काम डेडलाइन पर ख़त्म क्यों नहीं होता?

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अक्सर हम कोई काम ख़त्म करने के लिए वक़्त की जो मियाद तय करते हैं, उसमें काम पूरा नहीं होता. हम अपनी ही तय की डेडलाइन पर काम ख़त्म नहीं कर पाते.

इस वजह से अक्सर लोग आलसी कहलाते हैं. दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है, जो आलस की वजह से वक़्त पर काम ख़त्म नहीं कर पाते.

जब लोग आलसी कहे जाते हैं, तो वो किसी काम को और भी कम वक़्त में पूरा करने की ठानते हैं. ख़ास तौर से दफ़्तर में, लोग नई-नई डेडलाइन तय करते हैं. कोई असाइनमेंट तीन दिन के बजाय दो दिन में पूरा करने की ठानते हैं. कॉन्फ्रेंस कॉल एक घंटे के बजाय आधे घंटे में समेटने की कोशिश होती है.

ऐसा करके कई बार लोग ज़्यादा काम निपटा लेते हैं. अमेरिकी एक्सपर्ट क्रेग स्मिथ ने ऐसा करके, अपने एक काम को तय वक़्त से एक हफ़्ते कम समय में ख़त्म कर लिया. क्रेग की टीम में 17 लोग थे. उन्होंने धीरे-धीरे डेडलाइन कम की और आख़िर में उनकी टीम ने कम वक़्त में वह टास्क पूरा करके दिखा दिया.

मगर, कई ऐसे काम भी होते हैं जिन्हें कम वक़्त में पूरा कर पाना बेहद मुश्किल होता है. मसलन लिखना, संपादन, इंटरव्यू लेना और रिसर्च. अगर बार-बार यह काम करना पड़ता है, तो भी काम का वक़्त कम नहीं होता. जैसे कुछ लिखते वक़्त या फिर इंटरव्यू लेते वक़्त अक्सर लोग डेडलाइन मिस करते हैं.

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वैसे कंपनियां 'फेक डेडलाइन' या 'पार्किंसन्स लॉ' के ज़रिए उत्पादकता बढ़ाने की कोशिश करती हैं. जैसे कर्मचारियों को हफ़्ते भर की मियाद बतायी गई, जबकि काम 10 दिन में भी पूरा होता, तो भी दिक़्क़त नहीं थी.

वैसे ख़ुद से ही डेडलाइन में कटौती कर-करके हम ज़्यादा काम निपटा सकते हैं. ख़ुद पर लगाई वक़्त की ये पाबंदियां छोटी-छोटी होती हैं. जैसे 30 मिनट का काम 25 मिनट में ख़त्म करने की कोशिश. इन छोटी-छोटी डेडलाइंस से हम वक़्त भी बचा लेते हैं और समय से पहले काम भी निपट जाता है.

हालांकि हर वक़्त डेडलाइन के अंदर काम करने की कोशिश से नुक़सान भी होते हैं. आराम से काम करते हुए हम कुछ नया, बेहतर सोचते हुए काम करते हैं. हमारा काम इससे निखरता है. लेकिन, अगर हर वक़्त दिमाग़ पर डेडलाइन सवार होगी, तो बेहतर सोचने-करने के लिए वक़्त ही नहीं होगा.

अमेरिकी मीडिया विशेषज्ञ रेयान हॉलीडे कहते हैं कि कड़ी डेडलाइन में काम करने और आराम से काम करने के बीच बढ़िया बैलेंस बनाना ही सही आइडिया है. इससे ज़रूरत पड़ने पर हम तेज़ी से काम निपटा सकेंगे और जब वक़्त होगा, तो कुछ नए आइडिया पर काम करने की कोशिश भी होगी.

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ख़ुद हॉलीडे अपने काम को ऐसे ही बांटते हैं. कुछ कड़ी डेडलाइन के बीच अपने काम के वक़्त में से आराम से काम करने के पल भी वह चुराते हैं. घर से काम करते वक़्त हॉलीडे, दिन के आधे हिस्से में बिना कोई डेडलाइन तय किए काम करते हैं. दिन के बाक़ी हिस्से में वह तय मियाद से कम में काम निपटाने की कोशिश करते हैं.

वे सलाह देते हैं कि किसी नए, क्रिएटिव प्रोजेक्ट पर काम करते वक़्त डेडलाइन तय करना ज़रूरी होता है. वरना काम खिंचता चला जाता है और ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता.

अक्सर हम लोग वही काम करते हैं जो करते आ रहे होते हैं. मतलब पहले किए हुए काम जैसे काम ही दुहराते हैं. जैसे कोई ख़बर लिखने का काम. हमें पता होता है कि राजनीति की या खेल की कोई रिपोर्ट तैयार करने में कितना वक़्त लगता है तो हम उसमें से कुछ लम्हे चुराने की कोशिश कर सकते हैं.

इससे हमारी प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी. हम बचा वक़्त किसी नए आइडिया पर काम करने में लगा सकते हैं.

इसी तरह कोई कंप्यूटर प्रोग्रामर किसी कोड को कम वक़्त में लिख सकता है. फिर बचे हुए टाइम मे वह दिमाग़, उस कोड को बेहतर बनाने में लगा सकता है.

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वैसे डेडलाइन करने के फ़ायदे क्या हैं, यह मियाद तय करने वाले को मालूम होता है. इस फ़ायदे के लिए ही वह कम वक़्त में काम ख़त्म करना चाहता है. इसका मतलब ये है कि वक़्त आपके कंट्रोल में होता है. उसका आप मनमर्ज़ी से इस्तेमाल कर सकते हैं.

तो, सोच क्या रहे हैं? शुरू कीजिए वक़्त को क़ाबू करने की कोशिश.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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