चेर्नोबिल और कई सिर वाले जानवरों का सच !

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1986 में हुई चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना के बाद पैदा हुई आशंकाओं और चिंताओं ने कई तरह के मिथकों को जन्म दिया था.

यूक्रेन में ऐसे कई लोग थे जिनके दिमाग पर इस आपदा ने ऐसा असर छोड़ा कि वो कई तरह के मिथकों को मानने लग गए.

ऐसे मिथकों में परमाणु विकिरण के कारण जेनेटिक बदलाव से पैदा हुए भयानक जानवर, इसके शिकार हुए इंसानों की भयावह तस्वीरें और वो प्रतिबंधित क्षेत्र शामिल थे जहाँ ये हादसा हुआ.

लेकिन पिछले 30 सालों में परमाणु संयंत्र के इर्द-गिर्द के क्षेत्र पर हुए शोध ने कई आम धारणाओं को ग़लत साबित किया है.

इससे जुड़ा एक मिथक यह है कि परमाणु विकिरण से जानवरों में हुए जेनेटिक बदलाव ने ज़बरदस्त ताकत वाले खूंखार जानवर पैदा किए हैं. ये भी कहा जाने लगा था कि इन में से कई के हाथ-पांव, सिर या पूंछ नहीं होते हैं तो किसी के पास ज्यादा एक से ज़्यादा सिर, हांथ-पाव और पूंछे होती हैं.

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हालांकि वैज्ञानिकों को इससे जुड़ा कोई सबूत नहीं मिला है.

26 अप्रैल 1986 को हुए विस्फोट के तुरंत बाद अनेक पक्षी और जानवर मारे गए. अधिक विकिरण वाले क्षेत्र में कुछ ही पेड़ मिले और कुछ ही ऐसे जानवर मिले जिनमें सीज़ियम-137 का स्तर सामान्य से अधिक था.

इस घटना से जुड़ा दूसरा मिथक ये था कि विकिरण बिल्कुल भी ख़तरनाक नहीं है क्योंकि प्रतिबंधित क्षेत्र में भेड़िए, हिरण, बीवर और सूअर की अच्छी-खासी आबादी आराम से रह रही है.

शोध से पता चलता है कि बेशक यह इलाका वन्य जीवों के लिए स्वर्ग बना हुआ है लेकिन यहां जानवर इसलिए इतने आराम से रह रहे हैं क्योंकि यहां इंसानों का दख़ल नहीं है.

शिकार और खेती जैसी इंसानी गतिविधियां वन्य जीवों के लिए कभी-कभी विकिरण से भी ज्यादा बुरी साबित होती हैं.

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इस हादसे से जुड़े एक और मिथक के मुताबिक वोदका, वाइन या भरपूर मात्रा में बीयर पीने से विकिरण का जहरीला असर कम हो जाएगा. लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि शराब के अंदर इस तरह का कोई गुण होता है.

हालांकि शोधकर्ताओं ने यह जरूर पाया है कि रेड वाइन में प्राकृतिक रूप से एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो संभव है विकिरण से होने वाले नुकसान से कोशिकाओं को कुछ हद तक बचा सकते हैं.

एक और मिथक लोगों के दिमाग में यह भी बना हुआ है कि विकिरण का कोई ख़तरनाक प्रभाव लोगों पर नहीं पड़ा है. रिएक्टर के आस-पास के तीस किलोमीटर के प्रतिबंधित क्षेत्र को जल्द ही हरे-भरे अभ्यारण्य में तब्दील कर दिया जाएगा जिससे पयर्टन को बढ़ावा मिलेगा.

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वैज्ञानिकों का कहना है कि तीस किलोमीटर क्षेत्र के अंदर रेडियोधर्मी कचरे का होना अब भी ख़तरनाक है और इसने इस पूरे क्षेत्र को इंसानों के रहने के लिहाज़ से बीस हज़ार सालों के लिए असुरक्षित कर दिया है.

एक मिथक तो यह भी है कि चेर्नोबिल संयंत्र के पास बनाए गए प्रतिबंधित क्षेत्र को रिएक्टर की सुरक्षा के लिए नहीं बनाया गया है बल्कि यह हथियारों को छुपाने का ठिकाना है और बड़ा राडार अभी भी इस पर लगा हुआ देखा जा सकता है.

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हालाँकि असलियत यह है कि परमाणु संयंत्र के नज़दीक दुर्घटना की पूर्व चेतावनी के लिए उच्च सुरक्षा वाले सिस्टम डुगा-1 एबीएम को लगाया गया था जो सोवियत संघ में बना था.

यह रडार 2500 किलोमीटर की दूरी से हमला करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल को भांप सकता था. 26 अप्रैल 1986 की दुर्घटना के बाद सोवियत संघ की सरकार ने इस सुविधा को नष्ट कर दिया.

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