लंदन में मेयर का चुनाव और मजबूर हुए इमरान

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दक्षिण एशिया को ब्रिटेन से भले ही 70 साल पहले ही मुक्ति मिल चुकी है, लेकिन दिल है कि लंदन में ही अटका रहता है.

आज भी तू घंटी बिग बैन दी पूरा लंदन ठुमकदा. पांच मई को लंदन के मेयर का चुनाव हो रहा है, मगर इस चुनाव की सबसे ज़्यादा चर्चा पाकिस्तान में है.

वैसे तो 21 उम्मीदवार लंदन का मेयर बनना चाहते हैं. पर सबसे कड़ा मुक़ाबला जिन दो प्रत्याशियों के बीच है, उन दोनों का टांका पाकिस्तान से जुड़ा है.

लेबर पार्टी के उम्मीदवार सादिक़ ख़ान पाकिस्तान में पैदा हुए. 70 के दशक में वे अपने माता-पिता और छह भाई-बहनों के साथ लंदन पहुंचे.

ग़रीब इलाक़े के काउंसिल अपार्टमेंट में ठुस-ठुसा कर गुज़ारा करते रहे. अब्बा लंदन की डबल डेकर की लाल बस के ड्राइवर बन गए. अम्मा गारमेंट फ़ैक्ट्री में काम करने लगीं और एक भाई मोटर मैकेनिक बन गए.

और एक दिन सादिक़ ख़ान वकील हो गए और मानवाधिकार संस्थाओं के साथ जुड़ गए. 2005 में लेबर पार्टी के उम्मीदवार बने और जीत कर संसद पहुंच गए.

प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन के मंत्रीमंडल में परिवहन मंत्री हो गए. यूं पहले ब्रिटेश मुस्लिम मंत्री बनने की उपलब्धि हासिल की.

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सादिक़ ख़ान के मुक़ाबले में जो कंर्जेटिव उम्मीदवार हैं, वो बिलकुल अलग दुनिया के हैं. अरबपति कारोबारी जिम्मी गोल्डस्मिथ के सुपुत्र जैक गोल्डस्मिथ, जो मुंह में सोने का चमचा लेकर पैदा हुए.

गांजा पीने के चक्कर में 16 साल की बाली उमरिया में महा रईसों के स्कूल इटन से निकाले गए फिर अब्बा ने व्यापार में शामिल कर लिया.

सादिक़ ख़ान को लंदन ऐसे याद है जैसे हाथ की लकीरें. पर जैक गोल्डस्मिथ ने लंदन ट्यूब में शायद ही कभी सफ़र किया होगा. वे ठीक से नहीं बता सकते हीथ्रो एयरपोर्ट पिक्डले लाइन जाती है या जुबली लाइन.

कौन से म्यूज़ियम लंदन में कहां है, शायद शौफ़र को मालूम हो. कौन सा मशूहर फ़ुटबॉल स्टेडियम लंदन में कहां है, शायद वहां, शायद यहां, नहीं नहीं पता नहीं, आप मेरे बॉडीगार्ड से क्यूं नहीं पूछ लेते हैं.

जैक गोल्डस्मिथ की बहन जेमिमा हमारे इमरान ख़ान की पत्नी रह चुकी हैं. यानी जैक इमरान ख़ान के दो बेटों के मामू भी हैं.

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इसलिए इमरान ख़ान की मजबूरी है कि वे लंदन में जैक गोल्डस्मिथ के चुनाव अभियान में हिस्सा लें और पाकिस्तान में उन तमाम लोगों के हुक़ूक के चैंपियन भी बने रहें जो सादिक़ ख़ान की तरह ज़िंदगी में नीचे से ऊपर तक पहुंचने के जीवन संघर्ष में जुटे हुए हैं.

यानी शेर भी नाराज़ नहीं हो शिकार भी राज़ी रहे. इसे ही कहते हैं राजनीति, जैसा देश वैसा भेष.

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