दुनियाभर में फैला रेत का कार्पोरेट कारोबार

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बालू या रेत ऐसी चीज़ है जिसको हम कुछ नहीं समझते. हमारी नज़र में इसकी कोई अहमियत नहीं. रेगिस्तान से लेकर समंदर के किनारों तक फैली रेत हो या फिर बच्चों के खेलने की जगह पर बिखेरी गई बालू. रेत यूं लगती है जैसे सर्वव्यापी हो. हर जगह मौजूद.

मगर इस क़दर बहुतायत में मौजूद रेत ऐसा संसाधन है जिसकी पूरी दुनिया में भारी मांग है. इतनी मांग है कि इसके लिए लोग लड़ाइयां लड़ते हैं. ज़मीन पर कब्ज़ा करते हैं. दुनिया के तमाम देशों में रेत की तस्करी का कारोबार चलता है. बड़े-बड़े रेत माफ़िया हैं.

वैज्ञानिक पास्कल पेडुजी, जमैका के शहर नेग्रिल में समंदर के फैलते किनारे की वजह तलाश रहे हैं. उनकी समझ में ही नहीं आ रहा कि सैटेलाइट से निगरानी के बाद भी आख़िर इसकी वजह क्यों नहीं पकड़ में आ रही है. रातों-रात समुद्री किनारा कैसे ग़ायब होता जा रहा है. लेकिन जब स्थानीय लोगों ने उनको एक राज़ की बात बताई तो उनके होश ही उड़ गए.

स्थानीय लोगों ने बताया कि इस समुद्री तट पर रेत माफ़िया सक्रिय है. इस माफ़िया के हथियारों से लैस लोग, रात में आते हैं, बोरियों में रेत भर के ले जाते हैं. इसे वो बिल्डरों को बेचते हैं.

पास्कल कहते हैं कि वो ये जानकर सदमे में आ गए कि लोग रेत के लिए लड़ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए काम करने वाले पास्कल बताते हैं कि पर्यावरण के लिए वो पिछले बीस सालों से काम कर रहे हैं. मगर रेत की अहमियत उन्हें अब समझ में आई है.

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इमारतें बनाने में रेत का इस्तेमाल सदियों पुराना है. ईसा से साढ़े तीन हज़ार साल पहले मिस्र और इराक़ में लोग रेत की मदद से इमारतें बनाते थे. रेत, पानी और हवा के चट्टानों से टकराने से बनती है. चट्टानें चूर-चूर होकर रेत में तब्दील हो जाती हैं. कुछ हिस्सा कांच के टुकड़ों में भी तब्दील हो जाता है.

आज पूरी दुनिया में रेत का इस्तेमाल होता है. हर तरह के निर्माण में इसे इस्तेमाल किया जाता है. नदी की तलहटी से, खदानों से, झीलों से, समंदर के किनारों से रेत निकाली जाती है. इसका इस्तेमाल पेंट और सीमेंट बनाने में भी होता है.

पूरी दुनिया में इस वक़्त इमारतें बनाने के कारोबार में ज़बरदस्त तेज़ी आई है. अमरीका और दूसरे देशों में तेल निकालने के लिए हाइड्रॉलिक फ्रैक्चरिंग तकनीक के इस्तेमाल में तेज़ी से भी रेत की मांग बढ़ी है.

साल 2014 में, पूरी दुनिया में क़रीब बीस करोड़ टन रेत निकाली गई. पानी के बाद रेत ऐसा दूसरा क़ुदरती संसाधन है जिसका जमकर इस्तेमाल हो रहा है. हर जगह रेत का इस्तेमाल हो रहा है. स्विमिंग पूल के फिल्टर से लेकर, तेल के कुओं तक. स्मार्ट फ़ोन की स्क्रीन से लेकर टूथपेस्ट तक बनाने में रेत का इस्तेमाल हो रहा है.

आज पूरी दुनिया में रेत और गिट्टी का कारोबार क़रीब आठ अरब डॉलर का बताया जा रहा है. पूरी दुनिया में रेत की मांग पांच फ़ीसद सालाना से भी ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है. इसीलिए रेत के कारोबारी, इसके लिए जान का जोखिम लेने से भी पीछे नहीं हट रहे.

एक अमरीकी इन्वेस्टमेंट कंपनी में काम करने वाले सोनी रंधावां कहते हैं कि रेत का कारोबार अब तक बहुत बोरियत भरा था. मगर पिछले कुछ सालों में इसमें दिलचस्प उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है.

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वैसे पूरी दुनिया में रेत की मांग एक जैसी नहीं है. चीन और भारत में तेज़ी से इमारतें, पुल, सड़कें, बांध और फ्लाई ओवर बन रहे हैं. इसलिए इन दोनों ही देशों में बालू की भारी मांग है. पूरी दुनिया में रेत की मांग का बीस फ़ीसद तो चीन के हिस्से जाता है.

हर तरह के निर्माण में रेत का इस्तेमाल हो रहा है. हाल ये है कि पिछले चार सालों में चीन में जितनी रेत की खपत हुई, अमेरिका ने उतनी पिछले सौ सालों में भी नहीं इस्तेमाल की. चीन तो रेत की मदद से नए नए बनावटी द्वीप बनाकर दक्षिणी चीन सागर पर अपना कब्ज़ा बढ़ा रहा है.

चीन ही क्यों, रेगिस्तान वाले देश संयुक्त अरब अमीरात को भी रेत, गिट्टी और पत्थर ख़रीदना पड़ता है. साल 2014 में संयुक्त अरब अमीरात ने 45 करोड़ डॉलर की गिट्टी और रेत का आयात किया था. दुबई में आज बन रही हर चमकदार इमारत में बाहर से मंगाई जा रही रेत का इस्तेमाल हो रहा है. वजह ये है कि रेगिस्तान में मिलने वाली रेत इतनी महीन होती है कि उसका इमारतें बनाने में इस्तेमाल नहीं हो सकता.

वहीं ब्रिटेन में रेत की मांग कम हो गई है. क्योंकि निर्माण का कारोबार धीमा है. 2007 से अब तक ब्रिटेन में रेत की मांग में एक चौथाई की कमी आई है.

वहीं अमरीका में तेल के कुएं खोदने के नए तरीक़े, यानी फ्रैकिंग में आज रेत का ख़ूब इस्तेमाल हो रहा है. 2013 में जितनी रेत का इस्तेमाल इस काम में किया गया वो पिछले दस सालों से भी दोगुना था. होता यूं है कि ज़मीन के अंदर गहराई से तेल निकालने के लिए पानी, रेत और केमिकल की मदद से ड्रिलिंग की जाती है.

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रेत की इतनी भारी मांग से इसकी क़ीमत भी बढ़ रही है. अमरीका में तेल की तलाश में इस्तेमाल होने वाली बालू की मांग 2011 से 2014 के बीच दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई थी. मगर पिछले दो सालों में इसकी क़ीमत गिरी है. आज फ्रैकिंग तकनीक से तेल निकालने का धंधा तेज़ी पकड़ रहा है. इसमें इस्तेमाल होने वाली रेत की मांग भी बढ़ी है.

बहुत से देशों ने रेत की खुदाई के काम के लिए तमाम नियम-क़ायदे बनाए हैं. इसके लिए लाइसेंस और पट्टे जारी किए जाते हैं. ताकि, खदानों और नदी की तलहटी की ज़्यादा खुदाई न हो. इसे निकालने और साफ़ करके बाज़ार में बेचने का काम पेचीदा है. ये काम हर इंसान के बस का नहीं.

आज इस काम में छोटे-छोटे लोगों के साथ बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी लगी हुई हैं. जैसे बेल्जियम की सिबेल्को ग्रुप. ये 144 साल पुरानी कंपनी है, जो 41 देशों में रेत का कारोबार करती है. इसी तरह जर्मनी की हीडेलबर्ग सीमेंट कंपनी, दुनिया के 40 देशों में सीमेंट बनाती और बेचती है. इसके लिए इसने रेत की कई खदाने ली हुई हैं.

वैसे ज़्यादातर देशों में ये काम स्थानीय स्तर पर ही होता है. अमरीका में 230 कंपनियां रेत का कारोबार करती हैं. पिछले कुछ सालों से इनमें से चार कंपनियों ने न्यूयॉर्क के शेयर बाज़ार में भी लिस्टिंग कराई है. ज़्यादातर इन्वेस्टर कंपनियां, इनके शेयर ख़रीदने की सलाह देती हैं. क्योंकि इनमें मुनाफ़ा होने क़रीब-क़रीब तय है. अमरीकी कंपनी यू एस सिलिका पिछले सौ से भी ज़्यादा सालों से रेत का कारोबार कर रही है. बड़ी-बड़ी कंपनियां इसकी ग्राहक हैं. यानी इसके शेयर ख़रीदने में कोई ख़तरा नहीं.

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रेत के कारोबार से सबसे ज़्यादा दिक़्क़त पर्यावरण की फिक्र करने वालों को है. उनके मुताबिक़ रेत की अंधाधुंध खुदाई से पर्यावरण को, नदियों को, झीलों को, समंदर के किनारों को भारी नुक़सान हो रहा है. रेत निकालने की वजह से पिछले पचास सालों में समुद्रों के किनारे चालीस मीटर तक घट गए हैं. अमरीका के कैलिफ़ोर्निया और साउथ कैरोलिना में इतनी रेत निकाली गई है कि सैकड़ों मीटर ज़मीन पानी में समा गई है. दुनिया के कई हिस्सों में तो कई द्वीप, रेत की खुदाई की वजह से ग़ायब हो गए हैं.

वैज्ञानिक पास्कल पेडुजी कहते हैं कि आज भी दुनिया में काफ़ी रेत मौजूद है. मगर इसका इतना ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है कि ये बेशक़ीमती होती जा रही है.

ऐसा नहीं कि हमें इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए. मगर, पास्कल सलाह देते हैं कि, बेहतर होगा कि इसे सावधानी से इस्तेमाल किया जाए.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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