अब आसमान से की जा रही है जासूसी

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आपने तमाम जासूसी उपन्साय और कहानियां पढ़ी होंगी. जासूसी फ़िल्में भी देखी होंगी. जासूस करमचंद और जेम्स बॉन्ड की फ़िल्में और सीरियल्स भी देखे होंगे.

पर बात अब इंसानी जासूसों से भी आगे निकल गई है. अब आप पर आसमान से निगरानी रखी जा रही है. ये नए जासूस पल-पल की ख़बर रखते हैं, हर हरकत की तस्वीर लेते हैं. अब तो बाक़ायदा स्पेस डिटेक्टिव की कंपनी खुल गई है.

अंतरिक्ष से जासूसी करने वाली पहली कंपनी ब्रिटेन में खुली है . इसका नाम है 'एयर एंड स्पेस एविडेंस'. इसे रेमंड हैरिस और रेमंड पर्डी नाम के दो लोगों ने मिलकर खोला है. इनकी कंपनी, अंतरिक्ष से सैटेलाइट के ज़रिए जासूसी करती है. इन जासूसी उपग्रहों की मदद से जुटाए गए सबूतों का इस्तेमाल, लोग निजी ज़िंदगी के मसले सुलझाने के लिए भी करते हैं और सरकारें भी तमाम मुद्दों पर इनकी सेवाएं ले रही हैं.

रे हैरिस और रे पर्डी का मक़सद, ज़मीन के विवाद में, चोरी किए गए वाहन खोजने में और ग़ैरक़ानूनी ढंग से कचरा फेंकने वालों को पकड़ने में लोगों की मदद करना है.

रे पर्डी, अंतरिक्ष मामलों के वकील हैं. वहीं रे हैरिस, भूगोल के जानकार. हैरिस ने अंतरिक्ष से तस्वीरें लेने की, इसकी तकनीक की पढ़ाई की है. दोनों ने अक्तूबर 2014 में अपनी कंपनी 'एयर ऐंड स्पेस एविडेंस' की शुरुआत की थी. हालांकि पर्डी अब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में काम करते हैं.

दोनों को सैटेलाइट से तस्वीरें लेने की तकनीक की अच्छी जानकारी है. उन्हें इसके क़ानूनी फ़ायदों के बारे में भी पता है. आज, आसमान से धरती पर तीस सेंटीमीटर तक छोटे सामान या जगह की फोटो ली जा सकती है. इसका कई कामों में इस्तेमाल हो सकता है.

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मगर, जब दोनों ने कंपनी खोली तो महीनों तक उनके दफ़्तर के फ़ोन बजने बंद नहीं हुए. कभी ग्राहकों के फ़ोन तो कभी अख़बारों, टीवी कंपनियों, न्यूज़ चैनल और पत्रिकाओं के ख़बरचियों की फोन कॉल. सबके सब उन पर अपने चैनल या अख़बार या पत्रिका पर स्टोरी करना चाहते थे. रेमंड पर्डी बताते हैं कि सिलसिला अभी थमा नहीं है.

हालांकि उनके काम के बारे में लोगों को तमाम ग़लतफ़हमियां भी हैं. किसी को लगता है कि आसमान से धरती के तमाम हिस्सों का लगातार वीडियो बनाया जा रहा है. इसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. रेमंड हैरिस और पर्डी काफ़ी दिनों तक तो लोगों को अपना काम ही समझाते रहे थे.

वो बताते हैं कि ग्राहकों की अजीबो-ग़रीब मांग होती थी. जैसे एक महिला चाहती थी कि रोज़ उसका पीछा करने वाले इंसान का पता लगाया जाए. ये कंपनी के लिए मुमकिन नहीं था. एक और महिला ये पता लगाना चाहती थी कि उसकी कार के टायर कौन पंक्चर करता है. कुछ लोग चोरी में इस्तेमाल गाड़ियों का पता लगाना चाहते थे. किसी को गाड़ियों की नंबर प्लेट में ख़ास दिलचस्पी थी. कुछ लोगों को ये लगता था कि आसमान में तैर रहे सैटेलाइट, धरती पर हो रही घटनाओं की वीडियो बनाते हैं. असल में ये सब तकनीक की सही समझ न होने की वजह से पैदा हुई ग़लतफ़हमी है

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आज कुछ सैटेलाइट, अंतरिक्ष से धरती के वीडियो बनाते ज़रूर हैं. मगर इनकी क्वालिटी बहुत ख़राब होती है. इनके मुक़ाबले स्टिल फ़ोटो बहुत उम्दा होती हैं. गूगल का सैटेलाइट सिस्टम, 'टेरा बेला', वीडियो बनाने वाले उपग्रह जुटा रहा है. जो किसी ख़ास जगह का डेढ़ मिनट का वीडियो बनाएगा, इससे पहले कि वो सैटेलाइट की ज़द से दूर हो जाए. गूगल का इरादा ऐसे 24 उपग्रह अंतरिक्ष में तैनात करना है. जिससे धरती के काफ़ी बड़े हिस्से को कवर किया जा सकेगा.

हैरिस और पर्डी ने शुरुआत में जो केस हल किए, उनमें से एक अमरीका के कैलीफ़ोर्निया का था. दो पड़ोसी आपस में झगड़ रहे थे. एक का कहना था कि दूसरे वाले के घर के बीच से होकर रास्ता जाता था. बात पुरानी हो चुकी थी. किसी के पास सबूत नहीं था. फिर मामला एयर एंड स्पेस एविडेंस के पास आया. उन्होंने अंतरिक्ष से ली गई पुरानी तस्वीरों के हवाले से बताया कि ऐसा कोई रास्ता पहले नहीं था. और इस तरह ये विवाद सुलझा.

अंतरिक्ष से सैटेलाइट के ज़रिए ली गई तस्वीरों का डेटा 1970 के दशक से ही संजोया जा रहा है. शुरुआत में तो अच्छी तस्वीरें नहीं मिलती थीं. मगर 90 के दशक से तकनीक में सुधार ने इस क्षेत्र में इंक़लाब ला दिया है. आज तीस सेंटीमीटर तक छोटे हिस्से की फोटो उपग्रह से ली जा सकती है.

रेमंड पर्डी कहते हैं कि अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों में, उसका समय सबसे अहम है. क़ानून के जानकार पर्डी कहते हैं कि उन्हें अदालतों को यक़ीन दिलाना पड़ता है कि वो इन सबूतों पर भरोसा कर सकते हैं.

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सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल सीमा विवाद सुलझाने में हो रहा है. हालांकि, हैरिस और पर्डी की कंपनी हमेशा ख़ुद के सही होने का दावा नहीं करती. क्योंकि उपग्रह जब धरती की तस्वीरें ले रहे होते हैं, तो कई बार बादल, तो कई बार धुएं, साए या झाड़ियों की वजह से एकदम सही तस्वीर नहीं आ पाती.

ऐसा ही एक केस जो एयर एंड स्पेस एविडेंस के पास आया, वो था यूरोप की एक झील से रेत निकालने का था. इस झील मे ऐसा करने पर पाबंदी थी. मगर, बरसों से ये काम चोरी-छुपे हो रहा था. सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों से ये चोरी पकड़ी गई. सबूत साफ़ गवाही दे रहे थे कि झील से मिट्टी निकालकर इसके किनारे पाटे जा रहे थे. इसका दायरा सिमट गया था.

रडार वाले सैटेलाइट की मदद से ये पता लगाया जा सकता है कि चोरी हुए सामान कहां ले जाए गए, छुपाए गए. कोई अपनी ज़मीन से बाहर जाकर मकान का दायरा बढ़ाता है तो उसे भी फ़ौरन पकड़ा जा सकता है.

वहीं जीपीएस सिस्टम वाले सैटेलाइट, किसी ख़ास इलाक़े से गुज़रने वाले जहाज़ से लेकर कार या इंसान तक के बारे में जानकारी दे सकते हैं. अगर कोई जहाज़ समंदर में किसी पवनचक्की को टक्कर मारता है, तो वो घटना भले तस्वीरों में क़ैद न हो. लेकिन, सैटेलाइट ये ज़रूर बता देंगे कि कौन सा जहाज़ उस वक़्त उस इलाक़े में था. यानी ज़िम्मेदार जहाज़ पकड़ा जाएगा.

अंतरिक्ष के जासूसों की मदद से पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने वालों को पकड़ने में काफ़ी मदद मिल सकती है.

जैसे आयरलैंड में एक जंगल को कब काटा गया, इसका पता सैटेलाइट की मदद से लगाया गया. ताकि आरोपियों को सज़ा दी जा सके.

इसी तरह कचरा भरने के ग़ैरक़ानूनी ठिकानों का भी सैटेलाइट की मदद से पता लगाया जा सकता है. अभी हाल ही में हैरिस और पर्डी ने आयरलैंड में एक ऐसे ही ठिकाने को ढूंढ निकाला. जहां पंद्रह लाख टन कचरा जमा हो चुका था, बिना इजाज़त. इसके लिए कोई टैक्स नहीं भरा जा रहा था.

अब तमाम पुलिस संगठन, नई तकनीक की मदद से, ऐसे अपराधियों पर शिकंजा कसने की कोशिश कर रहे हैं. जैसे इंटरपोल और यूरोपोल. अंतरिक्ष के जासूसों की मदद से पुलिस को ज़मीन में ताज़ा ताज़ा छुपाई गई लाश के बारे में भी जानकारी मिल सकती है. अब चुनौती ये है कि तस्वीरें इतनी साफ़ हों कि अदालत उन्हें सबूत माने.

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ज़रूरत के हिसाब से तकनीक में भी सुधार होगा ये तय है. आगे चलकर अंतरिक्ष ये ये ख़ुफ़िया एजेंट, वीडियो में भी सबूत जुटाएंगे. चीन और भारत जैसे देश बड़ी तेज़ी से सस्ती अंतरिक्ष तकनीक विकसित कर रहे हैं. जिससे स्पेस डिटेक्टिव्स की मांग और बढ़नी तय है. इसके अलावा गूगल और प्लैनेट लैब्स जैसी कंपनियां भी अपने सैटेलाइट भेज रही हैं. जिनकी मदद से साफ़ तस्वीरें ली जा सकती हैं. वीडियो भी बनाए जा रहे हैं.

वैसे, अंतरिक्ष से जासूसी के फ़ायदे ही नहीं नुक़सान को लेकर भी फ़िक्र हो रही है. लंदन में इन मामलों के जानकार रिचर्ड टायनन कहते हैं इससे लोगों की निजी ज़िंदगी में घुसपैठ बढ़ रही है. हर पल निगरानी करके वो हमारी प्राइवेट लाइफ़ में घुस आए हैं. लंदन की अंतरिक्ष मामलों की वक़ील जोआन व्हीलर भी ये चिंता ज़ाहिर करती हैं.

दोनों ही ये सलाह देते हैं कि सैटेलाइट से ख़ुफ़ियागीरी का चलन बढ़े उससे पहले इसके नियम क़ायदे तय हो जाने चाहिए. वरना आगे चलकर लोगों की निजी ज़िंदगी तबाह हो सकती है.

वैसे यूरोपियन कमीशन, इस बारे में नियम बनाने में जुटा हुआ है. हालांकि फिलहाल उसका विरोध हो रहा है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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