ब्लॉग: 'तमिलनाडु सिर्फ़ भारत में ही नहीं है..'

क्या समझते हैं, तमिलनाडु सिर्फ़ इंडिया में ही है कि चुनाव का मौसम आते ही वादों का मॉनसून आ जाता है.

सस्ते चावल ले लो, मुफ़्त टीवी, फ़्रिज, मिक्सर, ग्राइंडर, स्मार्टफ़ोन विथ 3जी 4जी, मुफ़्त बिजली, कुंवारियों के लिए एक-एक तोला सोना, लैपटॉप, मोटरसाइकिलें, स्कूल यूनीफ़ॉर्म सब ले लो, बस हमें वोट दे दो!

इन सब के लिए पैसा कहां से आएगा? वो हम जानें. तुम आम खाओ, पेड़ क्यों गिनते हो?

सोचो, ये सब हम तुम्हें मुफ़्त में दे सकते हैं तो हम कितना कमाते होंगे. अगले चुनाव में इससे भी ज़्यादा बांटेंगे.

इसी का नाम है लोकतंत्र, जियो और जीने दो! आप खाओ, हमें भी खिलाओ, इत्यादि इत्यादि.

अगर आप समझते हैं कि तमिलनाडु सिर्फ़ इंडिया में है, तो आप कितने भोले हैं. जहां जहां लोकतंत्र का बाजा बज रहा है, वहां तमिलनाडु है.

यक़ीन नहीं आता तो सीमा पार हमारे यहां तशरीफ़ लाइए.

चुनाव अभी दो साल दूर है, पर लगता है कल ही होने वाले हैं. जनता पूछती है, भाई साब, ऑफ़शोर कंपनियों का हिसाब दो.

नवाज़ शरीफ़़ कहते हैं, लो तुम्हें एयरपोर्ट दिया, बन्नो इंटरनेशनल एयरपोर्ट.

विपक्ष पूछता है पनामा पेपर्स में जो कंपनियां आपके बच्चों से जोड़ी गई हैं, उनमें पैसा कहां से आया?

इमेज कॉपीरइट Getty

वो कहते हैं, आपसे मतलब? आपको मानसेरा और एबटाबाद के विकास के लिए कितना पैसा चाहिए? एक हज़ार करोड़, दो हज़ार करोड़? चलो 10 हज़ार करोड़ दिया.

लैपटॉप, तुम्हारे कुत्तों के लिए भी लैपटॉप. ये पकड़ो मोटरवे, यो लो फ्री मेडिकल इंश्योरेंस. और ये लो नवाज़ शरीफ़ रोज़गार योजना.

और ये और पकड़ो नवाज़ शरीफ़ स्मॉल लोन स्कीम. हो गई तुम्हारी तसल्ली!

मगर हुज़ूर, इन सबके लिए पैसे कहां से आएंगे? आप तो ख़ुद आईएमएफ़ से 500 मिलियन डॉलर की अगली किस्त लेने के लिए वॉशिंगटन के चक्कर पे चक्कर काट रहे हैं.

फ़िर वही जाहिलों वाली बात. हम तुमसे वोट थोड़े ही न मांग रहे हैं. चुनाव तो अभी दो साल दूर हैं भाई.

लेकिन हुज़ूर ये जो आप मेरा मुंह बंद करने के लिए लैपटॉप दे रहे हैं, इसे चार्ज करने के लिए बिजली कब देंगे?

बस जैसे ही चुनाव घोषित होंगे, हम बिजली भी मुफ़्त कर देंगे. इतनी बिजली होगी कि संभाली नहीं जाएगी.

और ये जो आपने हमारे शहर का एयरपोर्ट इंटरनेशनल कर दिया है, तो यहां तो कोई विमान भूले से भी नहीं उतरता. इससे तो अच्छा था कि आप हमें पीने का साफ़ पानी दे दें. मुफ़्त तालीम दे दें, एक अच्छा सा अस्पताल बनवा दें कि दूर न जाना पड़े.

ज़्यादा सयाने बनने की कोशिश मत करो. वो काम कहो जो अगले चुनाव से पहले मुकम्मल हो जाएं ताकि हम उनका फ़ीता काटकर तुमसे ही तालियां पिटवां सकें. ये स्कूल-विस्कूल, अस्पताल सब फ़िज़ूल की बातें हैं.

पिछली सरकारों ने स्कूल और अस्पताल के नाम पर कितने सारे ढांचें बनवाए. इनमें से कितने स्कूलों में टीचर आएं और कितने अस्पतालों में डॉक्टर लगाए गए.

इमेज कॉपीरइट AFP

अगर तुम फिर भी चाहते हो कि हम एक और ढांचा खड़ा कर दें तो कर देते हैं. हमारे बाप का क्या जाता है. पैसा तो तुम्हारा ही है जो तुम पर भी लग रहा है और तुमसे ज़्यादा हमपे.

तुम वोटर हो, वोटर ही रहो. लगाओ मेरे साथ नारा. लोकतंत्र की जय! पनामा पेपर्स की साज़िश हाय, हाय! पाकिस्तान ज़िन्दाबाद, तमिलनाडु ज़िन्दाबाद!

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार