डाक्टरी पढ़ने क्यों जाते हैं यूक्रेन?

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यूक्रेन भले गृहयुद्ध से ग्रस्त रहा हो लेकिन वहाँ मौजूद अंशाति किसी भी तरह डॉक्टर बनने का सपना पाले भारतीय युवाओं को नहीं रोक पा रहा है.

10 अप्रैल को प्रणव शांडिल्य और अंकुर सिंह की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी, जबकि एक तीसरा छात्र इंदरजीत अस्पताल में है. रिपोर्टों के अनुसार अभियुक्तों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है.

उज़ओरोड कॉलेज में पढ़ने वाले मुकेश (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी को फ़ोन पर कहा कि , “सरकारी हॉस्टल ना होने का कारण हम यहां निजी फ़्लैट्स में रहते हैं. मुझे भी इस तरह की घटनाओं से डर लगता है.”

मुकेश ने इंदरजीत से अस्पताल में मुलाकात की है और "उनकी हालत ठीक है और वो बातचीत कर रहे हैं".

कॉलेज में पढ़ाई के स्तर से संतुष्ट मुकेश बताते हैं, “घर वालों और हमारा सपना डॉक्टर बनने का था. घर से इतनी दूर बैठना अच्छा नहीं लगता. खुद खाना बनाना पड़ता है. खुद सारे काम करने पड़ते हैं. कोई ध्यान रखने वाला नहीं होता. हम यहां इसलिए हैं कि घरवालों के सपने पूरे हो जाएं.”

पर सवाल ये उठता है कि इन बच्चों और इनके घरवालों का सपना पूरा होता है?

ज़ाहिर है भारत जैसे देश में आज भी डॉक्टरी की डिग्री अच्छे रोज़गार की गारंटी मानी जाती हैं. भारत में 58,000 मेडिकल सीटों के लिए 10 लाख बच्चे इम्तिहान देते हैं. इतने जानलेवा कॉम्पिटिशन से छूटे बच्चों को निजी मेडिकल में पढ़ना ही बेहतर ही लगता है.

ऐसे में सवाल आता है पैसे का.

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ऑल इंडिया फ़ॉरेन मेडिकल ग्रैजुएट एसोसिएशन के नज़रुल अमीन के मुताबिक भारत में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस पढ़ना लगभग एक करोड़ तक का पड़ सकता है. वहीं अमरीका में पढ़ने के लिए साढ़े सात से आठ करोड़ रूपए तक का ख़र्च हो सकता है.

ऑस्ट्रेलिया में यह ख़र्च चार करोड़ के लगभग आता है. नब्बे के दशक में खुद रूस में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले अमीन के अनुसार रूस, यूक्रेन, नेपाल, चीन, फ़िलीप्लींस या बांग्लादेश में पढ़ाई करने का ख़र्च करीब एक चौथाई है.

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पर इन मुल्कों से डिग्री हासिल करने का मतलब यह नहीं की आप भारत लौट कर सीधे दवा का पर्चा लिखने लगेंगे. विदेश से एमबीबीएस करने वालों को डिग्री के बाद भारत के अस्पतालों में साल भर की इंटर्नशिप करनी होती है.

उसके बाद उन्हें फ़ॉरेन मेडिकल ग्रैजुएट्स इक्ज़ामिनेशन (एफ़एमजीए) नाम की एक अलग परीक्षा देनी होती है. ये परीक्षा बेहद कठिन होती है और बच्चों को कोचिंग लेना पड़ता है.

ऑल इंडिया फ़ॉरेन मेडिकल ग्रैजुएट एसोसिएशन के मुताबिक हर साल 12,000 से 15,000 भारतीय छात्र डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं. इसमें से लगभग 75 फ़ीसदी फेल हो जाते हैं.

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29 साल के डॉक्टर यावत रघुराम नायक ने यूक्रेन में 2012 में छह साल की अपनी पढ़ाई खत्म की और तबसे वो सात बार एफ़एमजीए परीक्षा में असफ़ल हो चुके हैं.

वो कहते हैं, “हमारे पास कोई काम नहीं है. अगर हम काम करें तो 10,000, 15,000 से ज़्यादा पैसा नहीं मिलेगा. हमारे ऊपर मां-बाप का दबाव है. हम डिप्रेशन में हैं. दोस्त पूछते हैं तुम कब पास होगे. हम कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रह गए हैं.”

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