नौकरी में ख़तरे का अलग अलाउंस मिलता है जहां

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आपने कभी मुसीबत भत्ता का नाम सुना है? नहीं सुना! तो फ़िर ख़तरे की सैलरी या फिर जोखिम की तनख़्वाह के बारे में तो ज़रूर सुना होगा? इनके बारे में भी नहीं सुना? आप कहेंगे ये क्या अजीब सी सैलरी और भत्ते की बातें ले बैठे. कहीं मुसीबत भत्ता देता है भला कोई! हम जवाब में ये कहें कि हां देता है, तो भी आप शायद ही यक़ीन करें.

पूरा माजरा क्या है, चलिए आपको समझाते हैं.

असल में बहुत सी ऐसी नौकरियां होती हैं, ऐसे काम होते हैं, जिनमें जोखिम बहुत होता है. कई तरह की दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है.

ऐसे काम करने वाले को कई बार अपना घर-बार ही नहीं, अपना देश छोड़कर दूसरे मुल्क़ जाना पड़ता है नौकरी करने. ऐसे लोगों को औसत से ज़्यादा सैलरी दी जाती है.

इसे डेंजर पे या ख़तरे की सैलरी या जोखिम की तनख़्वाह कहते हैं. दिक़्क़तों से निपटने के नाम पर कई बार इन्हें मुसीबत या जोखिम के हिसाब से भत्ते मिलते हैं. इसे हार्डशिप अलाउंस या मुसीबत भत्ता नाम दिया जाता है.

बात को और अच्छे से समझने के लिए ब्रिटेन की डेबोराह मंज़ूरी की मिसाल लीजिए. डेबोराह, दिवालिया होने वाली कंपनियों की मदद का कारोबार करती थीं. मगर पिछले साल सितंबर में उन्हें अपना काम छोड़कर पति के साथ भारत आना पड़ा. उनके पति विमान के इंजन बनाने वाले इंजीनियर हैं, उनकी कंपनी ने दो साल के लिए उन्हें भारत भेजा है.

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डेबोराह, जब पति के साथ बेंगलूरु पहुंचीं, तब उन्हें दूसरे देश में, ख़ास तौर से भारत जैसे देश में रहने के जोखिमों का एहसास हुआ. उन्होंने सिर्फ़ अपनी नौकरी या करियर नहीं छोड़ा था. उन्होंने अपनी एक ख़ास लाइफ़स्टाइल को भी अलविदा कहा था.

अब डेबोराह को एकदम नए माहौल से तालमेल बिठाना था. जहां पर ख़ुद से कार चलाना बड़ा रिस्क था. इसके लिए उन्हें ड्राइवर रखना पड़ा.

अब ड्राइवर के भरोसे हो गए तो कभी भी शॉपिंग के लिए जाने की आज़ादी छिन गई. अपनी शॉपिंग को ड्राइवर के हिसाब से प्लान करने की ज़रूरत आन पड़ी.

फिर, बाहर निकलने में भी कई जोखिम थे. भारत में कई बार विदेशियों पर हमले हुए हैं. ख़ास तौर से विदेशी महिलाएं तो अक्सर अपराधियों का शिकार होती हैं.

इस डर से डेबोराह को उस बिंदास ज़िंदगी को छोड़ना पड़ा जो वो ब्रिटेन में जीती आई थीं.

क़रीब सात महीने भारत में गुज़ारने के बाद डेबोराह कुछ हद तक भारत के माहौल से तालमेल बिठाने में कामयाब हो गई हैं. मगर उन्हें यहां का माहौल अभी भी रास नहीं आ रहा.

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डेबोराह जैसे बहुत से विदेशी हैं जो मोटी तनख़्वाह के लालच में अपना देश छोड़कर दूसरे देश आते-जाते हैं काम करने के लिए.

उन्हें और उनके परिवार को डेबोराह जैसी ही चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

कई बार दिक़्क़त शारीरिक होती है, तो कभी मानसिक और कभी पैसे की चुनौती. महिलाओं को ख़ास तौर से दूसरे देश के माहौल से तालमेल बिठाने में दिक़्क़त आती है.

इसके एवज़ में कंपनियां अपने कर्मचारियों को मोटी सैलरी और भत्ते देती हैं. ऐसी सैलरी को ही जोखिम वाली तनख़्वाह या विदेश में नौकरी के भत्ते को ''हार्डशिप अलाउंस'' कहते हैं. हालांकि कंपनियां अक्सर ये नाम देने से बचती हैं क्योंकि इससे नेगेटिव छवि बनती है.

कुछ लोग ये सवाल भी उठाते हैं कि किसी जोखिम के बदले में पैसे देना कहां तक सही है?

पर जानकार कहते हैं कि क़ाबिल लोगों को चुनौतीभरे माहौल में काम करने के लिए राज़ी करने के लिए ये चलन ज़रूरी है. वर्ना, आतंकवादी हमले झेल रहे तुर्की में काम करने कौन जाना चाहेगा. या फिर भयंकर प्रदूषण के शिकार बीजिंग शहर में नौकरी करने में किसकी दिलचस्पी होगी. पैसा ही, क़ाबिल लोगों को ये जोखिम लेने के लिए लुभा सकता है.

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एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ऐसा जोखिम लेने को तैयार होने वाले लोगों को औसत से चालीस फ़ीसद या इससे भी ज़्यादा पैसे मिलते हैं. दो तिहाई कंपनियां तो ऐसे जोखिमभरे माहौल में काम करने वालों की सैलरी को लेकर कोई पाबंदी ही नहीं लगाती हैं. उन्हें तो बस काम होने से मतलब है. भले ही ज़्यादा पैसे ख़र्च हो जाएं.

नब्बे फ़ीसद यूरोपीय कंपनियां, अपने देश से बाहर भेजे जाने वाले कर्मचारियों को मुसीबत भत्ता देने को राज़ी होती हैं. हालांकि दक्षिण अमरीकी देशों की कंपनियों में से आधी ही ऐसा करती हैं.

वैसे हर भत्ते को मुसीबत भत्ता कहना ठीक नहीं. जैसे डेबोराह का ही मामला ले लीजिए. उनके पति की कंपनी ने सुरक्षित रिहाइश की तलाश के लिए भी पैसे दिए. बेटी को इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाने के पैसे दिए. एक ड्राइवर की सैलरी भी दी. ये सब डेबोराह के परिवार का ख़याल रखने के लिए किया गया. ये सभी चीज़ें उनके पति के सैलरी पैकेज का हिस्सा थीं. अब इन सभी को ''डैंजर पे'' नहीं कहा जा सकता. हां, कुछ अलाउंस ज़रूर ज़रूर मुसीबत भत्ते के दर्ज़े में आते हैं.

अपने देश से दूर जाने पर आपको कई सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है. सैलरी पैकेज में मिलने वाली ये सुविधाएं, उसी की भरपाई करती हैं. ये उस देश के माहौल के हिसाब से तय होते हैं, जहां लोगों को काम करना होता है. कहीं बच्चों की पढ़ाई की दिक़्क़त है तो कहीं सुरक्षा का मसला है. कहीं-कहीं पर ख़राब मौसम के बदले में भी पैसे मिलते हैं.

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पश्चिमी देशों की बिंदास लाइफ़ स्टाइल के मुक़ाबले भारत जैसे देश में रहने पर कई बंदिशों में जीना पड़ता है. इसके एवज़ में भी ज़्यादा पैसे दिए जाते हैं.

कुछ कंपनिया हेल्थ इंश्योरेंस के साथ-साथ, आतंकवादी घटनाओं, अपहरण जैसी वारदातों से सुरक्षा के लिए भी बीमा मुहैया कराती हैं. ताकि कर्मचारी ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सके. आराम से, बेफ़िक्र होकर काम कर सकें. कई बार चोरी जैसे छोटे मोटे अपराधों से बचाव का भी बीमा, कंपनियां देती हैं.

एचआर सलाहकार कंपनी मर्सर में काम करने वाले स्लैगिन पाराकतिल कहते हैं कि देश और परिवेश के हिसाब से भत्ते और बीमा की सुविधाएं बदलती रहती हैं. मसलन, ब्राज़ील में काम करने वाले विदेशियों को ये सुविधा दी जा सकती है कि उनकी गर्भवती पत्नियों को सुरक्षित उनके वतन वापस भेजा जा सके. क्योंकि वहां ज़ीका वायरस से गर्भवती महिलाओं को ख़तरा है. इसी तरह पश्चिमी अफ्रीका में काम करने वालों को इबोला वायरस की मुसीबत के बदले में पैसे दिए जाते हैं.

ख़राब माहौल में काम करने वालों को सिर्फ़ बीमा, कार ड्राइवर या बच्चों की पढ़ाई के लिए अलग से पैसे जैसी सुविधाएं नहीं मिलती. मुश्किल हालात में काम करने वालों को कई बार घूमने फिरने के पैकेज भी कंपनियां देती हैं, ताकि वो बुरे हालात में काम करने के तनाव से निपट सकें. परिवार के साथ कुछ वक़्त बिता सकें. अंगोला, अल्जीरिया, पाकिस्तान, इराक़ और नाइजीरिया में काम करने वाले विदेशियों को ख़ास तौर से ऐसे टूर पैकेज दिए जाते हैं.

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कोका कोला तो चीन में काम करने वाले अमरीकी और यूरोपीय कर्मचारियों को पर्यावरण से होने वाले जोखिम का भत्ता देती है. क्योंकि बीजिंग और दूसरे चीनी शहरों में कंपनी के कर्मचारियों को बेहद ख़राब, प्रदूषित माहौल में काम करना पड़ता है. कोका कोला की एक अधिकारी के मुताबिक़ ये पर्यावरण भत्ता किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी का पंद्रह फ़ीसद तक हो सकता है.

इसी तरह जापानी कंपनी पैनासोनिक ने चीन में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए लाइफ़स्टाइल में फ़र्क के बदले भत्ता देती है. पैनासोनिक के चीन में 70 हज़ार कर्मचारी हैं. कंपनी के पैकेज में प्रदूषण भत्ता भी शामिल है.

चीन में कारोबार कर रही कई कंपनियों ने तो अपने विदेशी कर्मचारियों को एक साल की तनख़्वाह ज़्यादा दी. वहीं कुछ ने ये स्कीम कुछ महीनों के लिए ही चलाई. सैलरी बढ़ाने के अलावा कुछ कंपनियों ने कर्मचारियों को उनके घर में प्रदूषण रोकने की सुविधाओं के इंतज़ाम के लिए भी पैसे दिए. जैसे वाटर प्यूरीफ़ायर. हालांकि चीन सरकार की नाराज़गी से बचने के लिए अक्सर कंपनियों ने ये काम छुपाकर किए.

आजकल चीन में भयंकर प्रदूषण की वजह से विदेशी कर्मचारी वहां नहीं जाना चाहते. ऐसे में क़ाबिल लोगों को चीन में काम करने के लिए राज़ी करने के लिए कंपनियों को ये सुविधाएं देनी पड़ रही हैं.

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वैसे जोखिमभरे माहौल में काम के बदले में ज़्यादा पैसे और सुविधाएं देने के इस चलन पर सवाल उठ रहे हैं. ये मामले क़ानूनी पचड़ों में भी पड़ सकते हैं. क्योंकि ज़्यादा पैसे या फिर मुसीबत भत्ता देकर कंपनियां ये तो मान रही हैं कि वो लोगों से ख़राब माहौल में काम करवा रही हैं. इसके ख़िलाफ़ कोई भी कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है.

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