क्यों मारे जा रहे हैं बांग्लादेश में ब्लॉगर

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बांग्लादेश में पिछले कुछ साल में धर्मनिरपेक्ष बातें करने वाले कई ब्लॉगरों और बुद्धिजीवियों की बर्बर तरीक़े से हत्या की गई है, जिनमें स्वतंत्र लेखक, प्रोफ़ेसर और पत्रकार हैं.

राजशाही विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर रेज़ाउल करीम सिद्दीक़ी की 23 अप्रैल को तब हत्या कर दी गई, जब वह विश्वविद्यालय जा रहे थे. दो दिन बाद 25 अप्रैल को ढाका में समलैंगिकों की पहली पत्रिका 'रूपाबन' के संपादक और उनके एक मित्र की उनके घर में धारदार हथियार से हत्या कर दी गई.

इन हत्याओं के पीछे कारण क्या रहे?

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फ़रवरी 2013 में राजिब हैदर की हत्या के बाद से कई ब्लॉगर और धर्मनिरपेक्ष लोगों की हत्या हो चुकी है. इन्हें अंजाम देने का तरीक़ा क़रीब एक जैसा है- चाक़ू जैसे धारदार हथियारों का इस्तेमाल.

हमलावर ने सिर और गर्दन के आसपास के हिस्से को निशाना बनाया. इसके अलावा ज़्यादातर वारदात खुली जगह अंजाम दी गईं.

इनके विश्लेषण के बाद विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि इन्हें अंजाम देने वाले लोग भले देश के अलग-अलग हिस्सों से हों, पर वो उन्हें प्रशिक्षण और प्रेरणा एक ही संगठन से मिली है.

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बांग्लादेश के स्वतंत्र विचारक अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. उनकी चिंता यह है कि उन्हें आसानी से पहचानकर, पीछा कर हमला किया जा रहा है.

वशीकुर रहमान की पिछले साल मार्च ढाका में हत्या की गई, जब वे घर से दफ़्तर जा रहे थे. वह ब्लॉग लिखने में एक छद्म नाम इस्तेमाल करते थे, कहीं भी अपनी तस्वीर नहीं लगाते थे. इसके बाद भी हमलावरों ने उन्हें पहचान लिया और उनके घर का पता लगा लिया.

पुलिस के मुताबिक़ रहमान की हत्या के आरोप में जिन दो लोगों को पकड़कर अधिकारियों को सौंपा गया, वो दोनों मदरसा के छात्र थे. दोनों घटना से पहले एक दूसरे से मिले भी नहीं थे.

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इनमें से एक को चटगांव और दूसरे को ढाका के मदरसे से भर्ती किया गया था.

इससे लगता है कि ये हत्याएं एक ही नेटवर्क का काम है, जिसके पास ऑनलाइन रिसर्च करने वालों और ज़मीनी मुख़बिरों का बड़ा नेटवर्क है.

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इन घटनाओं ने लोगों को 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़े गए मुक्ति संग्राम के अंतिम दिनों की याद दिला दी है. उस साल दिसंबर में 200 से अधिक प्रोफ़ेसरों, कवियों और अन्य धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों को उनके घर से अगवा कर लिया गया था. इसे अंजाम दिया था, अल बदर नामक एक धर्मांध इस्लामिक संगठन ने.

जिन लोगों को अगवा किया गया था, उनमें से बहुत से लोग दोबारा नहीं मिले. गोलियों से छलनी कई शव मिले, इनकी आंखों पर पट्टियां बंधी थीं और हाथ पीछे बंधे थे.

बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी के नेताओं पर अल बदर के गठन का आरोप था, जिसने पाकिस्तान सेना के साथ 1971 में गठबंधन किया था.

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राजिब हैदर की हत्या ढाका में हुए धर्मनिरपेक्ष लोगों और ब्लॉगरों की एक रैली के बाद की गई. इसमें युद्ध अपराध के लिए उम्रक़ैद की सज़ा पाए इस्लामी नेता को मौत की सज़ा देने की मांग की गई थी.

इस रैली के बाद अभियोजिकों ने जमात-ए-इस्लामी के नेता अब्दुल क़ादिर मुल्ला की उम्र क़ैद की सज़ा के ख़िलाफ़ अपील की.

इन नास्तिक ब्लॉगरों में से कुछ ने अपने लेखन के ज़रिए इस्लाम पर हमला किया. इस पर पूरे बांग्लादेश में फैले इस्लामिक संगठनों ने उन पर पलटवार किया.

इन संगठनों के संगठन हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम ने 84 ब्लॉगरों की एक लिस्ट छापकर उन पर ईशनिंदा के आरोप लगाए और उन्हें सज़ा देने की मांग की. इस संगठन ने ढाका में दो बड़ी रैलियां भी कीं.

शेख हसीना सरकार हिफ़ाज़त के साथ समझौता करते नज़र आईं. इसके बाद हिफ़ाज़त ने ख़ुद को मदरसों तक सीमित कर लिया और सरकार ने मुसलमानों की भावनाएं भड़काने के आरोप में पांच ब्लॉगरों को जेल में डाल दिया.

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