वह तोप से सेटेलाइट भेजना चाहते थे

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Image caption जेराल्ड बुल (सबसे बाएं) 1964 में मैक्गिल विश्वविद्यालय, कनाडा में.

ब्रिटेन के हैंपशायर शहर में फ़ोर्ट नेल्सन के अंदर रॉयल आर्मरीज़ संग्रह है. इसमें दो बहुत बड़े-बड़े लोहे के पाइप नुमाइश के लिए रखे हैं. ये इतने बड़े हैं कि एक आदमी इनके अंदर आराम से रेंग सकता है.

दिखने में सामान्य से दिखने वाले ये पाइप, असल में एक बहुत बड़े लेकिन अधूरे सपने के गवाह हैं. ये उस प्रोजेक्ट 'बिग बेबीलोन' के बचे-खुचे हिस्से हैं, जो अगर कामयाब हो जाता तो दुनिया का रूप ही अलग होता.

इन पाइप की मदद से एक ऐसी बड़ी सी तोप या सुपरगन बनाई जा रही थी, जिससे अंतरिक्ष में उपग्रहों को पहुंचाया जा सके. आज दुनिया भर में सैटेलाइट लॉन्च के लिए रॉकेट इस्तेमाल होता है. मगर बिग बेबीलोन प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाले ने तोप से सैटेलाइट लॉन्च का ख़्वाब देखा था.

यह ख़्वाब देखने वाले शख़्स का नाम था जेराल्ड बुल. जेराल्ड दुनिया के कुछ बहुत मशहूर तोप विशेषज्ञों में से एक थे. अपने करियर के शुरुआती दौर में जेराल्ड ने कनाडा और अमरीकी सरकारों के साथ काम किया था.

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रॉयल आर्मरी में जेराल्ड के अधूरे ख़्वाब के सुबूत की निगरानी करने वाले निकोलस हाल कहते हैं कि जेराल्ड बुल बेहद क़ाबिल वैज्ञानिक थे.

अगर सुपरगन बन जाती तो अंतरिक्ष के मिशन में इंक़लाब आना तय था. सैटेलाइट लॉन्च का बेहद ख़र्चीला काम बहुत सस्ते में हो जाता. अंतरिक्ष तक पहुँचने की इंसानी कोशिशों की दिशा में यह बेहद कामयाब क़दम होता.

मगर, ऐसा कुछ नहीं हो सका. जेराल्ड बुल का सपना अधूरा रह गया. जो तकनीक वह विकसित कर रहे थे, उसकी आज दुनिया में भारी मांग होती. मगर, जेराल्ड के एक फ़ैसले ने सब-कुछ बर्बाद कर दिया. जेराल्ड ने सुपरगन बनाने का सपना पूरा करने के लिए इराक़ के तानाशाह सद्दाम हुसैन से हाथ मिला लिया था.

मगर, आज भी सवाल उठता है कि क्या जेराल्ड का सुपरगन बनाने का सपना साकार हो सकता था.

1960 के दशक में जेराल्ड ने बड़ी तोपों की तकनीक के विकास के लिए अमरीका और कनाडा की सरकारों के साथ काम किया. शुरू में उनके कुछ आइडिया कामयाब भी रहे. जानकार कहते हैं बुल का असल मक़सद था अंतरिक्ष में इंसान की छलांग को कम ख़र्चीला बनाना.

1961 में बुल ने अमेरिका और कनाडा के साझा प्रोजेक्ट हार्प यानी हाई एल्टीट्यूड रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया, नेवी की पुरानी तोपों में बदलाव करके, बुल और उनकी टीम ने धरती की कक्षा के भीतर ही मौसमी उपग्रह लॉन्च किए.

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Image caption बिग बैबीलोन बैरेल के दो हिस्से. फ़ुल साइज़ में यह 156 मीटर लंबी होती और इसका बोर एक मीटर को होता.

मगर, वियतनाम युद्ध में अमरीका की नाकामी की वजह से यह प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया. मगर, जेराल्ड बुल के दिमाग़ में सैटेलाइट लॉन्च के लिए तोप बनाने का कीड़ा कुलबुला रहा था.

आमतौर पर रॉकेट लॉन्च की पूरी प्रक्रिया बेहद लंबी और ख़र्चीली है. इसमें पेलोड से ज़्यादा ज़ोर, रॉकेट के ईंधन पर देना पड़ता है, जिससे रॉकेट तेज़ रफ़्तार से धरती के वायुमंडल से बाहर निकल सके. रॉकेट के इंजन बेहद महँगे होते हैं और उनका दोबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता.

बुल के पुराने हार्प प्रोजेक्ट में तोपों की मदद से चीज़ों को दो किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से फेंका जा सकता था. इससे रॉकेट लॉन्च के पहले स्टेज को आसानी से हासिल किया जा सकता था.

लोग सोचते हैं कि तोप से लॉन्च करने पर जो सैटेलाइट या दूसरी चीज़ें अंतरिक्ष में भेजी जानी हैं, वो ईंधन जलने या गोला दागने के झटके से तबाह हो सकती हैं- मगर ऐसा नहीं. आज बड़ी-बड़ी तोपों से दाग़े जाने वाले गोलों में जीपीएस और दूसरी हाई तकनीक की चीज़ें होती हैं. वो सब लॉन्च के झटके को आसानी से बर्दाश्त कर लेती हैं.

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Image caption कज़ाकिस्तान के बैकोनुर से सोयुज़ रॉकेट का प्रक्षेपण.

जेराल्ड बुल को भी लगता था कि उनका सुपरगन का आइडिया पूरा हो सकता है. मगर, इस पर काम करने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. कोई सरकार या कारोबारी उनके प्रोजेक्ट में पैसे नहीं लगाना चाहता था.

इसके बुल ने हथियार बेचने शुरू कर दिए, ताकि अपने सुपरगन प्रोजेक्ट के लिए पैसे जुटा सकें. उन्होंने एक निजी कंपनी बनाई और जिन देशों पर पाबंदी लगी थी उन्हें बड़े हथियार बेचने लगे.

उस वक़्त दक्षिण अफ्रीका पर रंगभेद की वजह से पाबंदी थी. फिर भी बुल ने वहां की सरकार को हथियार बेचे. इस जुर्म में वह गिरफ़्तार भी हुए दो बार और जुर्माना भी भरना पड़ा.

तंग आकर जेराल्ड ने अमेरिका छोड़कर, बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स को ठिकाना बनाया.

1981 में सद्दाम हुसैन की इराक़ी सरकार ने जेराल्ड बुल से संपर्क किया कि वह उनके लिए अच्छी तोपें और हथियार बनाएं. इसके एवज़ में बुल ने सद्दाम से अपने सुपरगन के प्रोजेक्ट के लिए मदद मांगी. सद्दाम हुसैन को तोपों की ज़रूरत थी ईरान से जंग के लिए. इसीलिए वह बुल के सुपरगन के सपने के लिए पैसे देने को राज़ी हो गए.

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Image caption नासा अंतरिक्ष की कक्षा में सैटेलाइट स्थापित करने में करीब 22,000 डॉलर प्रति किलोग्राम ख़र्च करता है.

ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान सद्दाम को पश्चिमी देशों की सरकारों का साथ हासिल था. इसलिए जेराल्ड जैसे लोगों को भी सद्दाम से जुड़ने में दिक़्क़त नहीं हुई. आख़िरकार 1988 में आकर बुल को इराक़ सरकार से 250 लाख डॉलर दिए, सुपरगन के आइडिया पर काम करने के लिए.

इसका नाम रखा गया 'प्रोजेक्ट बेबीलोन'. इसके लिए एक मीटर मोटी दो तोपें तैयार की गईं. साथ ही 350 मिलीमीटर मोटाई की दो छोटी तोपें भी बनाई गईं. अगर, बिग बेबीलोन सुपरगन तैयार होती तो इसकी नली की लंबाई 156 मीटर और मोटाई क़रीब एक मीटर होती. इसका वज़न पंद्रह सौ टन से भी ज़्यादा होता.

ये दुनिया में अब तक बनी किसी भी तोप से बड़ी होती. नौ टन ईंधन की मदद से ये सुपरगन छह सौ किलो वज़न की चीज़ को कुछ सेकेंडों में एक हज़ार किलोमीटर दूर फेंक सकती थी. या फिर इसकी मदद से 200 किलो के किसी सैटेलाइट को 2000 किलो के रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजा जा सकता था. हां इसके लिए काफ़ी ताक़तवर ईंधन की ज़रूरत थी.

रॉयल आर्मरी के निकोलस हाल कहते हैं कि अब चूंकि सुपरगन का बुल का सपना अधूरा रहा तो इस बारे में ख़्याली घोड़े ही दौड़ाए जा सकते हैं. शायद यह किसी एंटी टैंक तोप जैसा काम करता.

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Image caption पारंपरिक रूप से रॉकेट लॉंच में कई चरणों में उपग्रह अपनी कक्षा में पहुंचता है.

अगर बुल, बिग बेबीलोन प्रोजेक्ट पूरा कर पाते तो, सैटेलाइट लॉन्च का ख़र्चा आज के हिसाब से 10वें हिस्से से भी कम रह जाता. मोटे अंदाज़े के मुताबिक़ एक किलो वज़न को सुपरगन से अंतरिक्ष में भेजने का ख़र्च 1727 डॉलर आता. इसके मुक़ाबले नासा, एक किलो सामान को अंतरिक्ष तक पहुंचाने में आज 22 हज़ार डॉलर ख़र्च करता है.

वैसे 1980 के दशक में एक और अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन हंटर भी सुपरगन के आइडिया पर काम कर रहे थे. उनके प्रोजेक्ट का नाम था शार्प यानी सुपर हार्प. जेराल्ड बुल के साठ के दशक के प्रोजेक्ट हार्प की तर्ज पर.

इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले हंटर बताते हैं कि उनका आइडिया काफ़ी हद तक कामयाब रहा था. बुल जहां पाउडर वाले ईंधन का इस्तेमाल करने वाले थे. वहीं हंटर और उनके साथी हाइड्रोजन गैस जैसे ताक़तवर गैस वाले ईंधन की मदद से प्रयोग कर रहे थे. हालांकि ये प्रोजेक्ट भी बीच में ही बंद कर दिया गया.

बुल की सबसे ज़्यादा बुराई इस बात के लिए की जाती है कि उन्होंने इतनी बढ़िया तकनीक, सद्दाम हुसैन जैसे तानाशाह को दे दी थी. हालांकि ख़ुद जेराल्ड बुल कहते थे कि सुपरगन का जंग में इस्तेमाल लगभग नामुमकिन था.

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वह एक ही जगह से काम कर सकती थी. एक ही दिशा में फ़ायर कर सकती थी. इतनी भारी थी कि बार-बार लाना ले जाना मुमकिन नहीं था और उससे गोला दाग़ने से इतना ताक़तवर झटका लगता कि पूरी दुनिया को उसके ठिकाने के बारे में पता चल जाता.

फिर दुश्मन, आसानी से इस सुपरगन को तबाह कर सकते थे. मगर सद्दाम के हाथों में पड़ने पर इस तकनीक के बेज़ा इस्तेमाल का ख़तरा तो था ही.

इराक़ में उस वक़्त सद्दाम के साथी रहे लोग बताते हैं कि इस सुपरगन का इस्तेमाल ईरान और इसराइल जैसे इराक़ के दुश्मनों के ख़िलाफ़ करने की योजना थी. इसकी मदद से इराक़ की जासूसी करने वाले दुश्मनों के सैटेलाइट को निशाना बनाने का इरादा था. हालांकि सपना तो अधूरा ही रह गया.

1989 में बुल की सुपरगन का प्रोटोटाइप तैयार हो चुका था. इराक़ में उसे एक पहाड़ी पर लगाया गया था. टेस्ट शुरू हो गए थे. इस सुपरगन के हिस्से ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, स्विटज़रलैंड और इटली में बनाए गए थे.

ब्रिटेन के फोर्ट नेल्सन में रखा तोप का पाइप ब्रिटेन में ही शेफ़ील्ड फोर्जमास्टर्स नाम की कंपनी ने बनाया था.

सब कुछ सही राह पर था. मगर एक साल के भीतर ही सब ख़त्म हो गया. 22 मार्च 1990 को जेराल्ड बुल को उनके ब्रसेल्स स्थित अपार्टमेंट में घुसते वक़्त गोली मार दी गई.

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इस हत्या के पीछे कभी इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद तो कभी अमेरिकी या ब्रिटिश जासूसों का नाम लिया गया. लेकिन, असली क़ातिल कभी नहीं पकड़े गए.

बुल के क़त्ल के बाद प्रोजेक्ट बेबीलोन ख़त्म हो गया. यूरोपीय देशों में हुई धरपकड़ में इससे जुड़ी तमाम चीज़ें पकड़ी गईं.

हालांकि पिछले कुछ सालों में फिर से सुपरगन के आइडिया पर काम करने की बात हो रही है. अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन हंटर ने कुछ और लोगों के साथ मिलकर 2009 में क्विकलांच नाम से नया प्रोजेक्ट शुरू किया. जिसमें हाइड्रोजन गैस की मदद से सैटेलाइट लॉन्च की संभावना तलाशी जा रही थी.

इसमें सुपरगन को समंदर में लगाने का इरादा था. हंटर का कहना था कि पानी के भीतर होने की वजह से तोप को घुमाना और इस्तेमाल करना आसान था. इससे हर दो घंटे में नया लॉन्च हो सकता था.

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Image caption कुछ विश्वविद्यालय अब भी एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के लिए गैस गन का इस्तेमाल करते हैं.

हालांकि यह प्रोजेक्ट भी अधूरा रहा. पैसे की कमी आड़े आ गई. आज की तारीख़ में स्पेस एक्स कंपनी, फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले रॉकेट की तकनीक विकसित करने में लगी है. ऐसा हुआ तो जेराल्ड बुल और जॉन हंटर का सुपरगन का आइडिया एक अधूरा ख़्वाब ही रह जाएगा.

वैसे कुछ यूनिवर्सिटी और रिसर्च सेंटर्स में सुपरगन की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. मगर उस पैमाने पर नहीं जैसा सपना जेराल्ड बुल ने देखा था.

जेराल्ड बुल ने ज़मीन से आसमान पर निशाना साधने की कोशिश की थी. मगर वो ख़ुद धड़ाम से धरती पर आ गिरे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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