अफ़ग़ान तालिबान में सिमटती मतभेदों की खाई

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Image caption मुल्ला अख़्तर मुहम्मद मंसूर

अफ़गान तालिबान के पूर्व नेता मुल्ला उमर के दो रिश्तेदारों को चरमपंथी गुट में ऊंचे पद दिए गए हैं. तो क्या यह नए और पुराने नेतृत्व के बीच आई दरार के ख़त्म होने का संकेत है?

अफ़गान तालिबान में शक्ति के समीकरण फिर बदल रहे हैं.

तालिबान के एक बयान के मुताबिक़ मुल्ला उमर के सबसे बड़े बेटे मुल्ला मोहम्मद याक़ूब को अफ़गानिस्तान के कुल 34 प्रांतों में से 15 प्रांतों में सैन्य आयोग का प्रमुख बनाया गया है. यह आयोग तालिबान के नौ आयोगों में से सबसे प्रमुख है और युद्ध मंत्रालय की तरह काम करता है.

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मुल्ला मोहम्मद याक़ूब के चाचा और मुल्ला उमर के भाई मुल्ला अब्दुल मनन को उपदेश और मार्गदर्शक आयोग का प्रमुख बनाया गया है. यह आयोग नए लोगों की भर्ती, उनका मार्गदर्शन, किसी के साथ जुड़ने या किसी से अलग होने से जुड़े मामलों को देखता है.

इन दोनों को फ़ैसले लेने वाली ताक़तवर 'नेतृत्व परिषद' में भी जगह दी गई, जिसमें 20 सदस्य शामिल होते हैं.

हालांकि उन लोगों के पास आधिकारिक तौर पर सैन्य या राजनीतिक शक्ति नहीं है. लेकिन उनका समर्थन सांकेतिक रूप से महत्वपूर्ण है और यह तालिबान के नए नेता मुल्ला अख़्तर मुहम्मद मंसूर की वैधता को मज़बूत करता है.

मुल्ला याक़ूब और मुल्ला मनन, दोनों ने तालिबान के नए नेता के रूप में जुलाई 2015 में मुल्ला अख़्तर मुहम्मद मंसूर का विरोध किया था. मुल्ला अख़्तर मुहम्मद मंसूर 2015 में उस वक़्त तालिबान के नेता बने थे, जब यह ख़बर आई थी कि दो साल पहले ही तालिबान के नेता मुल्ला उमर की मौत हो चुकी थी.

कहा जाता है कि मुल्ला याक़ूब की उम्र 27 साल के क़रीब है, रिपोर्टों के मुताबिक़ दो साल पहले उन्होंने पाकिस्तान के कराची के एक धार्मिक मदरसे से स्तानक की शिक्षा पाई है.

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Image caption तालिबान के कुछ नेता अब भी मुल्ला मंसूर का नेतृत्व नहीं स्वीकार कर रहे हैं.

तालिबान के भीतर मुल्ला उमर के परिवार के कुछ समर्थक नेताओं ने मुल्ला मंसूर की नियुक्ति का विरोध किया था. वो चाहते थे कि मुल्ला याक़ूब को उनके पिता की मौत के बाद सर्वोच्च नेता बनाया जाए.

लेकिन कुछ हफ़्तों की सौदेबाज़ी और बातचीत के बाद दोनों लोगों ने बयान जारी कर मुल्ला मंसूर को नेता के रूप में स्वीकार कर लिया.

अब तक तालिबान के शक्ति संघर्ष में तटस्थ रहे गुट के एक ताकतवर नेता मुल्ला अब्दुल क़य्यूम ज़ाकिर ने भी नए नेता का समर्थन कर दिया है.

30 मार्च को तालिबान ने मीडिया को मुल्ला ज़ाकिर के हस्ताक्षर वाला एक ई-मेल भेजा और इसे अपनी वेबसाइट पर भी जारी किया.

इस चिट्ठी में मुल्ला ज़ाकिर ने कहा कि उनका पहले का रुख़ बदल गया है और अब वो मुल्ला अख़्तर मंसूर को समर्थन देते हैं.

इसी घटना के बाद मुल्ला उमर के दोनों रिश्तेदारों ने नए नेता को अपना समर्थन दिया. इससे पहले मुल्ला मंसूर गुप्त रूप से मुल्ला उमर के नाम से दो साल भी ज़्यादा समय से इस गुट का नेतृत्व कर रहे थे.

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गुआंतानामो के जेल से रिहाई के बाद मुल्ला ज़ाकिर तालिबान के सैन्य आयोग के प्रमुख भी रह चुके हैं और वो तालिबान के सबसे ताक़वर सैन्य कमांडरों में से एक हैं.

तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के कुछ बहुत क़रीबी रिश्तेदारों की अहम पदों पर नियुक्ति और नए नेता के प्रति मुल्ला क़य्यूम ज़ाकिर जैसे ताक़वर कमांडरों की वफादारी के एलान से लगता है कि तालिबान के भीतर मतभेदों की खाई ख़त्म हो गई है और इससे मुल्ला मंसूर की स्थिति मजबूत हुई है.

लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इससे मुल्ला मंसूर की सारी मुश्क़िलें ख़त्म हो गई हैं.

अब भी एक विद्रोही खेमा बचा है जो मुख्य गुट से लड़कर काफ़ी कमज़ोर हो चुका है, लेकिन वह आज भी सक्रिय है और अख़्तर मंसूर गुट के ख़िलाफ़ खड़ा है.

इन दोनों गुटों के बीच संघर्ष कभी कभार ही रुकता है. इस गुट को नवंबर 2015 में मुल्ला मुहम्मद रसूल ने बनाया था.

मुल्ला मंसूर को अब भी कुछ बड़े तालिबान नेताओं का दिल जीतना है, जो अब तक खुलकर उनके पक्ष में नहीं आए हैं.

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इस्लामिक स्टेट, अफ़गान सरकार और उसके विदेशी सहयोगियों से अलग अलग मोर्चों पर लड़ने के बावजूद तालिबान का मुख्य धड़ा एक बार फिर से अफ़ग़ानिस्तान में उठ खड़ा हुआ है.

अफ़ग़ानिस्तान में इन नई गतिविधियों का समय बहुत महत्वपूर्ण है.

इसी महीने के अंत तक तालिबान नए सिरे से अपनी कार्रवाइयों का ऐलान कर सकता है.

क़रीब तीन सप्ताह पहले मुल्ला अख़्तर मंसूर ने अपने समर्थकों से कहा था कि 'अंतिम चोट' देने के लिए तैयार हो जाओ. उन्होंने आने वाले महीनों में अच्छी जीत की उम्मीद जताई थी.

इस गुट में ख़ास लोगों के लौटने और गुट के भीतर व्यापक एकता होने से, इसका असर संभावित शांति वार्ता पर भी पड़ेगा और अगर भविष्य में कोई संधि होती है तो उसे लागू कर पाना भी आसान होगा.

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हालांकि अब तक तालिबान ने अफ़गान सरकार से सीधी वार्ता को ठुकराया हुआ है. उसने बातचीत के लिए विदेशी सेना को हटाने, प्रतिबंधित सूची से अपने नेताओं का नाम हटाने और बंदी तालिबान नेताओं को छोड़ने जैसी कई शर्तें लगा रखी हैं.

लड़ाई और बातचीत या बात के लिए बात करना, ये सिलसिला अफ़गानिस्तान में आने वाले एक साल में जारी रह सकता है.

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