ईसा चीन में होते तो क्या कम्युनिस्ट होते

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हो भी सकते थे, बीजिंग में एक आधिकारिक चर्च के पादरी के अनुसार शायद हो भी सकते थे. लेकिन हम उनसे कुछ सुनने से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं.

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने एक बार धर्म को नष्ट करने की कोशिश की थी, लेकिन विफल रहे

एक अनुमान के तहत चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों से अधिक इसाई हैं. और साप्ताहंत में 10 करोड़ से अधिक लोग ईस्टर मना रहे हैं.

तो, एक नास्तिक सरकार आधिकारिक तौर पर प्रभावी ढंग से अपना ही चर्च चलाती है और अपने पादरियों को नियुक्त करती है. जैसे बीजिंग के हैदियन चर्च के पादरी वु विकिंग.

वुकिंग कहते हैं कि हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि हम इस देश के नागरिक हैं और सभी एक परमेश्वर के बंदे हैं. बाक़ी सब इसके बाद आता है.

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चीन की सरकार पास्टर वु विकिंग की तरह सभी पादरियों की नियुक्तियां भी ख़ुद ही देखती है.

फिर मैंने उनसे पूछा कि क्या यदि ईसा आज ज़िंदा होते तो आपको लगता है कि चीन की इस कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार से ख़ुश होते?

उन्होंने बिना हिचकिचाहट के तपाक से कहा हां, ज़रूर, मुझे ऐसा ही लगता है.

उनका यह जबाव कम्युनिस्ट पार्टी के धार्मिक विश्वास का चित्रण है.

चीन के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार पिछले दो वर्षों में एक अलग तरह की ईसाईयत विकसित करने की कोशिश कर रहा है, क्रिश्चियन थियोलोजी.

चीन की सरकार ने चर्च पर अपनी पकड़ और मजबूत की है और चर्च पर से क्रॉस का निशान तक हटा लिया है.

अब चीन में एक छोटे से कमरे में चर्च बनाए जा रहे हैं जिसमें महज़ 10 लोगों का समूह बाइबिल पढ़ सकता है और स्तुति कर सकता है.

बीजिंग शहर में ऐसे कई चर्च मौजूद हैं जो घरों में चलाए जा रहे हैं. घरों में चलाए जा रहे इन चर्चों के अधिकारियों को समय समय पर अधिकारी परेशान करते रहते हैं. कभी कभी पकड़ कर भी ले जाते हैं.

एक ऐसे ही प्रार्थना करने वाले शू ज़ॉगाई कई बार जेल जा चुके हैं.

ज़ॉगाई बताते हैं कि आधिकारिक चर्च महज़ एक राजनीतिक संस्था मात्र है. और यह बिल्कुल संभव नहीं है कि हम ईसा को छोड़ दें और पार्टी के पीछे-पीछे चलने लगें.

वहीं दूसरी तरफ बीजिंग की आधिकारिक चर्च के पादरी पास्टर वू कहते हैं कि मैं क़ानून के भीतर रहते हुए, क्रिश्चियन लाइफ जी रहा हूं.

मैं वह काम बिल्कुल नहीं करूंगा जिसकी अनुमति हमारी सरकार नहीं देती है.

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