क्या आप भी किसी लालच में दान देते हैं?

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परोपकार या ख़ैरात का काम करने वाले लोग अक्सर एक परेशानी का सामना करते हैं. दान देने वाले लोग उनके सामने शर्त रखते हैं कि उनके पैसे का ख़ास तरीक़े से उपयोग किया जाए.

मसलन, अगर किसी ने स्कूल की इमारत बनाने के लिए दान दिया है, तो वो कहता है कि बिल्डिंग का ठेका उसकी पसंद के ठेकेदार को ही दिया जाए. ऐसे में दान लेने वाली संस्था को क्या करना चाहिए? क्या उसे दाता की शर्त माननी चाहिए?

समाज में दान देने वालों की बड़ी कद्र होती है. हम उनकी शान में क़सीदे पढ़ते हैं. उनका मान रखने के लिए उनके गुण गाते हैं. किसी ने अगर किसी इमारत के लिए दान दिया है तो उसके नाम का इमारत में पत्थर लगवा देते हैं.

परोपकार के काम में लगी संस्थाएं, अपने मिशन के लिए दान पर ही निर्भर होती हैं. कहा ये जा सकता है कि दान हासिल करना ही मक़सद है. उसके लिए कुछ समझौते करने पड़ें तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?

मगर, दान लेने के नाम पर किसी शख़्स से ब्लैकमेल होना तो ठीक नहीं. मान लिया कि इससे कोई ग़ैरक़ानूनी काम नहीं होता. लेकिन, अगर कोई आदमी बिना किसी लालच के, बिना स्वार्थ के दान करता है तब तो ठीक.

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मगर, वो अपने दान का फ़ायदा अपने जानने वालों या किसी रिश्तेदार को दिलाना चाहे, तब तो दान का मक़सद ही ख़त्म हो जाएगा. फिर तो ये लेन-देन का मामला हो जाएगा. ये तो दान के बहाने अपना उल्लू सीधा करने जैसा होगा.

इस मामले में न्यूयॉर्क की एक्सपर्ट एलिसन डोबेल कहती हैं कि अगर दान देने वाला कोई शर्त रखता है, तो दान लेने वाले को सवाल उठाने का पूरा हक़ है. क्योंकि दान बिना किसी स्वार्थ के दिया जाता है, अपने किसी दोस्त-यार या रिश्तेदार को मदद पहुंचाने के लिए नहीं.

ख़ैरात के काम में लगी संस्थाओं को पहले अपनी संस्था के सदस्यों से इस बारे में बात कर लेनी चाहिए. ये साफ़ कर देना चाहिए कि आप किसी दाता की शर्त नहीं मानेंगे. इस नियम को आप क़लमबद्ध कर लीजिए.

जब भी कोई दान देने वाला, अपने पैसे के इस्तेमाल की शर्त लगाए, तो आप अपने इस लिखित नियम का हवाला देकर उसे मना कर सकते हैं.

इससे कुछ लोग दान देने के अपने फ़ैसले से मुकर सकते हैं. मगर आपके मिशन के लिए ये अच्छा होगा. आपका, दूसरों का भला करने का मक़सद, उनकी शर्तों से प्रभावित नहीं होगा. आगे चलकर आपको ऐसे ही लोगों से दान मिलेगा जो बिना शर्त आपकी मदद करने को राज़ी होंगे.

इससे आपका नाम और काम दोनों बेहतर होंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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