दुख भरी कहानी में कॉमेडी का तड़का

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अमरीका में इस वक़्त एक सीरियल की बड़ी चर्चा है. सीरियल का नाम है, 'अनब्रेकेबल किमी श्मिट'. सीरियल की मुख्य किरदार है किमी श्मिट, जिसे पंद्रह सालों तक ज़मीन के भीतर एक बंकर में क़ैद रखा जाता है. इस सीरियल का दूसरा सीज़न, नेटफ्लिक्स पर शुरू हुआ है.

पहले ही सीज़न के आख़िर में किमी को क़ैद से निजात मिलते दिखाया गया है. अब दूसरे सीज़न में किमी की आज़ादी की ज़िंदगी दिखाई जा रही है. इस दौरान ऐसी तमाम घटनाएं उसकी ज़िंदगी में घटती हैं. जिस तरह वो बाहरी दुनिया से तालमेल बिठाने की कोशिश करती है. कहानी बेहद संजीदा है. मगर जिस तरह से कुछ घटनाओं को पेश किया गया है, उनसे हंसी भी आती है.

'अनब्रेकेबल किमी श्मिट' ऐसा सीरियल है जिसे अमरीका में सिटकॉम कहा जाता है. सिटकॉम ऐसे धारावाहिक होते हैं. जिसके किरदार बेहद ख़ुशनुमा माहौल में पेश किए जाते हैं. हंसी मज़ाक़ का दौर चलता है. कभी घर के माहौल में तो कभी टैक्सी यूनियन के दफ़्तर पर ऐसे सिटकॉम की कहानी चलती है.

मगर, 'अनब्रेकेबल किमी श्मिट' की कहानी बेहद संजीदा है. तकलीफ़देह है. अपराध की दुनिया से ताल्लुक़ रखती है. ऐसे गंभीर कहानी वाले सीरियल में भी हंसी वाले सीन डालना कोई हंसी-मज़ाक़ नहीं.

वैसे, 'अनब्रेकेबल किमी श्मिट' ऐसा कोई पहला सिटकॉम नहीं है. न ही तकलीफ़ से गुज़रते किरदार को मज़ाक़िया लहजे में पेश करने का ये पहला अमरीकी प्रयोग है. इससे पहले कई सीरियल्स में ऐसे किरदार देखे गए हैं. मसलन, 'स्टेपटो एंड सन' का हैरॉल्ड, 'मैरीड विद चिल्ड्रेन' का एल बंडी, या फिर, ''द फॉल एंड राइज़ ऑफ रेजिनाल्ड पेरिन'' की रेगी.

पश्चिमी देशों में इस तरह के सीरियल्स का चलन पिछली सदी के आख़िरी दशक और इक्कीसवीं सदी में ख़ूब देखने को मिला था. ब्रिटेन में तो ऐसी थीम पर बना एक सीरियल बेहद लोकप्रिय हुआ था.

इसकी शुरुआत बीबीसी2 के सीरियल, 'आई एम एलन पैट्रिज' से हुई थी. जिसमें एक रेडियो जॉकी का जमकर मज़ाक़ बनाया गया था. इसके बाद बीबीसी2 पर ही 'द लीग ऑफ जेंटलमेनन' सीरीज़ आई. इसकी कहानी एक काल्पनिक गांव के किरदारों पर आधारित थी. जहां पर निर्दयी लोग रहते थे. अपराध की दुनिया के इस क़िस्से में मज़ाक़ का तड़का भी ख़ूब लगाया गया था.

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इसी तरह 1999 में बीबीसी1 पर' कैरोलिन अहर्ने', साल 2000 में 'ह्यूमन रिमेंस' और इसी तरह के दूसरे सीरियल भी आए थे. जिसमें संजीदा कहानियों में मज़ाक़ के लिए जगह बनायी गई थी.

ऐसे चलन को 'सैडो-कॉमेडी' नाम दिया गया था. जिसमें दुखभरे क़िस्सों में हंसी को भी बराबरी की जगह दी गई थी.

मगर, 'अनब्रेकेबल किमी श्मिट' इन सबसे अलग है. यहां किमी एक ऐसी लड़की है जो एक दूर के गांव के पास बने होटल के बंकर में बंधक बना कर रखी गई है. जिसका यौन शोषण होता है. जिसके दिमाग़ को फिरा दिया गया है.

यानी वो शैतान से घिरी है. दर्द से छटपटाती है. बेहतर ज़िंदगी की उम्मीद छोड़ चुकी है. उसके सिर पर क़त्ल हो जाने का डर सवार है. कमोबेश ऐसे ही किरदार दूसरे 'सैडो-कॉमेडी' सीरियल्स में देखने को मिले थे.

ऐसे डराने वाले क़िस्से में हंसी के लिए जगह बनाना मामूली काम नहीं.

अमरीका में भी 'द ऑफिस' सीरियल से शुरू होकर आज 'अनब्रेकेबल किमी श्मिट' तक कई तरह के ऐसे प्रयोग किए गए हैं. जैसे द लैरी सैंडर्स शो.

आज हिंदुस्तान में भी कॉमेडी शोज़ का ज़ोर है. कॉमेडी से टीवी को कई नए सितारे मिले हैं. मगर, इस तरह के कई सीरियल्स के बावजूद, अमरीका में ऐसे सिटकॉम की भरमार हो गई हो ऐसा नहीं है.

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अलबत्ता बहुत से डरावनी कहानियों वाले सीरियल्स ने शोहरत और कामयाबी हासिल की है. मसलन 'द लास्ट मैन ऑन अर्थ'. जिसमें समूची धरती की आबादी को एक वायरस से ख़त्म होते दिखाया गया है. मगर इस चुनौती में भी ख़ुद को बेहतर बनाने का एक मौक़ा दिखाने की कोशिश की गई थी.

सीरियल का मुख्य किरदार, ऐसा ही इंसान था जो आम लोगों जैसा ही दिखता था.मगर इंसानियत को बचाने के लिए उसने, देवताओं की बराबरी वाले काम किए.

असल में कॉमेडी मनोरंजन की ऐसी थीम है, जो हमेशा से बेहद लोकप्रिय रही है. हालांकि हर बदलते दौर के साथ इसे पेश करने का तरीक़ा बदल जाता है. पिछले दो तीन दशक से ये नया चलन आया है कि संजीदा कहानियों, डराने वाले, अपराध की दुनिया की कहानी सुनाने वाले सीरियल्स में कॉमेडी की छौंक लगाई जा रही है.

पिछले दो तीन दशक में दुनिया डरावनी सी लगने लगी है. आतंकी हमलों से लेकर दूसरी ख़तरनाक घटनाओं तक.

अब जब ये दौर आया है तो भी लोगों को कॉमेडी तो चाहिए ही. तो अब 'सैडो-कॉमेडी' या 'डार्क कॉमेडी' का चलन बढ़ गया है. जैसे, 'अनब्रेकेबल किमी श्मिट', 'ब्लूस्टोन 42' या 'द लास्ट मैन ऑन अर्थ'.

वैसे भी, अमरीका में देश के सियासी हालात का असर मनोरंजन की दुनिया पर साफ़ दिखता है.

माहौल के मुताबिक़ सिटकॉम या सीरियल बनाए जाने लगते हैं. जैसे वियतनाम युद्ध के दौरान, M*A*S*H* नाम का एक सीरियल बना था. जिसकी कहानी एक मिलिट्री अस्पताल के बैकग्राउंड पर आधारित थी.

इसी तरह, 'होगन्स हीरोज़' नाम के सीरियल की कहानी जर्मन युद्धबंदियों के कैम्प पर आधारित थी. लेकिन दोनों में ही कॉमेडी को काफ़ी अहमियत दी गई थी.

वैसे कई बार ख़ुद को असलियत का एहसास दिलाने के लिए कॉमेडी की ज़रूरत नहीं, तल्ख़ सच्चाई का सामना करने की ज़रूरत होती है.

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