आम लोगों की ज़ुबान बोलने लगी महारानी

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किसी भी ज़बान में अल्फ़ाज़ अदा करने के कई तरीक़े होते हैं. एक होता है रईसाना अंदाज़. दूसरा, आम बोल-चाल का सलीक़ा. ब्रिटेन में अंग्रेज़ी बोलने का एक ख़ास लहज़ा रहा है, ख़ास तौर से अमीर-उमरा का, रईसों का.

हिंदुस्तान में भी बहुत से लोगों ने अंग्रेज़ों के बोलने के तरीक़े को अपनाया था ब्रिटिश राज में. मगर अब अमरीका का ज़माना है. अमरीकी चीज़ों को लेकर ज़्यादा दिलचस्पी है. तो अंग्रेज़ी बोलने का अमरीकी लहज़ा भी दुनिया में अपना दायरा बढ़ा रहा है.

लेकिन, ये किसने सोचा था कि ख़ुद अंग्रेज़, अपनी ही ज़बान के अल्फ़ाज़, अमरीकियों की तरह अदा करने लगेंगे.

ज़बान के जानकार कहते हैं कि अब ब्रिटेन में अंग्रेज़ी बोलने का सलीक़ा बदल रहा है. तलफ़्फ़ुज़ में ये बदलाव, सिर्फ़ आम लोगों तक सीमित नहीं. आज तो लोग ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ के बोलने के लहजे में बदलाव नोटिस कर रहे हैं. वो अमरीकियों की तरह ड्रॉपिंग को ड्रॉपिन...एंट की जगह एन...बोल रही हैं, यानी आख़िरी अक्षर का उच्चारण ही गोल कर जा रही हैं.

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सिर्फ़ महारानी ही क्यों, आज, ब्रिटेन के कुलीन वर्ग के बोलने का लहजा भी बदल रहा है. जो बर्तानवी रईस तबक़ा कल तक अपने अल्फ़ाज़ों की अदायगी, एक ख़ास तरह से करने में अपनी शान समझता था, वो तबक़ा आज आम लोगों की ज़ुबान अपना रहा है.

अंग्रेज़, हमेशा से सोसाइटी में अमीर-ग़रीब के फ़र्क़ पर ज़ोर देते रहे हैं. इसी वजह से अंग्रेज़ी बोलने के सलीक़े में आए बदलाव को लेकर अफ़सोस ज़ाहिर किया जा रहा है. मगर, जब आज ख़ुद ब्रिटेन की महारानी, ''क्वींस इंग्लिश'' नहीं बोलतीं तो फिर इस पर क्या अफ़सोस करना.

वैसे, अंग्रेज़ी बोलने का सही तरीक़े को लेकर, चर्चा ज़्यादा पुरानी नहीं. ब्रिटिश लाइब्रेरी में ज़बान के जानकार जॉनी रॉबिन्सन, अठारहवीं सदी के मशहूर ब्रिटिश साहित्यकार सैमुअल जॉनसन का हवाला देते हैं. वो कहते हैं कि जॉनसन ने भी जब अंग्रेज़ी की डिक्शनरी तैयार की तो किसी शब्द को बोलने के ख़ास तरीक़े पर ज़ोर नहीं दिया. जॉनसन के मुताबिक़ कोई भी शब्द कैसे बोला जाना चाहिए, इस बात को किसी को बताने की ज़रूरत नहीं.

रॉबिन्सन के मुताबिक़ इंग्लैंड के अमीरों और पढ़े-लिखे लोगों का अंग्रेज़ी बोलने का लहज़ा, अठारहवीं सदी तक आम लोगों का जैसा ही था. ख़ुद डॉक्टर सैमुअल जॉनसन अपने शहर लिचफ़ील्ड के आम लोगों की तरह अंग्रेज़ी बोलते थे.

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अमीर और ग़रीब के अंग्रेज़ी बोलने के सलीक़े का ये फ़र्क़, अठारवहीं सदी में ब्रिटेन में बोर्डिंग स्कूलों के चलन के साथ आया. वहां पढ़ने वाले बच्चे समाज में अलग नज़र आएं, उनकी अलग पहचान हो, इसीलिए ख़ास तरह से अल्फ़ाज़ अदा करने पर ज़ोर दिया जाने लगा. उस वक़्त ज़्यादातर बोर्डिंग स्कूल और यूनिवर्सिटी दक्षिण पूर्व इंग्लैंड में थे. तो वहां अंग्रेज़ी बोलने का जो तरीक़ा था वो रईसाना मानकर, उसे ही बढ़ावा दिया गया.

बाद में बीबीसी ने भी अंग्रेज़ी बोलने के इसी तरीक़े को अपना लिया. इससे अंग्रेज़ी बोलने वाले दो हिस्सों में बंट गए. एक अमीर-उमरा, कुलीन वर्ग का सलीक़ा और दूसरा आम शहरी का तरीक़ा.

वैसे बीसवीं सदी के आते-आते ब्रिटिश समाज में अमीर-ग़रीब, सामंतवादी-आम आदमी के बीच का दायरा सिमटने लगा था. इस दौर में अंग्रेज़ी बोलने का ख़ास लहजा ही रईस परिवारों के लोगों को अलग पहचान देता था. ये ज़ाहिर करता था कि कुछ लोगों को अपनी संपत्ति विरासत में मिली है. ऐसी संपत्ति जो उन्होंने ख़ुद नहीं कमाई.

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बीसवीं सदी की ब्रिटिश उपन्यासकार, नैंसी मिटफ़ोर्ड ने अपनी क़िताब 'नोबलेस ओब्लाइज' में इसका बख़ूबी ज़िक्र किया है.

वो लिखती हैं, 'आज कुलीन वर्ग के लोग, आम लोगों से सिर्फ़ अपनी ज़ुबान की वजह से अलग ज़ाहिर होते हैं. क्योंकि उनमें और बाक़ी लोगों में कोई फ़र्क़ नहीं बचा. आज न वो साफ़-सुथरे हैं, न अमीर हैं और न ही किसी और से ज़्यादा पढ़े-लिखे.'

शायद ये पहले से तय था कि ब्रिटेन में अंग्रेज़ी बोलने के लहजे का फ़र्क़ एक दिन मिट जाएगा. जैसे-जैसे कामकाजी तबक़े के लोग, हुकूमत में ऊंचे ओहदों तक पहुंच रहे हैं. वैसे-वैसे बोलने के लहजे का फ़र्क़ मिटता जा रहा है. म्यूनिख की लुडविग मैक्समिलन यूनिवर्सिटी के जोनाथन हैरिंगटन कहते हैं कि आज लंदनिया बोली के बोलने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.

लंदनिया बोली, पहले के रईसाना अंदाज़ और आजकल दुनिया में अंग्रेज़ी बोलने के लहज़े का मिला-जुला रूप है. अंग्रेज़ सामंतवादी वर्ग और कामकाजी तबक़ा, दोनों ही आज तलफ़्फ़ुज़ के इस अंदाज़ को अपना रहे हैं.

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ब्रिटिश लाइब्रेरी के जॉनी रॉबिन्सन, ब्रिटिश राजकुमारों प्रिंस विलियम और प्रिंस हैरी के बोलने के लहजे का हवाला देते हैं. वो पुराने रईसाना सलीक़े के साथ-साथ लंदन के आम शहरी जैसी अंग्रेज़ी बोलते हैं. उनके मुक़ाबले, प्रिंस विलियम की पत्नी डचेज़ ऑफ़ कैम्ब्रिज, केट की अल्फ़ाज़ अदायगी अभी भी अमीर तबक़े के लोगों जैसी है.

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रॉबिंसन कहते हैं कि प्रिंस विलियम से शादी के वक़्त केट के ख़ानदानी न होने का मज़ाक़ बनाया गया था. इसी वजह से केट ने अंग्रेज़ी बोलने के लहजे में ज़ोर देकर बदलाव लाने की कोशिश की है. क्योंकि निचले तबक़े से आने वाले लोग जब ऊंचे दर्ज़े में शामिल होते हैं तो वो उनके जैसा बनने की कोशिश करते हैं. वहीं रईस कई बार इन बातों से बेपरवाह होते हैं. जैसे प्रिंस विलियम और हैरी.

अक्सर बच्चे, सड़कछाप बोली को अपना लेते हैं. कई बार ऐसे लोगों की नक़ल करते हैं. बचपन में ऐसा करना दोस्तों के बीच अच्छा माना जाता है. कई बार बड़े होने पर, ये आदत लोगों में फिर से सिर उठाती है.

हालांकि ब्रिटिश महारानी में इस तरह के बदलाव चौंकाने वाले हैं. म्यूनिख़ यूनिवर्सिटी के जोनाथन हैरिंगटन कहते हैं कि ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ के अंग्रेज़ी बोलने का तरीक़ा काफ़ी बदल गया है. उनका लहज़ा ब्रिटिश मध्यम वर्ग के जैसा होता जा रहा है.

अगर आप क्वीन एलिज़ाबेथ के 1957 के क्रिसमस भाषण को सुनें और उसकी तुलना में ताज़ा स्पीच सुनें तो फ़र्क़ साफ़ महसूस होगा.

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हैरिंगटन को इस बात पर शक है कि महारानी एलिज़ाबेथ ने आम लोगों जैसी अंग्रेज़ी बोलने की ट्रेनिंग ली है. तभी तो साल दर साल उनके बोलने के तरीक़े में बदलाव आता दिखता है. जैसे वो अपनी प्रजा के क़रीब होने की कोशिश कर रही हों, उनके जैसी अंग्रेज़ी बोलकर.

इसके बजाय वो बातचीत में आने वाले बदलावों को लेकर हुए रिसर्च का हवाला देते हैं. हैरिंगटन के मुताबिक़, हम जब किसी से बात करते हैं तो अक्सर हम उसके जैसा बोलने की कोशिश करते हैं. ताकि उससे बेहतर तालमेल बैठा सकें. लोग ऐसा जान-बूझकर नहीं करते. वो बस ख़ुद-ब-ख़ुद होता जाता है. इससे हमें उनकी बात या भावना समझने में आसानी होती है.

अगर दो लोगों की बातचीत पर ग़ौर करें तो हर मुलाक़ात के बाद दोनों का लहजा एक-दूसरे के क़रीब आता महसूस होता है.

हैरिंगटन कहते हैं कि अपने राज के शुरुआती दौर में महारानी एलिज़ाबेथ का आम लोगों से मेल-जोल बेहद कम होता था. इस वजह से वो अलग तरह से अंग्रेज़ी बोलती थीं, जो अमीर तबक़े का सलीक़ा था. मगर साठ और सत्तर के दशक से उन्होंने आम ब्रिटिश नागरिकों से मेल-जोल बढ़ाया, तो उनका बात कहने का अंदाज़ भी धीरे-धीरे बदल गया.

इसी तरह से पचास के दशक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री, सामंत वर्ग से आते थे. मगर साठ और सत्तर के दशक के आते-आते, कामकाजी तबक़े के लोग भी प्रधानमंत्री बने. जैसे हैरोल्ड मैक्मिलन, एडवर्ड हीथ. फिर इनका स्टाफ़ आम लोगों से ही आता था. इस वजह से हुक्मरानों के बोलने का लहज़ा बदल गया, धीरे-धीरे.

बीबीसी के एंकर्स और रिपोर्टर्स के लहजे में भी धीरे-धीरे ये बदलाव आया. रईसाना लहज़े के बजाय वो आम ब्रिटिश नागरिकों जैसी अंग्रेज़ी बोलने लगे.

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पहले, हम ये बदलाव, किसी प्रयोग के दौरान देखते थे. मगर आज ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ भी, आम लोगों से हेल-मेल की वजह से उनकी बोलचाल को अपना रही हैं, अनजाने में ही सही.

यानी इक्कीसवीं सदी में अंग्रेज़ी, अपने देश ब्रिटेन में ही बहुत बदल गई है. आज उसे नई पहचान मिल रही है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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