भूकंप को एक साल, नेपाल ने क्या सीखा?

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नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप को एक साल पूरा होने पर नेपाली मीडिया ने देश में किसी आपदा से निपटने की तैयारियों पर चिंता जताई है.

इस विनाशकारी भूंकप में करीब नौ हज़ार लोग मारे गए थे.

अख़बारों ने पुनर्निमाण के काम में देरी के लिए सरकार की आलोचना की है क्योंकि लाखों लोग अब भी बेघर बताए जाते हैं.

हिमालयन टाइम्स ने लिखा, "आज जब देश पिछले साल आए भीषण भूकंप में मारे गए 8,961 लोगों को याद कर रहा है वहीं आपदा आने के हालात से निपटने की तैयारी को लेकर लोगों में चिंता बनी हुई है. विनाशकारी भूकंप की हालत में बचाव कार्यों को बेहतर बनाने को लेकर कोई ख़ास कोशिश नहीं की गई है. सरकार की अक्षमता के कारण क्षतिग्रस्त इमारतों को फिर से बनाने का काम जल्दी नहीं शुरू हो पाया."

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कठमांडू पोस्ट ने लिखा है, "एक साल से अस्थाई शिविरों में रहना भूकंप पीड़ितों के लिए मुश्किल होता जा रहा है. बारिश के दिनों में उनके तंबुओं में घुटनों तक पानी भर जाता है क्योंकि पानी के निकलने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. सर्दियों में ठंड से उनकी हड्डियां जम जाती हैं. अगर पुनर्निमाण से जुड़े अधिकारी और सरकार में थोड़ी बहुत भी इंसानियत बची है तो उम्मीद करते हैं कि इन लोगों को अगली बार खुले में ठंड के दिन नहीं बिताने पड़ेंगे."

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हिमालयन टाइम्स ने लिखा, "एक अनुमान के मुताबिक़ चालीस लाख लोग अब भी ख़राब हालात में अस्थाई शिविरों में रह रहे हैं और ये हालात उनके स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बने हुए हैं. भूकंप में आठ लाख लोगों के घर तबाह हो गए थे और अब भी उन्हें घर मुहैया कराना मुख्य मानवीय प्राथमिकता बनी हुई है."

कुछ मीडिया रिपोर्टों का कहना हैं कि भूकंप ने जल की समस्या को और गंभीर बना दिया है. कावरे, सिंधुपाल चौक, दोलाखा, गोरखा, धाडींग, रासुवा और नुवाकोट ज़िलों में पीने के पानी की बहुत किल्लत हो रही है.

भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि भूकंप के कारण ज़मीन खिसकने से कभी-कभी भूजल का स्तर बिगड़ जाता है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के पानी विशेषज्ञ संतोष नेपाल का कहना है, "भूकंप के कारण सूखे के मौसम में पानी की कमी और भी बढ़ गई है."

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एक सर्वे के मुताबिक कावरे ज़िले में भूकंप के कारण 26 में से 10 जल-स्रोत पूरी तरह से सूख चुके हैं.

हालांकि इस बीच भूकंप पीड़ितों को लेकर कुछ राहत की ख़बरें भी हैं.

नेपाल टाइम्स ने बचे हुए लोगों की तस्वीरें "द स्प्रिट ऑफ नेपाल" कैप्शन के साथ छापी है. साथ में उनकी कहानियां भी छापी हैं.

जीत बहादुर गुरुंग लैपरैक का कहना है, "भूकंप ने हमें एकजुटता के साथ-साथ जीवन की अनिश्चितता का भी पाठ पढ़ाया है."

उन्होंने कहा, "इसने मुझे सिखाया कि कैसे एकजुट रहने से जानें बचाई जा सकती हैं और कैसे कोई किसी से ऊपर या नीचे नहीं होता है. कुछ भी निश्चित नहीं है. यह दिन, यह पल कुछ भी नहीं. इसने मुझे सिखाया कि साथ होने का एक मतलब है और अकेले होने का कोई मतलब नहीं."

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