कितना मुश्किल है पर्वतों की ऊंचाइयां मापना?

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हम दुनिया की तमाम मशहूर पर्वतों की चोटियों के बारे में जानते हैं. उनकी ऊंचाई तमाम दस्तावेज़ों में दर्ज है. जैसे, दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर है. इसी तरह के-2 की ऊंचाई 28250 फुट है.

मगर दुनिया में अभी भी बहुत सी ऐसी चोटियां हैं, जिनकी ऊंचाई के बारे में किसी को सही-सही नहीं पता है. अब नए जीपीएस सिस्टम से पहाड़ों की ऊंचाई नापी जा रही है. जिसमें पुराने और नए आंकड़ों में काफ़ी फ़र्क़ देखा जा रहा है.

जैसे हाल ही में ब्रिटेन की सबसे ऊंची चोटी बेन नेविस को नए सिरे से नापा गया. जिसमें इसकी ऊंचाई में एक मीटर का फ़र्क़ आ गया. 1949 में जहां इसकी ऊंचाई 1344 मीटर दर्ज हुई थी. वहीं ताज़ा नाप में ये ऊंचाई 1344. 527 मीटर निकली. जिसे 1345 मीटर के तौर पर दर्ज किया गया.

इस चोटी को ब्रिटिश सर्वेयर मार्क ग्रीव्स ने कई सैटेलाइट और जीपीएस सिस्टम के ज़रिए नापा. बेन नेविस पर एक जीपीएस ट्रैकर रखा हुआ था. इसका सीधा संपर्क अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे नैविगेशन सैटेलाइट से था. जिन्होंने अलग अलग कोण से इस चोटी की ऊंचाई नापी.

क़रीब दो घंटे की इस मशक़्क़त में 12 सैटेलाइट लगाए गए थे. इस दौरान सैटेलाइट से क़रीब पांच लाख बिट्स का डेटा, धरती पर स्थित सैटेलाइट कंट्रोल सिस्टम में भेजा गया. बीस हज़ार किलोमीटर की दूरी से सिग्नल भेजने वाले सैटेलाइट, आसमान से बेन नेविस को हर सिम्त से नाप जोख रहे थे. ताकि इसकी ऊंचाई एकदम सटीक दर्ज हो.

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सैटेलाइट, इस काम के लिए बेन नेविस पर रखे गए जीपीएस सिस्टम के संपर्क में थे. इनसे मिले सिग्नल्स से एक थ्री डी मॉडल बनाया गया. और इस तरह पता चली बेन नेविस की सही-सही ऊंचाई.

हालांकि, दुनिया में ऐसे बहुत से पहाड़ हैं जिनकी सही सही ऊंचाई किसी को नहीं पता. ब्रिटेन में ही कई ऐसी पहाड़ियां हैं जिनकी ऊंचाई हवाई जहाज़ से नापी जाती है. इस विधा को फोटोग्रैमेट्री कहते हैं. इसमें जहाज़ से ली गई तस्वीरों से एक थ्री डी मॉडल बनाया जाता है. जिसकी मदद से किसी चोटी की ऊंचाई नापी जाती है. हालांकि ये आंकड़ा जीपीएस जैसा सटीक नहीं होता

दुनिया की कई ऐसी चोटियां हैं जो या तो गुमनामी या फिर जोखिम की वजह से सही-सही नहीं नापी जा सकी हैं, जीपीएस सिस्टम से.

पिछले साल सितंबर में म्यांमार की काकुबोराजी चोटी को नापने में इतनी दिक़्क़त आई कि, चढ़ाई कर रहे लोगों को बीच से ही अपना मिशन रोक कर लौटना पड़ा.

इसी तरह दक्षिण अमेरिका के एंडीज़ की पहाड़ियों की कई चोटियां हैं, जिनकी सही सही नाप नहीं ली जा सकी है. जैसे सेरो पाराडोन्स. इसकी ऊंचाई 4900 से पांच हज़ार मीटर कही जाती है. यानी किसी को पक्के तौर पर इसकी ऊंचाई नहीं मालूम.

पुराने तरीक़े की नाप और जीपीएस से नापने पर कई बार चोटियों की ऊंचाई में अच्छा ख़ासा फ़र्क़ आ जाता है. जैसे एशिया की उलुघ मुटैग चोटी. 1985 में इसकी ऊंचाई 7723 मीटर दर्ज हुई थी. मगर, हाल में चीन और अमेरिका के साझा मिशन में ये ऊंचाई 6973 मीटर दर्ज गई गई.

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फिर, कई ऐसे पहाड़ भी हैं, जिन्हें अब तक फ़तह नहीं किया जा सका है. हिमालय की लाबुचे कांग थ्री चोटी को ही ले लीजिए. तिब्बत के इस पहाड़ पर अब तक कोई नहीं चढ़ा है. दस्तावेज़ों में इसकी ऊंचाई 7200 मीटर के आस-पास दर्ज है.

यहां तक की दुनिया की सबसे ऊंची चोटी, एवरेस्ट की ऊंचाई को लेकर भी विवाद है. नेपाल का कहना है कि इसकी ऊंचाई में, चोटी पर जमी बर्फ़ को भी जोड़ा जाना चाहिए. वहीं चीन कहता है कि असल में तो एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर से चार मीटर घटाकर दर्ज की जानी चाहिए.

नेपाल ने एवरेस्ट को नए सिरे से नापने का मिशन शुरू किया था. मगर, इसका नतीजा क्या निकला, किसी को नहीं मालूम.

दुनिया के ऊंचे पहाड़ों को नापना बेहद जोखिमभरा काम है. इन शानदार चोटियों देखकर इंसान को अपने छोटेपन का एहसास होता है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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