जब बॉस से ही मुक़ाबला हो, तो क्या करें?

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क्या आप तेज़ी से तरक़्क़ी करते हुए अपनी कंपनी में नंबर दो की पोज़ीशन पर पहुंच चुके हैं?

और अब आपको लग रहा है कि इसके आगे का रास्ता आपके लिए बंद है. क्योंकि आपकी अगली मंज़िल वो कुर्सी है, जिस पर आपके बॉस का कब्ज़ा है.

आपकी मुसीबत ये है कि आपका बॉस कहीं और जाने को तैयार नहीं. वो उम्र के उस दौर में है, जब कहीं और जाना उनके लिए बड़ा जोखिम है.

फिर आप क्या करेंगे? अपनी कंपनी में ही बने रहेंगे या, नई नौकरी तलाश करेंगे.

ऐसा नहीं कि यह मुसीबत केवल आप ही झेल रहे हैं, कई और हैं जो इस तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं.

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आम बात है कि बॉस लोगों की तरक़्क़ी की राह में रोड़ा बनकर बैठे होते हैं.

अमरीकी कंपनी, 'बिज़नेस मेंटर्स' के अल स्टीवर्ट अक्सर इन सवालों का सामना करते हैं.

उनकी कंपनी के दफ़्तर अमरीका से लेकर फ़्रांस तक हैं और हर जगह उनसे सलाह लेने वाले ऐसी परेशानी लेकर आते हैं.

लोग कहते हैं कि उनके बॉस उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके होते हैं, जहां उनके लिए नई नौकरी तलाशना मुश्क़िल होता है. इसलिए वो कहीं और जाने का इरादा नहीं रखते.

ऐसे में वो क्या करें, जिनकी आगे बढ़ने की राह, उनके बॉस ने ही रोक रखी हो?

स्टीवर्ट सलाह देते हैं कि ऐसे हालात में दूसरी नौकरी तलाशना ही बेहतर होगा. अगर आप अपनी कंपनी में ही आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे तो आपकी बॉस से तनातनी बढ़ेगी.

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स्टीवर्ट ये भी कहते हैं कि कई बार मौजूदा कंपनी में भी आपके लिए मौक़े होते हैं, लेकिन ज़रूरत उस मौक़े को समझने की होती है.

उनके मुताबिक़ आपने अपनी कंपनी में अच्छा ख़ासा वक़्त गुज़ारा होता है और ऐसे में तरक़्क़ी आपका वाजिब हक़ है.

ऐसा भी हो सकता है कि नौकरी देते वक़्त ही आपका बॉस बोले कि आगे चलकर उसकी कुर्सी पर आप बैठ सकते हैं. ऐसे बॉस आपको आने वाले वक़्त के लिए तैयार करते हैं.

वो आपकी मेंटरिंग करते हैं और उस ओहदे पर काम करने के तरीक़े और सलीक़े बताते हैं, ताकि आप आने वाले वक़्त में उस ज़िम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हो सकें.

सवाल ये है कि क्या आपके बॉस आपको अपने उत्तराधिकारी की तरह देखते हैं और उसी तरह का बर्ताव आपके साथ करते हैं.

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स्टीवर्ट कहते हैं कि अगर आप मौजूदा कंपनी छोड़ते हैं, तो ये ज़रूरी नहीं कि नई कंपनी में ऊंचा ओहदा ही मिले.

उनके अनुसार कंपनियां, बड़ी ज़िम्मेदारी वाले पदों पर बाहर से लोग लाना पसंद नहीं करती हैं.

हालात जो भी हों, आपके पास बैठकर सोचते रहने का विकल्प नहीं होता. इससे पहले की कोई चुनौती आपके सामने आकर खड़ी हो जाए, आपको ऐसे वक़्त के लिए ख़ुद को तैयार कर लेना चाहिए.

अपने करियर के अगले पड़ाव के लिए आपको ख़ुद को तैयार कर लेना चाहिए और पहले से ही अपने प्रोफ़ेशन के लोगों से संपर्क बढ़ाना चाहिए.

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लोगों से नेटवर्किंग करके आप ऐसे लोगों से मेल-जोल बढ़ाते हैं, जो आपसे बेहतर समझ रखते हैं.

दूसरा तरीक़ा यह है कि आपको अपने काम में बेहतरी लाने की कोशिश करनी चाहिए और नई चीज़ें सीखनी चाहिए. इससे आपका ख़ुद का किरदार भी बेहतर होता है और नई क़ाबिलियत सीखेने से आपके लिए नए मौक़े भी खुलेंगे.

अपने करियर के बारे में फ़ैसला करते वक़्त, इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि आप किस हद तक जाने को तैयार हैं.

कुछ लोग अपना असर छोड़ने के लिए बेक़रार होते हैं, वो तेज़ी से आगे बढ़ना चाहते हैं.

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जबकि कुछ लोगों के लिए आगे बढ़ने का मतलब होता है, काम करने की आज़ादी हासिल करना. अपनी रचनात्मकता का बेहतर इस्तेमाल करना और अपने काम से दूसरों पर असर छोड़ना.

अगर आप दूसरे विकल्प को पसंद करते हैं, तो नई नौकरी खोजने के बजाय आपको मौजूदा नौकरी में ही संतुष्टि तलाशनी चाहिए.

हर करियर में उतार-चढ़ाव आता है, आगे बढ़ने की रफ़्तार धीमी होती है. जानकार लोग ऐसे मौक़ों को नौकरी में निवेश का वक़्त कहते हैं.

कई बार कम पैसे वाली नौकरी में आप नई चीज़ें सीख सकते हैं, जो आगे चलकर तरक़्क़ी में आपकी मदद कर सकती है. समझदारी इसी में है कि मुश्क़िल वक़्त में धीरज से काम लेना चाहिए.

आपको कई बार ऐसा लगता होगा कि मौजूदा नौकरी से कहीं और जाने का रास्ता नहीं. आपको हर उम्मीद टूटती नज़र आती होगी. लेकिन ऐसे हालात में भी सौ बार सोच-समझकर ही कोई फ़ैसला लें.

सबसे पहले तो आपको अपने सीनियर से अपने करियर और तरक़्क़ी के बारे में बात करनी चाहिए. आप आगे बढ़कर अपने बॉस से नई ज़िम्मेदारी लेने की बात कर सकते हैं.

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अगर आपकी कंपनी को लगता है कि आप अभी नई ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते, तो इसमें आपके सीनियर आपकी मदद कर सकते हैं.

अगर आपको यही लगता है मौजूदा नौकरी में आपके लिए आगे बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं तो फिर नौकरी बदलना ही बेहतर होगा.

आपके लिए नौकरी में अड़े रहकर, डटे रहकर वक़्त बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है.

गुड़गांव की आकांक्षा मलिक लोगों को नौकरी दिलाने में मदद करती हैं. वो कहती हैं कि नौकरी में डटे रहकर बदलाव की उम्मीद में वक़्त गंवाना ठीक नहीं है.

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कई लोग ऐसा करने में सालों बिता देते हैं, इससे उनके अंदर कुंठा आ जाती है.

वो बैठे-बैठे बस बॉस का इंतज़ार करते रहते हैं और जब ऐसे लोग नौकरी तलाशने निकलते हैं तो नौकरी देने वाला उन पर भरोसा नहीं कर पाता.

नौकरी देने वाले को लगता है कि यह इंसान जोखिम नहीं ले सकता और बिना जोखिम के तरक़्क़ी मुमकिन नहीं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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