इंटरनेट की हर सामग्री पर इनकी नज़र है

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सोशल मीडिया का दायरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है. इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि रोज़ फ़ेसबुक पर क़रीब पैंतीस करोड़ फ़ोटो अपलोड की जाती हैं.

इसके अलावा दसियों लाख वीडियो, गिफ़्ट कार्ड और टेक्स्ट मैसेज तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डाले जा रहे हैं. कई बार इनमें कई फ़ोटो, वीडियो और संदेश, ख़राब और बुरे असर डालने वाले होते हैं.

आप सिर्फ़ अंदाज़ा लगाइए कि फ़ेसबुक जैसी हज़ारों वेबसाइट हैं जिन पर ये गंदी चीज़ें अपलोड की जा रही है. इनकी तादाद बेहिसाब है.

इस तरह के वेब कंटेंट से लोगों को नुक़सान न हो, इससे बचाव के लिए तमाम वेबसाइट्स और कंपनियों ने ख़ास लोगों की टीम बनाई है. ये उनकी वेबसाइट पर अपलोड किए जाने वाले हर संदेश, हर फ़ोटो, हर वीडियो की निगरानी करते हैं. इन्हें, ''मीडिया रिस्क डिफेंस टीम'' कहा जाता है.

पहले ये काम स्वयंसेवी करते थे. जो हर ऑनलाइन कंटेट की निगरानी करते थे. लोगों को नुक़सान पहुंचाने वाले फ़ोटो-वीडियो को हटाने का काम करते थे. लेकिन अब ये काम प्रोफ़ेशनल्स के ज़िम्मे हो गया है जो चौबीसों घंटे निगरानी का काम करते हैं. इनकी ज़िम्मेदारी इंटरनेट की सुरक्षा, लोगों की बात-चीत सुनना और किसी मुसीबत की स्थिति में लोगों की मदद करना है.

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इंटरनेट और तमाम सोशल नेटवर्क पर लोगों की मौजूदगी बढ़ रही है. लोग खुलकर बात कर रहे हैं. अपने फ़ोटो-वीडियो डाल रहे हैं. इनकी निगरानी ज़रूरी है क्योंकि इंटरनेट पर बहुत से लोग ऐसी क़ाबिले-ऐतराज़ चीज़ें अपलोड कर रहे हैं. जो दूसरों को बुरी लग सकती हैं, नुक़सान पहुंचा सकती हैं.

इसीलिए आज दुनिया भर में ढाई से साढ़े तीन लाख ऐसे लोग काम कर रहे हैं जो इंटरनेट पर डाली जा रही हर चीज़ पर नज़र रखते हैं. इनके अलावा क़रीब दस लाख लोग ऑनलाइन सिक्योरिटी के लिए काम कर रहे हैं ताकि लोगों की निजता में दखल न पड़े. ऑनलाइन सेफ़्टी कंपनी एसएसपी ब्लू के हिमांशु निगम कहते हैं कि ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा ही है.

ब्रिटेन की ऑनलाइन सिक्योरिटी कंपनी क्रिस्प थिंकिंग की एमा मॉन्क्स कहती हैं कि पहले ऐसे लोग ऑनलाइन मॉ़डरेटर कहे जाते थे. अब ये इंटरनेट के रखवाले बन गए हैं. एमा बताते हैं कि पहले लोग ये काम शौक़िया करते थे. आज ये ज़िम्मेदारी पूरी तरह से प्रोफ़ेशनल्स के हवाले है.

जैसे, क्रिस्प थिंकिंग में ही ''मीडिया रिस्क डिफेंस टीम'', उन वेबसाइट की निगरानी करती है, जिन्होंने क्रिस्प की टीम को ये ज़िम्मेदारी दे रखी है. क्रिस्प के इंटरनेट सिपाही, दिन-रात अपने ग्राहकों की वेबसाइट पर अपलोड हो रहे कंटेट पर पैनी नज़र बनाकर रखते हैं.

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दूसरी कंपनियों में इन रिस्क डिफेंस टीमों को ''सोशल डिफेंडर'' या ''कंटेंट मॉडरेटर'' भी कहा जाता है.

क्रिस्प थिंकिंग के संस्थापक और सीईओ एडम हिल्ड्रेथ कहते हैं कि ऑनलाइन ज़िंदगी, आम ज़िंदगी जैसी है. हमारी सुरक्षा के लिए पुलिस होती है जो अपराधियों पर निगाह रखती है ताकि जुर्म होने से रोक सके. यही काम ''सोशल डिफेंडर'' का होता है जो इंटरनेट पर सक्रिय लोगों को नुक़सान से बचाते हैं.

एडम हिल्ड्रेथ की उम्र महज़ 31 साल है और उन्हें सोशल मी़डिया डिफेंस का तजुर्बेकार माना जाने लगा है. उन्होंने सिर्फ़ 14 बरस की उम्र में किशोरों के लिए सोशल नेटवर्क डबिट लिमिटेड की शुरुआत की थी. बहुत कम वक़्त में ये ब्रिटेन की नंबर वन टीन-वेबसाइट बन गई थी.

मगर इसी के साथ ही इंटरनेट और ऑनलाइन कंटेंट से बच्चों और किशोरों को होने वाले नुक़सान की बात होने लगी थी. बच्चों का यौन शोषण करने वाले ऑनलाइन जाल बिछाकर शिकार फांसते थे. इसी तरह आम लोग, जिन्हें इंटरनेट की दुनिया के जुर्म की समझ नहीं, वो अक्सर इनके झांसे में आ जाते थे.

इन्हीं ख़तरों के मद्देनज़र एडम हिल्ड्रेथ ने 2006 में क्रिस्प थिंकिंग कंपनी की शुरुआत की. जिसका काम सोशल मीडिया और ऑनलाइन कंटेंट पर निगरानी रखना, ख़राब चीज़ों को इनसे हटाना था.

आज क्रिस्प थिंकिंग बहुत सी कंपनियों और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी निभाती है. कहीं बम होने की धमकी हो या फर के इस्तेमाल पर किसी डिज़ाइनर की वेबसाइट पर जानवरों के अधिकारों के लिए लड़ने वालों का हमला.

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हिल्ड्रेथ की कंपनी आज दो सौ से ज़्यादा कंपनियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी निभा रही है. रोज़ाना उनकी कंपनी के लोग करोड़ों कंटेंट की पड़ताल करते हैं. ताकि नुक़सानदेह चीज़ों को अलग किया जा सके.

एडम कहते हैं कि वो इंटरनेट के चौकीदार हैं जो चौबीसों घंटे ऑनलाइन निगरानी की ज़िम्मेदारी निभाते हैं. लोगों की बातचीत सुनते हैं. उनके अपलोड किए फ़ोटो-वीडियो और मैसेज चेक करते हैं. कोई ख़तरा नज़र आते ही वो पहले तो ख़ुद उससे निपटने की कोशिश करते हैं या फिर जो ये काम कर सकता है, उसको आगाह करते हैं.

कई बार किसी कंपनी के बारे में कही जा रही बुरी बातों से उस कंपनी को आगाह किया जाता है ताकि वो अपने बारे में हो रही ऑनलाइन बदनामी को रोकने के लिए ज़रूरी क़दम उठा सके.

एडम की कंपनी में नए आए लोगों को पहले ये समझाया जाता है कि जोखिम क्या है. ये सिर्फ़ बम की धमकी नहीं है. अपनी ग्राहक कंपनियों की इमेज को होने वाला नुक़सान भी जोखिम है. इंटरनेट के चौकीदारों को अपनी ग्राहक कंपनियों की इमेज की भी फ़िक्र होती है. ऑनलाइन कंपनियों का नाम ख़राब होने से रोकना भी क्रिस्प की टीम का काम है.

कई बार कुछ कंपनियों के ख़िलाफ़ बाक़ायदा ऑनलाइन अभियान शुरू कर दिया जाता है. एडम की टीम इस सूरत में अपने ग्राहकों को आगाह करती है. ऐसे ख़तरों से निपटने की सलाह देती है.

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कई बार इंटरनेट पर अपलोड किए गए ख़तरनाक और नुक़सानदेह वीडियो, फ़ोटो या दूसरी चीज़ों को हटाने की भी ज़रूरत पड़ती है. इससे भी काम न बनने की सूरत में क़ानूनी एजेंसियों को ऑनलाइन अपराधियों के बारे में ख़बर की जाती है.

क्रिस्प थिंकिंग की एमा मॉन्क्स कहती हैं, "ऑनलाइन चौकीदारी के लिए पहले से कोई तज़ुर्बा होना ज़रूरी नहीं. ये नया कारोबार है और इसके तज़ुर्बेकार लोगों का मिलना बहुत मुश्किल है. सबसे ज़रूरी है कि इंसान को इंटरनेट के जोखिमों की समझ हो. इनकी मदद से वो सोशल नेटवर्किंग साइट्स की निगरानी कर सके. ख़राब चीज़ों को वहां से हटा सके ताकि क्रिस्प थिंकिंग के ग्राहकों का उन पर भरोसा बना रहे. सबसे बड़ी बात है कि लगातार काम करने की लगन हो. कई बार आपको इंटरनेट की निगरानी के साथ-साथ लोगों को अच्छा माहौल बनाने का हौसला देने की ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ सकती है."

एमा कहती हैं कि इंटरनेट चौकीदारों का निष्पक्ष होना ज़रूरी है. कई बार उनका ऐसे कंटेंट से सामना हो सकता है जिसके बारे में उनकी अपनी भी राय हो. वो उसके समर्थक भी हो सकते हैं. लेकिन, अगर ऐसी बात ज़्यादा लोगों को नागवार गुज़रने का डर हो तो उसे हटाना ही बेहतर होगा.

इंटरनेट पर कई चीज़ें हिला देने वाली भी होती हैं. मसलन किसी का सिर क़लम करने का वीडियो या फिर बच्चों के यौन शोषण की तस्वीरें. ऐसे में धीरज बनाए रखना ज़रूरी है. आपस में बात करके, लोगों से मदद लेकर इन चुनौतियों से निपटा जा सकता है.

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आज कमोबेश हर कंपनी के लिए ''मीडिया रिस्क डिफेंस टीम'' रखना ज़रूरी हो गया है क्योंकि इंटरनेट पर आम लोगों की साझेदारी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है. ऐसे में कंपनियों को अपने ग्राहकों और वेबसाइट की सुरक्षा के लिए ऐसे इंटरनेट चौकीदार रखना ज़रूरी हो गया है.

एसएसपी ब्लू के हिमांशु निगम कहते हैं कि आज हर इंसान इसकी ज़रूरत महसूस करता है. लोग चाहते हैं कि कंपनियां अपनी ज़िम्मेदारी समझें और उन्हें इंटरनेट के ऐसे हर जोखिम से बचाएं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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