हर मुश्किल का जवाब हैं ये तीन सवाल

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ज़िंदगी में हम कई तरह की मुसीबतों से दो-चार होते हैं. हर एक का हल अलग तरह से निकलता है. कुछ मुसीबतें सीधी-सादी होती हैं, तो कुछ पेचीदा. वैसे अक्सर होता ये है कि हम अपनी मुश्किलों को ख़ुद ही पेचीदा बना लेते हैं.

तो क्यों न ऐसा नुस्ख़े तलाशे जाएं, जो पेचीदा से पेचीदा मसलों को चुटकियों में हल कर दें. ऐसे तीन सवाल हैं जिनके जवाब तलाशने पर आपको हर मुश्किल का तोड़ मिल जाएगा.

ये आपकी निजी ज़िंदगी से लेकर प्रोफ़ेशनल लाइफ़ और कारोबार तक, हर जगह लागू होते हैं. आप कहेंगे कि बात को कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है. अगर आपको ऐसा लगता है तो आप ख़ुद आज़मा कर देख लीजिए. ये तीन सवाल और इनके जवाब आपको हर मुश्किल से निजात दिला सकते हैं.

पहला सवाल ये है कि क्या आप वाक़ई बदलाव चाहते हैं?

कुछ भी नहीं बदल सकता, अगर आप दिल से उसे बदलना नहीं चाहते. अगर आपके मन में बदलाव की मज़बूत ख़्वाहिश नहीं है तो बाक़ी तो सिर्फ़ बातें हैं. बहुत सी कंपनियां बदलाव की बात करती हैं. मगर, दिल से उनमें बदलाव की ख़्वाहिश नहीं होती. इस वजह से बदलाव आ नहीं पाता. जैसे बहुत सी टैक्सी कंपनियां, ग्राहकों को सस्ते में सेवा देने की सोचती हैं. मगर दे नहीं पातीं. उनके मुक़ाबले में उतरी ऊबर जैसी कंपनियां, इसी वजह से कामयाब होती हैं.

अब अपने दफ़्तर का ही मामला लीजिए. आप अपने किसी साथी से परेशान हैं. वो आपसे सहयोग नहीं करता. आपको पता है कि वो हमेशा ऐसा करता रहेगा. मगर, क्या आप उसके ख़िलाफ़ एक्शन लेने को तैयार हैं. उसे दूसरे विभाग में भेजने का या फिर नौकरी से निकालने का मन बना चुके हैं. जब तक आप ख़ुद ये फ़ैसला नहीं ले लेते, वो आपको परेशान ही करता रहेगा. फिर आपका उसकी शिकायत करना भी ग़ैरवाजिब है.

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बदलाव की बात करने वाली कंपनियों के साथ भी ऐसा ही होता है. फ़ेसबुक को ही लीजिए. कंपनी ने सोचा कि वो कंप्यूटर से मोबाइल पर ज़्यादा ज़ोर देगी. आज फ़ेसबुक की अस्सी फ़ीसद कमाई मोबाइल से होती है. कंपनियों के बदलाव न करने की कई वजहें होती हैं. मगर इनमें सबसे बड़ी वजह होती है बदलाव के लिए ईमानदारी से तैयार न होने की.

आप अपनी सेहत का ही मामला ले लीजिए. हम अक्सर ख़ुद की व्यस्तता का हवाला देकर, अपनी सेहत के बारे में ख़ुद को भरोसा देकर, या इरादे टालकर जिम नहीं जाते. खान-पान में बदलाव नहीं करते. सचाई ये है कि हम सेहत पर ध्यान सिर्फ़ इसीलिए नहीं दे पाते क्योंकि हम इस बारे में ईमानदार नहीं होते.

चाहे कोई इंसान हो या कंपनी, सब अपने हालात बेहतर कर सकते हैं अगर हम ये ठान लें कि हमें बेहतरी के लिए बदलाव करना ही है. ख़ुद से ही हां करना, बदलाव की पहली शर्त है.

क्या आप हालात बदलने के लिए बेहतर रणनीति सोच सकते हैं?

अगर आप बदलाव के लिए राज़ी भी हैं तो इसके लिए आपके दिमाग़ में कोई फॉर्मूला होना चाहिए. जिसकी मदद से आप कामयाब होंगे. कई मामलों में ये बेहद आसान होता है. जैसे अच्छी सेहत के लिए खान-पान में बदलाव और वर्ज़िश की ज़रूरत है. सबको पता है. आपको भी मालूम है. बस अमल करने की देर है.

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हां, कंपनियों के लिए अपनी सेहत में बदलाव ज़रा मुश्किल है. कंपनियां बाहर से सलाहकार लाकर, या, अपने कर्मचारियों से ही आइडिया लेकर बदल सकती हैं. कई मामलों में ये मुमकिन होता है. कई बार नहीं भी होता. जैसे ऑनलाइन मनोरंजन कंपनी नेटफ्लिक्स और उससे पहले की मनोरंजन कंपनी ब्लॉकबस्टर का मामला.

जैसे जैसे ऑनलाइन मनोरंजन के कारोबार में तेज़ी आई नेटफ्लिक्स ने ब्लॉकबस्टर के बाज़ार में सेंध लगा दी. ब्लॉकबस्टर ने इस चुनौती से निपटने के लिए पहले नेटफ्लिक्स को ख़रीदने की सोची. फिर अपनी ही एक दूसरी कंपनी से नेटफ्लिक्स की चुनौती का सामना करने की सोची. मगर रणनीति बनाने और अमल में हेर-फेर से ब्लॉकबस्टर का पूरा प्लान चौपट हो गया. जब तक दूसरी रणनीति बनती, ब्लॉकबस्टर बर्बाद हो चुकी थी.

तो किसी भी चुनौती से निपटने के लिए आपके पास ठोस रणनीति होनी चाहिए. हर नुस्ख़े को खुले दिल से मानने से भी कई बार, कामयाबी का फॉर्मूला निकल आता है.

क्या आप अपनी रणनीति पर अमल कर सकते हैं?

किसी भी मसले का हल खोजने में इस सवाल का जवाब होना सबसे ज़रूरी है. आपका इरादा कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपकी रणनीति कितनी भी शानदार न हो, कामयाबी उसके अमल पर ही टिकी होती है. ब्लॉकबस्टर की ही मिसाल लीजिए. कंपनी के पास नेटफ्लिक्स की चुनौती से निपटने का इरादा था. अच्छी रणनीति भी थी. मगर वो इसे कामयाबी से लागू भी नहीं कर पाए.

इसी तरह मुसीबत का सबब बन चुके किसी सहयोगी से निपटने का मामला है. उस साथी के ख़िलाफ़ क्या एक्शन लेना है, ये आपको पता होगा. मगर, आख़िर में बात अमल की आती है. क्या आप उसके ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई कर सकते हैं? उसे किसी और विभाग में भेजेंगे या फिर नौकरी से निकालेंगे. फॉर्मूला कोई भी हो, अमल आपको ही करना है. नौकरी से निकालने के लिए उसके ख़िलाफ़ ठोस सबूत जुटाने होंगे. ये लंबी प्रक्रिया है. मुश्किल काम है. आपसे हो पाएगा या नहीं, ये आपको ही तय करना है.

यहां तक कि जिम जाने का मामला भी ऐसा ही है. खान-पान में बदलाव के फ़ैसले पर अमल करना भी इतना आसान नहीं होता. आपको पसंदीदा मीठी या तली-भुनी चीज़ें छोड़नी होंगी. क्या आप ऐसा कर पाएंगे? क्या आप रोज़ जिम जाने के लिए नींद से समझौता कर सकेंगे? अगर आप ऐसा कर सकेंगे तभी आप अच्छी सेहत हासिल कर सकते हैं. वरना, ये एक अधूरा ख़्वाब ही रहने वाला है, हमेशा.

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इन तीन सवालों के जवाब तलाशना आसान काम नहीं है. फिर उन पर अमल और भी मुश्किल. आपका इरादा मज़बूत होना चाहिए. लगातार कोशिश करने का माद्दा होना चाहिए. ताकि अगर किसी मुश्किल का हल है तो उस पर कामयाबी से अमल हो सके.

लेकिन, ये तीन सवाल और इनके जवाब आपको हर मुश्किल का हल दे सकते हैं. फिर चाहे आपकी निजी ज़िंदगी का मसला हो, किसी एक इंसान की दिक़्क़तें हों या किसी कंपनी की चुनौतियां.

आप इनके बारे में सचाई से सोचेंगे तो हर मसले का हल मिलेगा. सोच के देखिए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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