सबसे पहले कचरे के ढेर पर मिट्टी की चादर बिछाई गई ताकि बदबू दब सके. फिर ज़हरीले पानी या लीचेट के रिसाव को रोकने के लिए बैरियर लगाए गए और इस लीचेट को कुओं में भर कर, ट्रीट करके हान नदी में डाला गया.

सड़े हुए रसायनों से भरे कचरे के पहाड़ पर मिट्टी डाली गई और जाल बिछाया गया ताकि बारिश का पानी इसमें न रिसे और रासायनिक ज़हर में तब्दील न हो.

यहां उत्पन्न हो रही मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड को भी 106 गैस निकालने के कुओं के ज़रिए पाइप बिछाकर निकाला गया.

इस गैस का प्रयोग अब आसपास के रिहायशी इलाकों में किया जाता है. इस परिवर्तन के बाद यहां प्रॉपर्टी की क़ीमत लगातार बढ़ रही है और इंधन भी बाक़ी शहर से 60 प्रतिशत कम पर मिलता है.

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यानि नानजिडो सिरदर्द से सुकुन भरे आशियाने में तब्दील हो गया है. सन 2002 में यहां विश्व कप फुटबॉल के बहाने स्टेडियम तो बना ही चार बड़े पार्क भी बन गए.

आज इस 2.8 मिलियन वर्ग मीटर पर पांच थीम पार्क हैं - पीस पार्क, नोएल पार्क, नानजीचियोन पार्क और नानजी हैंगिंग पार्क. यहां हर साल लगभग एक करोड़ सैलानी आते हैं.

लोग तो लोग अब यहां एक विशिष्ट प्रजाति का मेंढक भी लौट आया है जो कि लगभग लुप्त हो गया था. युलेलिया नाम की लंबी भूरी घास और ये मेंढक यहां का प्रतीक चिह्न बन गए हैं.

सोल के इस इलाके को पूरी तरह से पुनर्जीवित करने का काम 2020 तक चलेगा. भारत के नीति तैयार करने वाले इस कोशिश से सीख ले सकते है.

समाज को साथ लेकर चलना, पर्यावरण कि प्रगति के नाम पर बलि न देना और व्यवस्थित योजना बना कर कैसे कचरे के ढेर को एक रमणीक स्थल बनाया जा सकता है नानजिडो इसकी जीती जागती मिसाल है.

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भारत में कचरे से ऊर्जा उत्पन्न करने जैसे प्रयास शुरु तो हुए हैं पर उसमें व्यापक सोच की कमी साफ़ दिखती है.

सोल में 2002 से 2014 तक इस कचरे से लगभग 43.85 करोड़ क्यूबिक मीटर गैस का उत्पादन हुआ जिसने आसपास के रिहायशी इलाक़ों की ईंधन ज़रुरतों को पूरा किया.

क्या देवनार और गाज़ीपुर जैसे कचरे के पहाड़ों को जन्नत में बदला जा सकता है - शायद, पर ये तभी संभव होगा जब इस पर भ्रष्टाचार की छाया न पड़े और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी हो.

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