जब एक गिरोह के ख़िलाफ़ उतारनी पड़ी सेना

छोटू गिरोह

पाकिस्तान में छोटू गिरोह की दहशत इतनी फैल चुकी थी कि सरकार को सैन्य अभियान चलाना पड़ा.

बस्ती निहाल की 18 साल की मुमताज की कहानी कच्चा जमाल के इलाक़े में छोटू गिरोह की फैली दहशत का जीता जागता सबूत है.

छोटू गिरोह ने मुमताज के बूढ़े पिता को अगवा कर लिया था. छह महीने बंधक बनाकर रखने के बाद उन्हें अपनी जान की क़ीमत बेटी के रूप में चुकानी पड़ी.

सात साल की उम्र में मुमताज की शादी पहले गुलाम रसूल उर्फ़ छोटू बख़रानी के सबसे क़रीबी साथी से कर दी गई. पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत के बाद मुमताज की शादी जबरन छोटू के भाई से कर दी गई.

कच्चा जमाल में चलाए गए हाल के सैन्य अभियान के बाद रिहा कराए गए बंधकों में मुमताज और उनके तीन बच्चे भी शामिल थे.

दस साल तक मुमताज सिंध नदी में बने टापू के इस किनारे को देख सकती थीं, जहां उनके परिजन थे. लेकिन उन तक पहुंचना मुमताज के लिए नामुमकिन था.

उन्होंने बताया, "मैं उनके सामने रोती थी कि मैं छोटी हूँ, बड़ी होकर शादी कर लूंगी. लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी. शुरू में बस रोती थी, अम्मा को याद करती थी मगर उन्होंने मुझे बताया कि अब तुम बस यहीं रहोगी हमेशा के लिए."

उनका कहना है कि इस टापू पर केवल छोटू गिरोह का ही नहीं बल्कि कई और आपराधिक गुटों का भी बसेरा था.

फिलहाल ये साफ़ नहीं है कि क्या इस टापू पर मौजूद सारे गिरोहों के सदस्यों को गिरफ़्तार कर लिया गया है या वो फ़रार होने में कामयाब रहे.

मुमताज ने बताया, "यह सबका साझा फैसला था कि पुलिस के सामने हथियार नहीं डाले जाएंगे क्योंकि पुलिस उनका बयान नहीं सुनती.बस उन्हें मार दिया जाता है."

राजनपुर और रहीम यार खान के बीच की दरियाई पट्टी का इलाक़ा दशकों से दर्जनों आपराधिक गिरोह का ठिकाना रहा है.

पुलिस इनके खिलाफ़ कार्रवाई करने का दावा तो करती रही है.लेकिन आखिर में बिगड़ते हालात से निपटने के लिए सेना को अभियान चलाना पड़ा जिसके सामने छोटू गैंग ने बिना प्रतिरोध के हथियार डाल दिए.

एक स्थानीय बुज़ुर्ग ने बीबीसी को बताया, "यह गिरोह नदी की मछलियाँ बन चुके हैं. अलग-अलग टापुओं को अपना ठिकाना बनाते हैं और एक जगह से दूसरे जगह तैरकर भी चले जाते हैं. ये सिर्फ एक टापू तक सीमित नहीं हैं.''

बीबीसी उन स्थानीय नाविकों तक भी पहुँचा जो नदी के किनारों पर छोटू गैंग को परवान चढ़ते देखते रहे.

उनसे बात की तो पता चला की स्थानीय आबादी को प्रशासन पर विश्वास नहीं है. वो कहते हैं कि उन्हें छोटू गैंग से ज्यादा तो पुलिस वाले तंग करते हैं.

55 साल के मोहम्मद इस्माइल अब बिना नाव वाले मल्लाह हैं. उनकी टूटी हुई नाव का ढांचा नदी की लहरों के साथ किनारे पर डोल रहा है.

उन्होंने कहा, "पुलिस हर साल कार्रवाई करती है, हमारी नावें कार्रवाई के लिए कब्ज़े में ले ली जाती हैं, ना कोई अपराधी पकड़ा जाता है और ना ही हमारे नुक़सान का भरपाई होती है. इन्हीं हालात में छोटू गैंग बनते हैं, आप ख़ुद ही समझदार हो."

सिंध नदी के साथ-साथ नदी की पट्टी के इलाक़े को कच्चे का इलाक़ा कहा जाता है. हर साल आने वाली बाढ़ के बाद उभरने वाले टापुओं पर कई सालों से दर्जनों आपराधिक गिरोह अपनी जड़ें मजबूत करते रहे हैं.

स्थानीय जानकारों का कहना है कि पंजाब के इन इलाक़ो में बकायदा सरकार के अधिकार क्षेत्र के बजाए रसूखदार सरदारों और स्थानीय कबायली नेताओं का राज चलता है.

इलाक़े में ग़रीबी का राज है और बुनियादी ढांचे की कमी है. लोग प्रशासन के नहीं बल्कि अपने स्थानीय सरदार के रहमो करम पर हैं.

स्थानीय पत्रकार और विश्लेषक एमडी गांगा ने बताया, "ये इलाक़े अपराधी लोगों की फैक्ट्रियां हैं, जो जागीरदारों के ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के कारण मुजरिम बनते हैं. कानून को लागू करने वाली एजेंसियां जब लोगों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर पाती हैं तो फिर भ्रष्टाचार और अपराध की दुनिया के छोटू गैंग पैदा होते हैं."

उन्होंने बताया कि अक्सर लोग पुलिस के रवैये से तंग आकर सरदारों की मदद लेते हैं और राजनीतिक उद्देश्यों के खातिर अक्सर इन गैंगों को जागीरदारों का संरक्षण प्राप्त होता है. जो पकड़े जाने पर रिहा भी करवा देते हैं.

25 साल के शौक़त अली एक किसान हैं जिन्होंने अपने इलाक़े में कई लोगों को अपराध की दुनिया में कदम रखते देखा है. उन्होंने आरोप लगाया कि अतीत में इन गैंगों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की आड़ में यहां लोगों की कटी फसलें भी उठाई जाती थीं.

वो बताते हैं, "यह इन लोगों के खिलाफ़ कई कार्रवाइयों में से एक थी. ये लोग तो हाथ नहीं आते, लेकिन दूसरे ग़रीबों का माल और फसल उनके हाथ लग जाता है. कभी इन लोगों के रिश्तेदारों को निशाना बनाया जाता है जबकि उनका क्या कसूर है? फिर इनके पास कोई रास्ता नहीं होता है और ये फिर सरदारों से मदद लेते हैं और फिर उनके गुलाम हो जाते हैं."

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक़ छोटू समेत कई अपराधी अतीत में पुलिस के मुखबिर रह चुके हैं. पुलिस के कुछ अधिकारी उनको मदद भी पहुंचाते हैं. शायद यही वजह है कि यहां मामला पुलिस के हाथ से निकल गया और सैन्य कार्रवाई की ज़रूरत पड़ी.

स्थानीय पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से बात करते हुए पुलिस के रवैये के बारे में आम लोगों के आरोपों को ग़लत बताया. उनका कहना था कि कम से कम जिन इलाक़ों में प्रशासनिक व्यवस्था है वहां ऐसे मामले नहीं होते हैं.

पुलिस का यह भी कहना था कि अतीत में संसाधनों की कमी और राजनीति इन गैंगों के खिलाफ़ नाकामी के कारण बने.

उन्होंने कहा कि छोटू के टापू की तरह कई और टापू भी हैं, जहां चरमपंथी संगठनों से जुड़े लोग भी मौजूद हैं. यह एक तरह का नेटवर्क है और विभिन्न आपराधिक नेटवर्क एक दूसरे का साथ देते हैं.

देश में सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण अपराध की जड़ें मज़बूत हो रही हैं और कोई इसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार