बस अब रिपब्लिकन मुझे उम्मीदवार मान ले: ट्रंप

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अमरीका में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में हिलेरी क्लिंटन और डॉनल्ड ट्रंप दोनों ही ने मंगलवार रात हुए प्राइमरी चुनावों के बाद अपनी-अपनी दावेदारी और मज़बूत कर ली है.

डॉनल्ड ट्रंप ने पांच में से पांच राज्यों में जीत हासिल की है, जबकि हिलेरी क्लिंटन पांच में से चार राज्य जीत गई हैं. हिलेरी के ख़िलाफ़ उम्मीदवारी की रेस में शामिल बर्नी सैंडर्स को एक जगह जीत हासिल हुई है.

डोनल्ड ट्रंप ने पांच राज्यों में जीत के बाद कहा कि रिपब्लिकन पार्टी को अब उन्हें अपना उम्मीदवार मान लेना चाहिए

उनका कहना था, “जैसे बॉक्सिंग में दूसरे बॉक्सर को नॉक आउट कर देने के बाद फ़ैसले का इंतज़ार नहीं किया जाता, उसी तरह यहां होना चाहिए क्योंकि मुझे इससे पहले भी ऐसी ही जीत हासिल हुई है.”

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डेमोक्रैटिक उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 2383 डेलीगेट्स या पार्टी के प्रतिनिधियों की ज़रूरत होती है. हिलेरी क्लिंटन इस गणित में बर्नी सैंडर्स से काफ़ी आगे निकल गई हैं.

हर राज्य को वहां की आबादी के हिसाब से डेलीगेट्स दिए जाते हैं. जिस उम्मीदवार को जितने फ़ीसद वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में उसे वहां डेलीगेट्स मिलते हैं.

माना जा रहा है कि मंगलवार के परिणाम के बाद बर्नी सैंडर्स के लिए क्लिंटन को डेलीगेट्स की दौड़ में पछाड़ना असंभव हो गया है. सैंडर्स पर उम्मीदवारी की रेस से नाम वापस लेने के लिए दबाव बढ़ रहा है.

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लेकिन सैंडर्स ने कहा है कि वो सिर्फ़ उम्मीदवारी हासिल करने के लिए रेस में नहीं हैं, वो अमरीका में एक आंदोलन को जन्म दे रहे हैं जिससे असमानता दूर हो सके, सबको स्वास्थ्य की सुविधा मिले और उच्च शिक्षा मुफ़्त हो जाए. उनकी टीम का कहना है कि वो आख़िर तक इस रेस में बने रहेंगे.

वहीं रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी की रेस हर दिन के साथ और पेचीदगियां ला रही है.

मंगलवार को डॉनल्ड ट्रंप ने भारी जीत हासिल की है और पांच में से पांच राज्य उनके खाते में गए.

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लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि पार्टी प्रबंधन उनका साथ नहीं दे रहा है.

रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी के लिए 1237 डेलीगेट्स की ज़रूरत है लेकिन अगर किसी एक उम्मीदवार को ये संख्या नहीं मिल पाई तो पार्टी के प्रतिनिधि दोबारा से वोट डालते हैं. दोबारा होने वाले वोट में वो जिसे चाहें वोट डाल सकते हैं. यानी प्राइमरी चुनावों में जनता ने किसे चुना है ये मायने नहीं रखता.

ट्रंप की टीम के लिए सबसे बड़ा डर यही है कि अगर वो 1237 के मैजिक नंबर से कुछ पीछे रह गए तो पार्टी प्रबंधन प्रतिनिधियों को किसी और उम्मीदवार को वोट डालने के लिए राज़ी कर लेगा.

उनकी कोशिश है कि पार्टी के पेचीदा क़ानून का सामना करने की बजाय सीधे तौर पर 1237 डेलिगेट्स हासिल कर लिए जाएं क्योंकि मौजूदा गणित के अनुसार ये फ़िलहाल संभव है.

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उनके दोनों प्रतिद्वंदी टेड क्रूज़ और जॉन केसिक इस गणित से बाहर हो चुके हैं, क्योंकि वो अब किसी हाल में 1237 तक नहीं पहुंच सकते. उन दोनों की कोशिश इस बात की है कि ट्रंप को भी वहां तक नहीं पहुंचने दिया जाए जिससे दोबारा वोटिंग की गुंजाइश बन सके.

इन दोनों उम्मीदवारों ने अगले हफ़्ते इंडियाना राज्य में होने वाले प्राइमरी के लिए एक तरह का समझौता भी किया है जिससे कि वोटों का बंटवारा न हो और वहां मज़बूत समझे जाने वाले टेड क्रूज़ ट्रंप को मात दे सकें लेकिन ये रणनीति कितनी कारगर होगी ये फ़िलहाल कहना मुश्किल है.

देखा जाए तो डेमोक्रैटिक रेस की तस्वीर अब काफ़ी हद तक साफ़ होती नज़र आ रही है. लेकिन रिपब्लिकन रेस की राजनीति फ़िलहाल लंबी चलेगी और जानकारों की माने तो शायद काफ़ी गंदी चलेगी.

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